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''कामनवेल्थ गेम या पावरवेल्थ गेम''?

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                      लगभग पचास दिन बाद ३ अक्टूबर से प्रारभ होने जा रहे ''कामनवेल्थ गेम'' इस समय इतनी चर्चा में है कि इस देश का प्रत्येक नागरिक चाहे वह पेपर पढ़े या न्यूज चैनल देखे, के दिलो दिमाग में यह मुद्दा
बुरी तरह से छाया हुआ है। शायद इसीलिए आगामी ६३ वे पंद्रह अगस्त की याद हम लोगो को नहीं आ रही। मुझे भी जब एक स्थानीय टीवी चैनल ने १५ अगस्त के लिए मेरे कमेन्ट्‌स मांगे तब मुझे भी याद आया कि हम आगामी १५ अगस्त को ६३ वे स्वाधीनता दिवस की ओर बढ रहे है।
वैसे तो ''कामनवेल्थ'' के नाम से ब्रिटिश गुलामी की बू आती है। उसकी याद हमारे जेहन में इस स्वाधीनता दिवस के अवसर पर रहना एक दुखद स्थिति है। यदि ''कामनवेल्थ'' शद का विग्रह किया जाये तो उसमें शामिल ''वेल्थ'' हमें आगामीं होने वाले खेल आयोजन में सब जगह दिखाई दे रही है। शायद इसी कारण ही इसकी इस वृहत स्तर पर चर्चा है। लेकिन इसके प्रथम शब्द 'कामन' को देखे जो आज हमें ढूण्ढे नहीं मिल रहा है और उसकी जगह ''पावर'' ने ले लिया है और इसीलिए मैने उसे पावरवेल्थ गेम की संज्ञा दी हैं। '' क्योंकि उक्त खेल के आयोजन एवं संचालन में खिलाड़ीगण, खेल अधिकारीयों से ज्यादा 'पावर' से जुड़े व्यक्तियों (जैसे श्री सुरेश कलमाड़ी) की महती भूंमिका है।
                       १९५६ के एशियन खेलो के बाद एशियाड ८२ सबसे बड़ा खेल आयोजन था जो कामनवेल्थ गेम से भी बडा था। लेकिन तब आयोजन ने इतनी चर्चा नहीं बटोरी जितनी की आज हो रही है। इसके बावजूद वह सफल आयोजन माना गया। क्या पिछले ३८ सालो में (एशियाड ८२ से) हमारा खेल का चरित्र, राजनैतिक चरित्र, या राष्ट्रीय चरित्र इतना बदल गया है कि हमने इस आयोजन के सपादित होने के पूर्व ही इतनी ज्यादा प्रशंसाए? प्राप्त कर ली हैं कि आयोजन से तमगे बाटने के बाद तमगे समाप्त हो जाने से हमें और कोई तमगे? (सफल आयोजन के) की आवश्यकता नहीं है?
                          लगभग ०७ वर्ष पूर्व २००३ में कामनवेल्थ गेस का आयोजन नई दिल्ली को अलॉटमेंट होने के बाद बहुत लम्बा समय मिलने के बावजूद समय पर इस आयोजन से जुड़े समस्त निर्माण का व सुविधाओं के पूर्ण न होने से लेकर आयोजन के विभिन्न पहलुओं के सबंध में अनेक आरोप प्रत्यारोप आयोजन समीति और इसके प्रम़ुख श्री सुरेश कलमाड़ी व इसके सहयोगी तंत्र दिल्ली सरकार, केंञ्द्रीय शासन, विभिन्न खेलो के संघ और ओलम्पिक संघ पर लगाये जा रहे है। लेकिन जो सबसे गंभीर आरोप लगाया जा रहा है वह वृहद भ्रष्टाचार का है। बात सिर्फ भ्रष्टाचार की ही होती तो पिछले ३८ सालों में जिसमें हमारा मूल चरित्र इतना बदल गया है कि हमारे द्वारा अब सामान्य भ्रष्टाचार को सामान्य शिष्टाचार के रूप में स्वीकार कर लेने के कारण इस पर हमारी कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होती। लेकिन आयोजन देते समय सपूर्ण खेल आयोजन के लिए किया गया अनुमानित बजट १८०० करोड़ रू से बढक़र अब ८० हजार करोड़ रू. से अधिक हो जाने से जिसका