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'ओबामा' 'ओसामा' से उत्पन्न कुछ अनचाहे अनसुलझे प्रश्र

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अंतत: दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी 'ओसामा' (बिन लादेन) का विश्व के सबसे बड़े महारथी अमेरिकन राष्ट्रपति 'ओबामा' (बराक) के शील कमाण्डो द्वारा अंत कर दिया गया। इस घटना से अमेरिका पुन: सबसे बड़ा आतंकवादी देश कहलाने से नहीं बच सकता है। क्योंकि जो मित्र देश अमेरिका के नहीं है वे अमेरिका के आतंक से उतने ही खौफ खाये है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति की नीति के अनुरूप जो किसी भी देश का जो राष्ट्राध्यक्ष कार्य नहीं करता है, वो अमेरिका उस देश की सम्प्रभूता और सार्वभौमिकता की चिन्ता किये बिना अन्र्तराष्ट्रीय कानूनों की धज्जिया उड़ाते हुए उस देश के राष्ट्राध्यक्ष को सिंहासनचुतकर देता है यह अमेरिका का व्यवहार पिछले कई वर्ष से चला आ रहा है इसलिए वह सभ्य राष्ट्रो के मध्य अपने कार्यो के कारण एक आतंकवादी राष्ट्र कहलाने की ओर बढ़ रहा है जबकि उसका घोषित उद्देश्य विश्व से आतंकवाद को खत्म करना है। यह विरोधाभास ही कई प्रश्रों को जन्म देता है। उस स्थिति में और भी जब अभी लंबा अरसा नहीं बीता है जब ओबामा को 'शांति' का नोबल पुरूस्कार मिला था।  क्या मनमोहन सिंह ऐसे ही 'शांति' का कार्य कर दाउद इब्राहिम को इसी तरह से नेस्तानाबूत कर बराक के समान ही नोबल पुरस्कार प्राप्त करने के अधिकारी नहीं होंगे? एक ओर जहां ओबामा स्वयं ने ही संपूर्ण विश्व बिरादरी के सामने अपने आप को सबसे बड़ा आतंकवादी सिद्ध कर दिया फिर कैसी शांति .........। क्या हमारे मनमोहनजी इस दौड़ में शामिल नहीं किये जा सकते, उन्होने तो न कभी पाक को चमकाया न चीन को धमकाया न बंगलादेश पर आंख तरेरी। 
                      अमेरिका को इस बात का श्रेय और धन्यवाद अवश्य दिया जाना चाहिए कि उसने एक खुंखार आतंकवादी को बहुत ही धैर्य और नियोजित तरीके से बिना किसी बड़े खून खराबे शोर शराबे के नष्ट किया। लेकिन उसके इसी तरीके से विश्व में एक नयी आतंक की भावना ने जन्म लिया। जिस तरह से हजारों मील दूर बैठकर विश्व का सबसे प्रभावशाली नेता अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी पूरी सैनिक टीम के साथ बैठकर लाईव घटना को देखा और अंजाम दिया उससे विश्व के शेष भाग में दहशत की एक नयी भावना फैली है। इसके पूर्व अमेरिका ने जब-जब विभिन्न देशों पर अपने इच्छा अनुसार अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमले किये वे भीषण वेदना देने वाले थे और लम्बे चले चाहे फिर वह वियतनाम का मामला हो, अफगानिस्तान का मामला हो या ईराक के राष्ट्पति सद्दाम हुसैन को हटाने का मामला हो। लम्बा संघर्ष होने के कारण अमेरिक ी जन-धन की भी काफी क्षति हुई। लेकिन इस मामले में बिना किसी क्षति के अमेरिका नें अपने उद्देश्य को प्राप्त किया। इसका शायद एकमात्र काम यही था कि यह लड़ाई एक देश के खिलाफ न होकर एक व्यक्ति विशेष के प्रति थी जिसमें उस व्यक्ति का साथ देने वाला राष्ट्र भी अमेरिकी खौफ से बिन लादेन का साथ नहीं दे सका। लेकिन पाकिस्तान ने अपनी चालों एक बार फिर सिद्ध कर दिया की अमेरिका की राजनैतिक मजबूरी पाकिस्तान के पीछे चलने की है। इसलिए पाकिस्तान डरकर भी अंतत: अमेरिका को डरा गया जो इस घटना के बाद जारी अमेरिकन प्रवक्ता के बयान से सिद्ध होता है कि आंतकवादियो से संघर्ष के विरूद्ध पाकिस्तान का साथ देता रहेगा यद्यपि उसने ओसामा बिन लादेन को संरक्षण देने के मामले में उंगली उठायी है एटामाबाद में ओसामा पिछले पांच वर्ष से रह रहा था जो पाकिस्तान के मिलिट्री हेड क्वार्टर से मात्र १/२ किलोमीटर दूर था बावजूद इसके पाकिस्तान सरकार को इसकी भनक न होना संभव नहीं है अर्थात पाकिस्तान व आईएसआई