‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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सफ़र

7 comments



घर से चले थे घर का पता साथ लेके हम !
चल पड़े थे काफिले संग  दूर तलख हम !
मिलते भी रहें राही बदल बदल के राह मै ,
रुकते भी गये अपने काफिले के संग हम !
अपनी अपनी मंजिल पर मुसाफिर ठहर गये ,
और दूर तलख सब किनारों मै खो गये !
मंजिल पर अब अकेले से हो गये थे हम !
राहें थी अलग -अलग कहीं खो गये थे हम !
फिर हाथ पकड़ कर किसी ने थाम तो लिया ,
पता तो था अलग सा पर आराम सा लगा !
अब दिल की खवाइशों को सुकूं सा मिला  !
जैसे  किसी नदी को सागर का पता मिला !
अब अपनी राह पर फिर चल पड़े हैं  हम !
अब तो सफ़र तन्हां ही तय करने लगे है हम !
क्युकी हम जान गये साथ न कोई आया था !
और जानतें हैं की साथ न अब कोई जायेगा !

7 Responses so far.

  1. गहन भाव ..सुन्दर रचना ..

  2. बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति....

  3. आप सबका शुक्रिया दोस्तों !

  4. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

  5. अब तो सफ़र तन्हां ही तय करने लगे है हम !
    क्युकी हम जान गये साथ न कोई आया था !
    और जानतें हैं की साथ न अब कोई जायेगा !...

    शास्वत सत्य...बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना..

  6. क्युकी हम जान गये साथ न कोई आया था !
    और जानतें हैं की साथ न अब कोई जायेगा !

    यही है जीवन का अकाट्य सत्य .....

  7. S.M.HABIB says:

    सुंदर भावाभिव्यक्ति....

 
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