‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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‘‘तू अपना मैं पराया

7 comments
एक प्रश्न घूमता है कभी-कभी मन में

लोग अपने और पराये की बात करते है

कैसे भेद करते है, हर रंग तो समान है,

फिर यहां अपना कौन, कौन पराया?

यहां तो हर रंग अपना ही नजर आता,

प्रश्न उठता है पराया कौन?

हसता हूं मैं जब याद आती है

रीत निराली अब दुनिया की

जो मीठा हो वो अपना

जो कड़ूआ हो वो पराया?

क्यों भूल जाते है, ये सच्चाई

अमृत कड़वा और मीठा जहर,

अपनी जबानी रीत पुरानी

‘‘तू (कड़वा)’’ अपना और ‘‘मैं (मीठा)’’ पराया।

7 Responses so far.

  1. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

  2. बहुत सटीक प्रस्तुति..

  3. Anonymous says:

    Thanks for all your work.

  4. Anonymous says:

    Las contradicciones del individualismo burgues se,

 
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