‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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मौन सृजन

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   इसरा अबदेल

                          क्या होता है ये सृज़न ? क्या तोड़ - फोड़ , शोर - गुल के माध्यम से ही इसे लाया जा सकता है | नहीं... सृज़न जब भी  होता है तो अधिकतर मौन  के रूप में ही आता है जिसका असर हर तरफ नज़र आता है और ये सब कर पाना कोई कठिन नहीं क्युकी इतिहास तो  बनता और बिगड़ता रहता है | इतिहास को बनाने और बिगाड़ने का सबसे बड़ा हाथ हम इंसानों को ही जाता है | अगर हम दिल में ठान ले की हमने कुछ एसा करना है जिससे हम एक नया इतिहास रच दे तो एसा करना बहुत बड़ी बात नहीं हमें  कुछ एसा करना होगा की इन्सान खुद हमसे जुड़कर आगे बढ़ने और हमारा साथ देने को मजबूर हो जाये | ये काम भीड़ भरी जनता के सामने भाषण देने से ज्यादा खामोश रह कर कुछ एसा रचने से होगा जिससे किसी को नुकसान भी न हो और हम अपने काम में सफल भी हो जाये क्युकी भीड़ के शोर में वो ताक़त नहीं होती जितना  शांत रहकर सृजन करने में है | मौन सृजन में इतनी ताक़त है की वो सत्ता का तख्ता पलटने तक की ताक़त रखती  है | 
                           रगों में दौड़ने  फिरने के हम नहीं कायल 
                         जब आँख से ही न टपके तो फिर लहू क्या है |
              कहते हैं ये शेर मिर्ज़ा ग़ालिब ने  बहुत समय पहले हिंदुस्तान  में कहा था पर एसा लगता है की मिस्र  की काहिरा विश्वविद्यालय की छात्रा ' अस्मां महफूज़ ' ने भी इसे जरुर पढ़ा  होगा जिसने इसे पढ़कर मिस्र में एक क्रांति लाने की ठान ली | वो वहां के लोगों की गरीबी , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार और मानवाधिकारियों के हनन से त्रस्त मिस्र के लोगों की सरकार के खिलाफ बगावत की अग्रदूत बन गई थी अस्मां | अपने इंटरव्यू में उसने कहा था की हाँ में नाराज़ थी ___सबके मुहं  से ये सुनती थी की हमें  कुछ करना चाहिए पर कोई कुछ नहीं कर पा रहा था | इसलिए एक दिन मैनें  फेस - बुक पर लिख डाला की दोस्तों ____ मैं आज तहरीर चौक  पर जा रही हूँ मैं वहां अपना अधिकार मागुंगी | यह 25 जनवरी की बात है वह कुछ लोगों के साथ वहां गई  पर  उसे वहां प्रदर्शन करने नहीं दिया | उसके बाद उसने एक विडिओ बनाई जिसमें  लोगों को उनसे  इस मुहीम में जुड़ने की अपील थी और इसे ब्लॉग और फेसबुक  पर डाल कर प्रसारित किया ये विडिओ जंगल में आग की तरह फैल गया और एक बार फिर मौन सृजन हुआ |
                  अस्मां की तरह मिस्र की अहिंसक क्रांति के दौरान कई नायक जन्में जिन्होनें सोशल मिडिया का इस्तेमाल कर इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा डाला | गूगल के अधिकारी ' वेल गोमिन ' और मिस्र की एक निजी कम्पनी में मानव संस्थान समन्वयक रही ' इसरा अबदेल फातेह ' इन्ही लोगों में से है | इसरा अबदेल ने 2008 में मिस्र के लोगों को फेसबुक की एहमियत से पहली बार परिचित कराया | उस वक़्त सिर्फ 27 की इस लड़की ने वह कारनामा कर दिखाया  था जिसे वहां के विरोधी दल नहीं कर पा रहे थे | इसरा के फेसबुक पेज ने चुपके से 70 ,000 लोगों को अपने साथ जोड़ा , जिन्होंने देश में पहली सार्वजनिक हड़ताल को सफल बनाने में खास भूमिका निभाई | नतीजा ये हुआ की इसरा को गिरफ्तार कर लिया गया | करीब दो हफ्ते बाद इसरा रिहा हुई और इसका नाम ' फेसबुक गर्ल ' के नाम से मशहूर हो गया |
                    किसी खास मुद्दे पर कैंपेन चलाना , क्रांति को हवा देना ये सब नेटवर्किंग के जरिये एक मौन सृजन ही तो है , जो हैती  से मिस्र और भारत तक ये मौन  रहकर अलग -अलग उदाहरणों के साथ सोशल मिडिया की ताक़त हमें दिख रही है और इसकी चुप्पी रोज़ नए - नए आयाम गढ़ती  जा रही है | हाँ इसी का नाम तो मौन  सृजन है जो खामोश रह कर इतिहास को बदलता जा रहा है |   