ने ही ओसामा को पनाह दी यदि इसके बावजूद अमेरिका ने उसके खिलाफ कोई सैनिक/असैनिक कार्यवाही नही कि जैसा कि इस तरह के अन्य मामलो में दूसरे देशों के विरूद्ध कार्यवाही की गई। इससे यह सिद्ध होता है कि अमेरिका भी आज पाकिस्तान के दबाव में उसी तरह है जिस तरह पाकिस्तान अमेरिका के दबाव में है। इस घटना ने एक बार पुन: सिद्ध कर दिया कि अमेरिका के लिए न तो कोई अंतर्राष्टीय कानून है और न ही कोई सभ्यता का नियम है। उसके लिए तो वही कानून है जो उसने निर्णय ले लिया है उसका अक्षरत: पालन हो। फिर चाहे वह इराक का मामला या फिर अफगानिस्तान में अपनी कठपुतली सरकार बनाने का हो, या अंतर्राष्ट्ीय कानून की धज्जिया उड़ाते हुए, मानवाधिकारों का उलंघन करते हुए और दूसरे देशों की संप्रभुता का चीर हरण करते हुए उसकी नजर में उसके द्वारा निश्चित किये गये उसके दुश्मन (टारगेट) को नष्ट करने के लिए कोई भी सैनिक अभियान किसी भी सीमा तक चलाने के लिए वह स्वतंत्र है यह भी उसने सफल रूप से सिद्ध किया है।
उक्त घटना ने कई प्रश्र एक बौद्धिक और सभ्य समाज के मन में पैदा किये है। क्या बिन लादेन को ७/११ की घटना के लिए अपराधी घोषित करने के बाद उसके यह जानकारी में होने पर कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में है उसने पाकिस्तान सरकार से औपचारिक रूप से उसके प्रत्यर्पण की मांग क्यों नहीं की। जब यह तक कहां जा रहा है कि बिन लादेन को पकड़कर उसके सिर में गोली मारी गई तब उसे जिन्दा पकड़कर उसपर अंतर्राष्ट्रीय और अमेरिकन कानून के तहत मुकदमा चलाने का प्रयास क्यो नहीं किया गया। एक तरफ अमेरिकन प्रशासन द्वारा यह कहा गया कि हमने धार्मिक रीति रिवाजों का पूरा पालन किया है तब अमेरिका द्वारा शव को दफनाने के लिए पाकिस्तान सरकार से क्यों नहीं जगह की मांग की गई जबकि ऐसा कहा गया कि अमेरिका ने सउदी अरब से जमीन की मांग की थी जो अस्वीकार कर दी गई। जिस तरीके व तेजी से ओसामा के शव को समूद्र में दफनाया गया इससे यह बात साबित होता है कि जिंदा लादेन का आतंक तो था ही लेकिन मरने के बाद शायद उसकी लाश का भी आतंक अमेरिका के दिमाग में इतना था कि यदि कहीं उसकों जमीन में दफनाया जाता तो वह अंतराष्ट्रीय स्तर का एक मकबरा बन जाता। 
                      उपरोक्त घटना ने भारत सरकार को भी सोचने के लिए मजबूर कर एक अवसर प्रदान किया है। एक तरफ हम जहां पाकिस्तान से लगातार आतंकवाद को पश्रय न न देने की अपील मात्र कर रहे है। २४ साल से अधिक पाकिस्तान में पनाह पाये अण्डरवल्र्ड डॉन व १९९३ के मुम्बई बम काण्ड के मुख्य आरोपी दाउद इब्राहिम के प्रत्यर्पण की मात्र मांग कर रहे है जैसे हम पाकिस्तान से भीख ही मांग रहे है। जब हमें दाउद की लोकेशन की जानकारी है और अभी दाउद के परिवार में होने वाली शादी में जाने वाले लोगो पर हम निगाह रख रहे है तब हमकों अमेरिका जैसे कार्यवाही कर दाउद को मारने से किसने रोका है। क्या हम उतने सक्षम नहीं है या हमारी अंतर्राष्ट्रीय कानून को मानने की 'अचूक' ÓअटलÓ प्रतिबद्धता है। चीन से हम अपनी भूमिं कब मुक्त करा पायेंगे यह भी सिर्फ गर्भ में ही छुपा है। क्या इस घटना से सबक लेकर हम अपनी विदेश नीति खासकर पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधो पर तुरंत पुनर्विचार कर एक 'मारकÓ विदेश नीति बनाने की आवश्यकता नहीं है? जिस तरह से अमेरिकन नागरिकगण रात्रि में निकलकर व्हाईट हाउस के सामने नाच गाना गाकर खुशिया बिखेरकर जश्र मना रहे थे ऐसा ही जश्र एक भारतीय होने के नाते मैं भी मनाना चाहता हूं। कब हमारी भारत सरकार वह मौका हमें देगी उस दिन का जब हमारी सेना न १९९३ के मुम्बई बम काण्ड के मुख्य आरोपी दाउद इब्राहिम को उसके  अक्षम्य कृत्य की सजा देगी बल्कि वर्षो पूर्व चीन द्वारा हमारी भूमिं पर बलात किये गये कब्जे पर हमारा तिरंगा लहराएगा।
जय हिंद जय भारत!

