‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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आपराधिक षड़यंत्र से मुक्ति दिलाने की तैयारी

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सफेदपोशों का कालाधन क्या उजागर हो पाएगा?

देश को भ्रश्टाचार की दीमकों के हवाले करने वाले सफेदपाशों के कालेधन को लेकर अरसे से बहस चल रही है। गाहे-बगाहे कोई न कोई बडा नेता कालेधन के मसले पर बयान देकर अपने आप को दूध का धुला साबित करने में जुटा रहता है। अदृश्य भ्रष्टाचार के रूप में हर साल करीब 11.5 लाख करोड़ रूपये कालेधन के रूप में इकटठा होता है। विदेशी बैंको में ये कालाधन जमा किया जाता है। स्विस बैंक में अब तक करीब 70 लाख करोड़ रूपये कालेधन के रूप में जमा किए जा चुके है। एक अंतरर्राष्ट्रीय एजेंसी के सर्वे के इन आंकड़ो पर यकीन किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि जितना कालाधन एक साल में सफेदपोश जमा करते हैं वो हमारे देश के सालाना बजट से भी दो गुना होता है। साफ जाहिर है देश को बर्बादी के कगार पर ले जाने का षड़यंत्र चल रहा है तो दूसरी तरफ इस आपराधिक षड़यंत्र का ताना-बाना बुनने वालों को इससे निजात दिलाने की तैयारी भी चल रही है। दरअसल भ्रष्टाचार के नित नए स्केंडलों से जूझ रही केन्द्र सरकार एक ऐसा ही विधेयक लाने जा रही है। सरकार की मंशा चाहे जो भी हो, लेकिन यह साफ दीख रहा है कि ‘‘ब्लैक मनी’’ पर कुंडली मारे बैठे ‘‘व्हाईट कालर्स’’ मन ही मन खुश हैं। इस विधेयक का मजमूं कुद हद तक यही है कि सरकार इसमें ऐसे प्रावधान करेंगी कि सारा कालाधन निकल आए और उसकी चांदी हो जाए। जो अपना जितना कालाधन जाहिर करेगा, सरकार उसका करीब 30 फीसदी हिस्सा बतौर दंड रखकर उस काले दलाल को एक तरह से बरी कर देगी।
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कालेधन की एक बदरंग तस्वीर यह है इसका दूसरा घिनौना पहलू हाल ही में मुल्क के कमजोर मुखिया डॉ. मनमोहन सिंह की जुबानी उजागर हुआ है। अब तक के सबसे लाचार और बेबस प्रधानमंत्री कहे और माने जाने वाले डॉ. मनमोहन सिंह ने यह कहने में जरा भी गुरेज नहीं किया कि कुछ संधिया कालेधन को जोड़ने वालो के नाम उजागर करने में आड़े आ रही है। यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस लोकतांत्रिक देश में क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वे काले चोर कौन है जिन्होने देश की जनता की गाढ़ी कमाई विदेशी बैंको में सहेजकर रखी है। प्रधानमंत्री ने सीना तानकर यह कह दिया कि कालाधन जमा करने वाले लेागो का नाम सार्वजनिक करने में कुछ संधिया आड़े आ रही है। प्रधानमंत्री को किसी को नहीं तो कम से कम देश की जनता को यह बताना चाहिए कि वे कौनसी संधिया है जिन्हे छिपाया जा रहा है। सूचना के अधिकार के कानून को अमलीजामा पहनाने वाले प्रधानमंत्री खुद इस बात को कहे तो बड़ा आश्यर्च होता है। देश की जनता का यह मौलिक अधिकार बनता है कि वह यह जाने कि वे कौन लोग है जिनहोने देश की अकूत सम्पदा को कालेधन के रूप में छुपा कर रखा है। प्रधानमंत्री की इस गुस्ताखी को दबी जुबान में यूपीए के तमाम नेताओं और मंत्रियों ने चुप रहकर एक तरह से अपनी मंजूरी दे दी है। तभी तो अब तक इस मसले पर किसी ने कुछ भी नहीं कहा। इस मामले में सिर्फ सत्ता पक्ष ही नहीं बल्कि विपक्ष भी उतना ही कसूरवार है। पिछले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट किये गये भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी सहित कई बड़े नेताओं ने काले धन को और इन काले दलालो के नाम उजागर करने को लेकर बड़े-बड़े बयान दिये थे। देश के सालाना बजट से दोगुने कालेधन के मसले को लेकर ये क्यों चुप है। यह भी जनता को जानने का अधिकार है। देश में बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार को बढ़ाने में इन काले दलालो की काली भूमिका भी कम नहीं है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की दुहाई देने वाले नीति निर्धारकों को यह भी समझ लेना चाहिए कि देश की माली हालत बदतर करने में इन काले दलालो से ज्यादा वे खुद दोषी है तभी तो उन्होने 63 साल तक इस ओर संजीदगी से कोई कार्यवाही नहीं की।

3 Responses so far.

  1. आपकी आज की रचना बहुत महत्वपूर्ण है ये सच मै सोचने वाला विषय है की हमारे देश का इतना पैसा बाहर देश के बेंको मै रखा हुआ है जब की यही पैसा अगर हमारे देश मै ही होता तो हमारे देश मै इतनी बेरोजगारी कभी न होती और देश के लोग भूख से मर न रहें होते काश एसे लोगो की आँखे किसी तरह खुल जाती और देश महगाई और बेरोजगारी जेसी समस्याओं से उभर पाता !
    सराहनीय पोस्ट !

  2. Bahut achhe vichar hai aapke. is or nischit hi kade kadam uthane hongey..

 
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