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परिवर्तन ही नियम

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किसी के जाने से कारवां रुक नहीं जाता |
किसी के आने से इतिहास कब बदलता है |
जिंदगी एक प्रवाह है न रुका है न रुकेगा | 
चलता ही रहा है और चलता ही रहेगा |
अगर एक तरह से जी कर थक चुके हो तुम 
तो जीवन को जीने का अंदाज़ बदल डालो |
उसको जीने के मायने ही बदल दो तुम  |
इन्सान तो अपने  आप में खूबियों का 
एक भरपूर पुलिंदा है |
वो जब चाहे गाँधी , सुभाष और जब चाहे 
सचिन और सहवाग बन सकता है |
तो इससे साफ़ जाहिर होता है की सारी
खूबियों का शहंशाह सिर्फ इन्सान ही है |
बस जरुरत है तो इतना की उसका उपयोग 
किस स्थान पर कब और कैसे  किया जाये |
क्युकी दुनिया तो एक रंगमंच है और 
हम सब इस रंगमच के कलाकार हैं  |
बस अपनी - अपनी कला से एक दुसरे को 
मोहित करना हमारा काम है  |
बस थोड़े वक्त  का ही ये खेल होता है |
क्युकी हम तो सितारे हैं उपर से आयें है ,
और वापस सितारों में ही जाके मिलना है |
जिंदगी की  रफ़्तार को न आज तक कोई 
रोक पाया है और न ही रोक सकता है |
सारी सृष्टि की ये सच्चाई है बिना परिवर्तन 
के कुछ भी संभव नहीं |
फिर और किसका इंतजार करना है |
इस जीवन को अपने ही अंदाज़ में 
जीके निकलना  हैं |
हाय तौबा  न करते हुए ख़ुशी - खशी 
आगे की और ही तो बढ़ना  हैं |
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ये संसार प्यारी सी बगिया

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कोंन कहता है की इंसान...
इंसान से प्यार नहीं करता |
प्यार तो बहुत करता है 
पर इज़हार नहीं करता |
हर एक... को तो अपने 
पहलु से बांधे फिरता है |
पर फिर भी उसे कहने से 
हर दम ही वो  डरता है |
यूँ कहो की पुराने को हरदम 
साथ रख कर फिर कुछ 
नए की तलाश में रहता है |
उसका कारवां तो 
यूँ ही चलता रहता है |
तभी तो ता उम्र वो 
परेशान सा ही रहता है |
इस छोटे से दिल में न जाने 
कितनों को वो पन्हा  देता  है |
फिर किसको छोड़ू  किसको रखूं 
इसी में उम्र बिता देता है |
जब वो थक हार के 
सोचने जो लगता  है |
तब तलख  जिंदगी 
आधी ही तो रह जाती है |
यूँ कहो की  जिंदगी उससे 
बहुत दूर निकल  जाती है |
तो फिर कयूँ इस छोटे से दिल में 
सबका  का घर बनाये हम |
एक ही काफी नहीं जो 
सबको यहाँ बसायें हम |
इन्सान का कारवां तो 
हर वक़्त नया गुजरता है |
सबसे हम हंस के मिलें 
इससे भी तो काम चलता है |
ये संसार तो प्यारा सा 
एक बगीचा है |
इसमें रोज़  फूल खिले 
तो ये हरदम महकता है |
यही तो हमारी जिंदगी को 
खूबसूरती से रौशन करता है |
हममें जीने का नया होंसला  
हर वक़्त भरता है |