मुख्य कारण कीमतों में वृद्धि न होकर वृहद भ्रष्टाचार होने के कारण चर्चा में यह विषय आया है। भ्रष्टाचार की कुछ बानगी जो लगातार टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में आई है उसे तो देखिए फ्रिज, टीवी, स्पोर्ट्‌स मशीन्स आदि सामग्री जो उक्त आयोजनों में आने वाले खिलाडिय़ों के रहने, खाने से लेकर खेल की प्रेक्टिस करने के सामान जिन्हे क्र न किया जाकर उन्हे किराये पर लिया जा रहा है जिनका मात्र १५ दिन का किराया उसके कुल लागत मूल्य से कई गुना अधिक है। एक छोटा फ्रिज का मूल्य ५ से ७ हजार रुपये तक होता है उसका किराया १.३७ लाख रू से अधिक बताया जा रहा है। इससे देश के अनपढ़ आदमी (जिसका आज भी बहुमत है) का भी माथा ठनक रहा है। किराये पर लेने का बाद लौटाते समय उसे अच्छी हालत में वापिस करने का दायित्व भीहोता है जिसका अनुबंध किया जाता है। सामान वापिस न लौटाने की दशा में या अच्छी हालत में न लौटाने पर उसका मुआवजा कितना होगा? किराये की राशि को देखकर इसकी कल्पना की जा सकती है जो भी एक जॉच का विषय है जिस पर किसी का भी ध्यान नहीं गया है। भ्रष्टाचार के विभिन्न मुद्दो पर आयोजको से विभिन्न टीवी चैनलों द्वारा पूछे गये प्रश्नों का कोई समाधानजनक उत्तर आयोजकगण नहीं दे पायें है। इससे यह स्पष्ट है कि वे लोग जवाब देने की स्थिति में ही नही है। यह बात स्पष्टतः सिद्ध करती है कि उक्त खेलों के आयोजन में कराड़ो रुपये का भ्रस्टाचार हो रहा है जिसके  लिए अब विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा जांच करने की मांग की जा रही है। अंततः सरकार ने भी संसद में यह कह दिया है कि वह किसी भी जांच एजेंसी से जॉच कराने को तैयार है। सीएजी ने अभी प्रस्तुत अपनी अंतरिम रिपोर्ट में श्री सुरेश कलमाड़ी सहित तीन व्यक्तियो को नामजद किया है। 
आजकल देश में यह सामान्य फैशन हो चला है कि हर्षद मेहता, तेलगी, ताबूत कांड से लेकर विभिन्न कांडो को टीवी चैनल से लेकर राजनैतिक पार्टीया, प्रबुद्ध लोग एवं संस्थाओं द्वारा जिस तीव्रता से उठाया जाता है अंततः किसी जॉच एजेंसी द्वारा जांच कराये जाने की उनकी मांग को सरकार द्वारा मान लिये जाने पर वे अपने कर्तव्य की इतिश्री मानकर मुद्दे को वही छोड़ देते है जिस कारण भ्रष्टाचार/अपराध का मुद्दा वहीं पर समाप्त हो जाता है और उस से लाभ पाने वाले व्यक्ति भी सुनिश्चित होकर घोड़ा बेचकर सो जाते है क्योंकि भारत देश में जांच प्रक्रिया जिस तरह से चल रही है उसमें आज तक एकआध अपवाद को छोडक़र जांच आयोग अपराधियों को अंतिम रूञ्प से सजा दिलाने मेंअसमर्थ रही है। एक तो उसमें इतना समय लग जाता है कि आरोपीगण से लेकर शिकायतकर्ता, आम नागरिक और उससे प्राप्त लाभार्थी भी उस घटना से विस्मृत हो जाते है। इस कारण से जब जॉच रिपोर्ट आती है तब तक मामला इतना ठंडा हो चुका होता है कि उस पर कोई एटीआर '(एक्शन टेकन रिपोर्ट) प्रस्तुत हुई है कि नहीं? और यदि प्रस्तुत हुई है तो वह वास्तव में क्रियान्वित हुई? कि नहीं यह देखने की भी कोई जहमत नहीं उठाता है।
