‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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आह

15 comments
बहुत समय से युवती की व्यथा लिख रही थी !
आज दिल ने कहा क्यु  न मर्द की आह भी लिख डालू !
 हम कहते हैं की मर्द बेवफा होता है !
तो क्या उनके  सीने  मै दर्द नहीं होता है ?
ओरत तो अपने दर्द को आंसुओ से बयाँ कर देती है !
मर्द का व्यक्तितव तो उसे इसकी भी इज्ज़ाज़त नहीं देता !
 कहाँ समेटता होगा वो इस दर्द को ?
वकत के साथ साथ सबका  छुटता हुआ साथ !
किसी से कुछ भी तो नहीं कह पाता है वो ,
बस अपने आपको अपने मै समेटता चला जाता है !
अपनी भावनाओ को किसी से कह भी नहीं पाता
उसे भी तो सहानुभूति , प्यार की जरुरत होती होगी न
फिर वो बेवफा केसे हो सकता है ?
हमारा प्यार जब उसे हिम्मत दे सकता है
तो वही प्यार उसे मरहम क्यु  नहीं 

15 Responses so far.

  1. This comment has been removed by the author.
  2. एक अच्छी कोशिश है अपने मन की बात कहने की ... लिखती रहिये ... :)

  3. धन्यवाद क्षितिजा जी आपने पहले भी मेरे लेख की सराहना की आज आप दूसरी बार हमसे फिर मिली अच्छा लगा !
    आप शिमला से मै सोलन से विचार मिलने लाजमी हैं दोस्त !

 
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