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संघ पारिभाषिक शब्दावली

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सरसंघचालक - संघ के मार्गदर्शक
सरकार्यवाह - संघ के निर्वाचित सर्वोच्च पदाधिकारी
संघ चालक - स्थानीय कार्य व कार्यकर्ताओं के पालक
मुख्य शिक्षक - नित्य चलने वाली शाखा के कार्यक्रमों को संचालित करने वाला।
कार्यवाह - शाखा क्षेत्र का प्रमुख।
गटनायक - शाखा क्षेत्र के एक छोटे भौगोलिक भाग का प्रमुख।
प्रचारक - संघ कार्य हेतु पूर्णतः समर्पित जीवनदानी कार्यकर्ता।
शाखा - संस्कार निर्माण हेतु नित्य प्रति का एकत्रीकरण।
उपशाखा - एक स्थान पर चलने वाली विभिन्न शाखाएँ।
बैठक - विचार मंथन व सामूहिक निर्णय प्रक्रिया हेतु एकत्र बैठने की प्रक्रिया।
बौद्धिक - वैचारिक प्रबोधन का कार्यक्रम/भाषण।
समता - अनुशासन के प्रशिक्षण हेतु शारीरिक कार्यक्रम।
सम्पत - कार्यक्रम प्रारम्भ करने हेतु स्वयंसेवकों को निश्चित् रचना में खड़ा करने की आज्ञा।
विकिर - शाखा कार्यक्रम के समाप्ति की अंतिम आज्ञा।
दण्ड - लाठी
चंदन - एकसाथ मिल बैठकर जलपान करना।
सहभोज - अपने.अपने घर से लाये भोजन को एकसाथ मिल बैठकर खाना।
शिविर - केम्प
संघशिक्षा वर्ग - संघ की कार्यपद्धति सिखानें हेतु क्रमबद्ध त्रिवर्षीय प्रशिक्षण योजना।
सार्वजनिक समारोप - शिविर तथा वर्ग का अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम।
रवानगी समारोप - समारोप वर्ग का केवल शिक्षार्थियों के लिए दीक्षांत कार्यक्रम।
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समर्पण

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चाँद तारों की बात करते हो 
हवा का  रुख को बदलने की  
बात करते हो 
रोते बच्चों को जो हंसा दो 
तो मैं जानूँ |
मरने - मारने की बात करते हो 
अपनी ताकत पे यूँ इठलाते  हो  
गिरतों को तुम थाम लो 
तो मैं मानूँ |
जिंदगी यूँ तो हर पल बदलती है
अच्छे - बुरे एहसासों से गुजरती है  
किसी को अपना बना लो 
तो में मानूँ |
राह  से रोज़ तुम गुजरते हो 
बड़ी - बड़ी बातों  से दिल को हरते हो 
प्यार के दो बोल बोलके  तुम 
उसके चेहरे में रोनक ला दो 
तो मैं जानूँ |
अपनों के लिए तो हर कोई जीता है 
हर वक़्त दूसरा - दूसरा  कहता है |
दुसरे को भी गले से जो तुम लगा लो 
तो मैं मानूँ |
तू - तू , मैं - मैं तो हर कोई करता है 
खुद को साबित करने के लिए ही लड़ता है 
नफ़रत की इस दीवार को जो तुम ढहा दो 
तो मैं मानूँ |

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मनुष्य कि स्मृति

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मनुष्य कि सोच अदभुत , मगर भ्रामक उपकरण होती है !
हमारे  भीतर रहने वाली स्मृति न तो पत्थर पर उकेरी गई 
कोई पंक्ति है और न ही एसी कि समय गुजरने के साथ 
धुल जाये , लेकिन अक्सर वह बदल जाती है , या कई बाहरी 
आकृति से जुड़ जाने के बाद बढ जाती है !
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क्या ये मेरी खता थी?