                         एक और यक्ष प्रश्न यहां उत्पन्न होता है कि सभी समाचार चैनल खेल आयोजन में भ्रष्टाचार की बात जरूर कर रहे है लेकिन वे आरोपी व्यक्तियो से किस चीज पर कितना भ्रष्टचार हो रहा है उसपर सीधे इंटरगेशन नहीं कर रहे है जैसे एक फ्रिज का किराया १ लाख ३७ हजार रू से अधिक दिया जा रहा है जिस के अनुबंध की कॉपी निश्चित रूप से उनके पास होगी जिस आधार पर वे आरोप लगाये गये है या उक्त अनुबंध की कॉपी आरटीआई (सूचना का अधिकार) एक्ट के अधीन ली जा सकती है। लेकिन किसी भी चैनल ने किसी भी आयोजनकर्ता आरोपी से यह नहीं पूछा कि इतना किराया दिये जाने का औचित्य क्या है। यदि सीधा प्रश्न किया जाता कि एक फ्रिज की कितनी कीमत होती है व उसका किराया १,३७,००० रुपये दिया जा रहा है वह उचित है ? तो सबंधित व्यक्ति को या तो उस किराये के तथ्य को इनकार करना होता या या वे उसे अस्वीकार करते कि इतना किराया नहीं दिया जा रहा (क्योंकि वे उसे किसी भी स्थिति में उचित ठहराने की स्थिति में नही हैं) तब वास्तव में कितना भ्रष्टाचार किसके द्वारा हुआ है, यह स्थिति जनता के बीच बिल्कुल स्पष्ट हो जाती। तब किसी जॉच एजेंसी से जॉच कराने की आवश्यकता ही नहीं होती। अतः जो काम एक मिनट में हो सकता था उसके लिए सालो समय देने की प्रक्रिया जॉच आयोग गठन के माध्यम से हो रही है जिससे यह लगता है कि समाचार एजेंसी भी सिर्ड्ड अपनी टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में इस तरह कि सनसनीखेज न्यूज दे रही है। ''आप की अदालत'' इंडिया टीवी कार्यक्रम में श्री सुरेश कलमाड़ी से भी सीधा प्रश्न श्री रजत शर्मा द्वारा नहीं किया गया, जिससे यह लगता है वास्तविक मुद्दा भ्रष्टाचार को समाप्त कर भ्रष्टचारियों को कानून की पकड़ में लाने का नहीं है? वास्तव में कई मामलों में तो जांच आयोग के गठन से लेकर उसके द्वारा अंतिम रूप से दी जाने वाली रिपोर्ट पर इतना पैसा खर्च हो जाता है जो शायद जांच किये जाने वाले भ्रष्टाचार की राशी से भी अधिक हो जाती है।
                समस्त आयोजनकर्तोओ का यह कथन कि यह आयोजन देश के समान से जुड़ा है अतः इसके आयोजन को सफलतापूर्वक होने देने चाहिए। इस भावना से कोई इंकार नहीं कर रहा है। भ्रष्टाचारियों केञ् भ्रष्टाचार या आयोजन की कमियों की ओर इंगित करने वाले हाथ भी यही चाहते है कि यह आयोजन सफलता प्राप्त करे व सफल होवे ताकि हम भविष्य में ओलम्पिक खेल का आयोजन करने के गंभीर दावेदार बन सके। शायद भारतीय ओलंपिक संघ का भी यही उद्देश्य आयोजन के एलॉटमेंट के समय था। सुविधाओं में कमियों की ओर इंगित करने वालो का भी यही अभिप्राय है कि समय पूर्व उक्त  कमिंया दूर हो जावे। भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने का यह मतलब नहीं है कि आयोजन रोका जाए बल्कि एक तो आयोजन समिति के जमीर को जगाया जा सके, दूसरा, आयोजन के बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत भ्रष्टाचारियों को कानून के कटघरे के पीछे खड़ा किया जाकर भविष्य के लिए चेतावनी दी जा सके। ताकि हम अपने आपको को वास्तविक रूप से ओलिपक आयोजन के दावेदार सिद्द कर सके अन्यथा मंजिल अभी बहुत दूर है।
 
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