(राजीव खण्डेलवाल)

One Response so far.

  1. अजाक मंत्री ने कहा कि
    बाबा कौन से दुध के धुले है...........!
    बैतूल, (रामकिशोर पंवार) मध्यप्रदेश के अजाक मंत्री कुंवर विजय शाह ने आज देर रात्री भोजन पर बुलाए बैतूल जिले के सभी राजनैतिक दलो के नेताओं , विधायको , पत्रकारो , अपने पार्टीजनो के बीच वन विश्राम गृह परिसर में कालाधन एवं भ्रष्ट्राचार के मामले में भारत सरकार का बचाव करते हुए पत्रकारो एवं जनप्रतिनिधियों से चर्चा के दौरान कुछ इस प्रकार कहा कि सुनने वाले दंग रह गए। हालाकि मंत्री जी की अपनी नीजी राय थी जो कुछ इस प्रकार थी कि बाबा रामदेव कौन से दुध के धुले है.......! करोड़ो रूपए की सरकारी भूमि को योग साधना के नाम पर लेकर , भारत सरकार से विभिन्न सरकारी टैक्स में छुट लेकर अपनी संस्थान की मंहगी दवाईया बेच कर मुनाफा कमा रहे हैं। मंत्री जी का मानना था कि रामदेव बाबा भी तो किसी न किसी रूप में भ्रष्ट्राचार कर रहे है या उसे बढ़ावा दे रहे हैं। जिस दिन भी भारत सरकार चाह लेगी बाबा रामदेव के खिलाफ जांच बैठाल देगी , उस दिन बाबा को कोई नहीं बचाने आएगा और न बाबा को कोई बचा सकता है। योग गुरू बाबा रामदेव की जम कर खिल्ली उड़ाते हुए मध्यप्रदेश शासन अजाक मंत्री कुंवर विजय शाह ने कहा कि योग के नाम पर बाबागिरी समझ के बाहर की बात है। भ्रष्ट्राचार की बात पर मंत्री जी बोले कि बाबा कमलनाथ जैसे लोगो को अपने मंच पर एकत्र करके पता नहीं कौन सा संदेश देना चाह रहे है ....? हमारे समझ के बाहर की बात है। बाबा रामदेव के बारे में अजाक मंत्री जी ऐसे तथाकथित वाणी जहर ऊगल रहे थे जैसे उन्होने आज ही कुछ समाचार पत्रो में छपा बैतूल सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष राजीव खण्डेलवाल का लेख पढ लिया हैं। मंत्री जी की उक्त टिप्पणी प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिहं चौहान के द्वारा बाबा रामदेव की तारीफ में पढे गए कसीदो के ठीक विपरीत थी। बैतूल में बाबा रामदेव के आगमन के बाद मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में भाग लेने दो दिवसीय बैतूल दौरे पर आए राज्य सरकार के अजाक मंत्री कुंवर विजय शाह ने अपन बेबाक राय को व्यक्त करके एक नई राजनैतिक बहस को जिंदा कर दिया हैं। अब आने वाला समय ही बता पाएगा कि मंत्री जी की राय का किस पर कितना असर हुआ। इस चर्चा के दौरान भाजपा पदाधिकारी , आला अधिकारी , पत्रकार उपस्थित थे।

 
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