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तेरे दामन से जो लिपट गयी चुनरी मेरी
दुनिया ने कहा मेरे चलने में खता थी
हवा ने रूख मोड़ा और उड़ गयी वो
बता तो क्या ये सिर्फ मेरी खता थी?
..
फिसलती राहो से गुजरते गिरी तेरे बाहो में
दुनिया ने कहां मेरी राह चुनने की खता थी
तेरी मासूम सूरत देखी और राह भटक गई
बता तो क्या ये सिर्फ मेरी खता थी?
..
दुनिया समझने मैं चली, खोया दिल तेरे हाथों में
दुनिया ने कहा खरीददार चुनने में खता थी
दिलों का मेला इतना बड़ा भूल हुई चुनने में
बता तो क्या ये सिर्फ मेरी खता थी?
..
ये गया तू मेंरी ख्वाबो की पंखुड़िया बिखराकर
दुनिया कहती है, मेरी खुशबू में कमी थी
हर पुष्प की अभिलाषा है रे भौरे तू
बता तो क्या ये सिर्फ मेरी खता थी?

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बहुत कठिन है मोहब्बत की राहें

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प्यार की इस हसीन वादियों मैं एक बार तुम आके तो देखो |
हो न जाये इससे महोब्बत जरा इसे आजमा  के तो देखो |
                                   वो घड़ी भी आज आ ही गई जिसका युवावर्ग को बेसब्री से इंतजार था | सच मैं ये प्यार भी बड़ी अजीब से चीज़ होती है | किसी को पागल , किसी को दीवाना और किसी को म़ोत भी दे देती है ,  लेकिन प्यार करने वालों का दीवानापन तो देखो इसके अंजाम को जानते हुए भी इसकी राह मै चलने से पीछे नहीं हटते | प्यार करने का अंदाज़ बदल लेते हैं पर प्यार की राह पर चलना कभी कम नहीं करते | वेसे प्यार शब्द तो इंसां की रूह मै हरदम समाये रहता है बस फर्क सिर्फ इतना है हर एक ने इसका अपना - अपना पैमाना बना कर रखा है और अपने - अपने हिसाब से इसको  इस्तेमाल मै लाता है | अब अगर हम गोर  से सोचे तो प्यार का इज़हार करने और उसके लिए हाँ कहने के लिए एक दिन का समय बहुत कम है क्युकी वो तो पल -पल के एहसास से ही जीवित रहती है फिर एक दिन मै ये केसे मुमकिन हो सकता है | प्यार तो एक बीज की तरह होता है जिसको बहुत प्यार से सहेज कर रखा जाता है और समय - समय पर उसे पानी दे कर पालना पड़ता है | प्यार के तो वेसे बहुत से क़िस्से और  कहानियां हुई है जिसमे दुखद बहुत ज्यादा और सफल बहुत कम हुई हैं | वेसे प्यार का एहसास सच मैं बहुत सुखद होता है पर ये भी सच बात है की इसके मायने भी अलग - अलग हुआ करते हैं और प्यार मै इतनी ताकत है की सिर्फ उसके एहसास मै भी जिया जा सकता है | ये भी सच है की जिन्दगी का हर रिश्ता प्यार के बिना अधुरा है फिर वो प्यारा सा रिश्ता भाई - बहन का हो , माँ बाप का हो या फिर फिर प्रियतम का अपनी प्रेयसी के प्रति समर्पण का ही क्यु  न हो | इसलिए हर रिश्ते को जिन्दा रखने के लिए एहसास का होना बहुत जरुरी है | जब तक इसे हम सींचते रहेंगे ये तब तक जीवित रहेगा  और उसके सुखद एहसास को हम भोगते रहेंगे और जेसे ही हमने इससे मुहं  फेरा इसका अंत निश्चित है | ये एक कडवा सत्य है जो हर प्यार करने वाले की जिंदगी के लिए जरुरी है | प्यार के इस मोसम मै ये एक प्यार करने वाले की प्यारी सी कहानी है ...
