‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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हवाओं का रुख

5 comments
मैं न आ आई  थी तेरे दर 
न जाने राह कैसे मुड गई |
चल तो रही थी , चाल थी धीमीं ,
न जानें गति कैसे बढ गई |
राह अनजानी सी  थी ...
पर पाने की चाह ... न जाने 
क्या कमाल कर गई |
चाँद सूरज के साथ चलकर  ...
हम  सफर करते  गए |
अब भी न जान पाए  
की हमको तुम कैसे मिल गये |
तन की किसने सोची ...
यहाँ तो मन ही थे मिल गए |
भान ही  न पाए हम ,
कौन सी दुआ कब असर कर गई 
न आये  थे   कुछ मांगने   
न जाने ये दिल  कैसे जुड़ गये  |
कुछ क्षण को सारा आलम 
एकदम से ठहर गया |
दो पल का आराम ...
हमारी आँखों में  सपना नया भर गया |
देख मेरे पंख ...हवाओं ने भी  ...
अपना रुख यु बदल  दिया  |
ड़ाल तो छुम गई ...
पर ड़ाल का पंछी हवा में उड़ गया |
मैं न आई थी , तेरे दर 
रास्ता ही खुद मुड गया |

5 Responses so far.

  1. सुन्दर अभिव्यक्ति ..

  2. wahi tooooooooooooo सुन्दर अभिव्यक्ति ..

  3. Anonymous says:

    A topic near to my heart thanks, ive been wondering about this subject for a while.

 
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