                                     बिहार के गया जिले के सुदूर गाँव गालहोर मै 1934 मै जन्मे महादलित मुसहर जाति के एक अशिक्षित श्रम जीवी की ये कहानी है | जो प्यार के एहसास को बखूबी समझता था और उसी एहसास को पा कर उस दशरथ नाम के लड़के ने अपने प्यार को तकलीफ झेलते देख कर अपनी प्रेयसी के लिए पहाड़ को खोद कर रास्ता तक बना दिया | 1960 मै शुरू कर 1982 तक 22 साल की अपनी अथक मेहनत की बदोलत दशरथ ने सिर्फ हथोडी और छेनी की मदद से गह्लोर घाटी की पहाड़ी के एक  छोर 360  फिट लम्बा , 25 फिट ऊँचा और 30 फिट चोडा रास्ता खोद डाला | इन सबका कारण सिर्फ इतना था की उसकी जीवन संगिनी फगुनी को पानी लेने जाने और छोटी - मोटी जरूरतों  को पूरा करने के लिए इतनी बड़ी पहाड़ी को लाँघ कर जाना पड़ता था और उसकी प्रेयसी इसमें अकसर जख्मी होकर लोटती थी | दशरथ इस दर्द को सह नहीं पाता था और वो उसके इस दर्द से तड़प जाता था | मोहब्बत का जन्म संवेदनाओं से ही होता है | उसके लिए प्रेम के जो मायने थे उसे पूरा करने के लिए उसने इतिहास के पन्नों पर मोहब्बत  की किताब ही लिख दी | पटना से लगभग डेढ़ सो किलोमीटर दुरी पर बसे हुए गया जिले के अतरी ओर वजीरगंज ब्लोक के बीच की दुरी दशरथ के इस प्रेम के कारण 75 किलोमीटर से कम होकर सिर्फ 1 किलोमीटर ही रह गई  तब दुनिया की निगाहें इस नायक पर पड़ी जिसके प्यार ने सिर्फ अपने प्यार की खतिर  ही नहींबल्कि  सारे गाँव वालो की जिन्दगीको  ही खुशहाल कर दिया  | असल मै मोहब्बत का उफान यही है और हकीक़त भी | 
                  प्यार ...प्यार ...प्यार
           इसका कोई निश्चित समय नहीं ,
       यही वो नदी है जो निरंतर  बहती रहती है  |
      हर वक़्त हमारे ही भीतर विद्यमान रहती है |
        कभी वो बच्चे की तरह माँ से लिपटती है |
      तो कभी भाई बनकर बहन की रक्षा करती है |
     तो कभी प्रेयसी से मिलन को बेकरार रहती है |
     चित्रकार के लिए  चित्रकारी ही उसका प्यार है |
      संगीतकार का तो गीत ही उसका यार है |
    अरे लेखक की लेखनी अगर उसका संसार है |
      देश भगत को तो सिर्फ देश से ही प्यार है |
         तो प्यार पल भर को भी  ठहर जाये ,
              ये हमको गवारा नहीं है |
    क्युकी प्यार ही तो सबकी जिंदगी का सहारा है |
       हर एक के प्यार करने का अंदाज़ जुदा है |
    पर हर एक ने इसे प्यार के ही नाम से पुकारा  है |
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मत रो आरुषि

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वेसे ये नई बात नहीं ये तो रोज़ का ही  नज़ारा हैं !
हर किसी अख़बार के  इक  नए  पन्ने मैं ...
आरुशी जेसी मासूम का कोई न कोई हत्यारा है !
पर लगता है आरुशी के साथ मिलकर सभी मासूमों ने
एक बार फिर से इंसाफ को पुकारा है !
क्या छुपा है इन अपलक निहारती आँखों मैं ,
ये कीससे गुहार लगाती है ?
खुद का इंसाफ ये चाहती है ?
या माँ - बाप को बचाना चाहती है ?
उसने तो दुनिया देखि भी नहीं ,
फिर कीससे आस  लगाती है !
जीते जी उसकी किसी ने न सुनी ,
मरकर अब वो किसको अपना बतलाती है !
गुडिया ये रंग बदलती दुनिया है !
इसमें कोई न अपना है !
तू क्यु इक बार मर कर भी ...
एसे मर - मर के जीती है !
यहाँ एहसास के नाम पर कुछ भी नहीं ,
मतलब की दुनिया बस बसती है !
न कोई अपना न ही पराया है
लगता है हाड - मांस की ही बस ये काया है  !
जिसमें  प्यार शब्द का एहसास नहीं !
किसी के सवाल  का कोई  जवाब नहीं !
तू अब भी परेशान सी रहती होगी  ?
लगता है  इंसाफ के लिए रूह तडपती होगी !
अरे तेरी दुनिया इससे सुन्दर होगी ?
मत रो तू एसे अपनों को !
तेरी गुहार हर मुमकिन पूरी होगी !
तेरे साथ सारा ये जमाना है !
कोई सुने न सुने सारी दुनिया की ...जुबान मै
 सिर्फ और सिर्फ तेरा ही फसाना है !
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इंतजार

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मेरे इंतजार मै तू जो दो पल ठहर जाती !
तेरे गेसूं तले  फिर ये  शाम हो जाती !

तेरे दीदार पे मै ये जन्नत बिछा  देता !
मेरी ये जिंदगानी  खुशगवार हो जाती ! 
तेरी  नशीली आँखों का जो मै जाम पी लेता !
मयखाने  का तो रास्ता ही मै भुला देता  !
तेरी आह्ट  से जो तेरा पता मिल जाता !
तेरे क़दमों पे ही मै सारा जहाँ  पा  लेता  !
तेरे अश्कों को अपनी हथेलियों मैं लेके ,
तेरे हर गम को प्यार का मरहम देता !
तेरी हर ख़ुशी मै हरदम तुझ संग झूमता मैं 
अपने गम को शामिल उसमे हरगिज न करता !
जो तू कभी जान जाती मेरे इस प्यार को ,
तो तेरे सीने मैं सर रखकर  मैं बस रो देता !

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सावन की फुहार

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नाचत - गावत आई बहार 
क्यारी - क्यारी फूलों सी महकी 
चिड़ियाँ नाचे दे - दे ताल 
नाचत -  गावत आई बहार !
भवरों की गुंजन भी लागे 
जेसे गाए गीत मल्हार 
रंग बिरंगी तितली देखो 
पंख फैलती बारम्बार 
नाचत - गावत आई बहार !
मोर - मोरनी  भी एसे  नाचे  
जेसे हो प्रणय को तैयार 
थिरक - थिरक अब हर कोई देता 
अपने होने का  आगाज़ 
नाचत गावत आई बहार !
हर कोई अपने घर से निकला 
करने अपना साज़ - श्रृंगार 
सबका मन पंछी बन डोला 
मस्त गगन मै फिर एक बार 
नाचत -  गावत आई बहार !
चिड़िया असमान मै नाचे 
तितली गाए गीत मल्हार 
मै तो इक टक एसे देखूं 
जेसे मैं हूँ   कोई चित्रकार 
नाचत -  गावत आई बहार !

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महान चित्रकार

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                         ये हैं हमारे देश के जाने माने चित्रकार श्री नेक चंद सैनी जी जिन्होंने बिना किसी की मदद से अपने आप अपनी कला को निखारा और आज  चंडीगड़ का एक कोना इन्ही के नाम से जाना जाता है ! इनकी खुबसुरत कला ने इन्हें पदम श्री दिलवाने का भी हक अदा किया ! रॉक गार्डन  { Rock Garden } ये उस जगह का नाम है ! जहां पर इनकी खुबसूरत कलाकृतियाँ हैं जिसकी वजह से चंडीगड़ को इतनी उपलब्धि मिली औरआज इन्ही की वजह से  उसकी पहचान बड़ी  है  ! यहाँ बहुत सोची समझी और पर्यावरण को ध्यान मै रख कर बनाई  गई कला कृतियाँ हैं क्युकी यहाँ पर जो भी  चित्रकारी  की गई है वो सब बेकार चीजों के इस्तेमाल से की गई है ! एक बार सरकारी आदेश के तेहत इसे बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया गया था पर कुछ  लोगो की रज़ा मंदी से इसे पुन: बनाया गया ! उसके बाद  एक बार फिर से इसने अपना नया रूप दोबारा हासिल किया ! कहते हैं कुछ लोग जो  इनकी प्रसिद्धि सहन न कर पाए उनकी  वजह से ये  तोडा गया था !  आज के दिन यहीं  पर सबसे ज्यादा पर्यटक आते हैं और इसकी खूबसूरती को निहारते हैं !
    नेक चंद जी को उनकी खुबसूरत कला के लिए विदेशों मै भी खूब सराहना मिली ! उन्हें विदेश मै भी मिनी राक गार्डन बनाने के लिए भी बुलाया गया उन्होंने ख़ुशी - ख़ुशी इस काम को अंजाम दिया और इस तरह कई देशो मै अपने देश भारत की छाप छोड़ी और अपने आप को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर साबित किया ! उनकी रचनाएँ चीनी मिट्टी की चीज़े , चूड़ियाँ , मिट्टी के बर्तन , टूटी सेनेटरी की चीजों अदि से बनाई गई हैं ! इन सब चीजों को ये खुद अपनी साईकिल मै जाकर इकठ्ठा करते थे और झाड़ियों मै घुस - घुस कर इन सब चीजों को इकठ्ठा करते थे और अपने नोकरी  पूरी करने के बाद शाम को  घर जाकर इन्हें बनाते थे ! कुछ लोग तो समझने लगे थे की इन्होने अपना विवेक खो दिया है पर इनकी लगन इतनी थी की इनके पास इन विषयों पर सोचने का समय ही कहाँ था ! उनके अन्दर अपने काम की इतनी लग्न थी की वो एक मजदुर की तरह भी काम करते रहें ! उनके कुछ अधिकारी मित्रों ने उन्हें प्रोत्साहित किया की ये काम एक शांति  सन्देश के रूप मै अपनी जगह बना सकता है और उन लोगों ने इनका उत्साह बनाया और साथ भी दिया  !

                              नेक चंद जो हमे प्रेरित करते ही जिन्दगी एक उत्साह का नाम है इस पर भरोसा करो ! जिंदगी मै जो भी करो पूरी निष्ठां से करो उसका अंजाम क्या होगा वो खुद सामने आ जायेगा बस तुम अपना रास्ता तय करो और आगे बड़ते चलो फिर राह कितनी भी कठिन क्यु  न हो मंजिल मिल ही जाएगी ! क्युकी उन्होंने जब ये काम किया शुरू किया था तो कभी नहीं सोचा था की उन्हें पद्म श्री से सम्मनित किया जायेगा उन्होंने तो निस्वार्थ भाव से बस अपना काम किया और उसका अंजाम उनके सामने था तो इससे यही साबित होता है की अगर आपने कुछ करने की ठान ही ली है तो अपना 100 %  मेहनत लगा दो बाक़ी भाग्य खुद फ़ेसला करेगा !
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मै तेरा शिव, मेरी शक्ति तू है...

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उस मंजिल की महक तो होगी सुन्दर..
जहा चलना हो हाथ पकड़कर ..
राह अलग न ख्वाब जुदा है..
हर कदम गर साथ सदा है..
मै तेरा प्रिय तू प्रियतम है..
मेरे अधरों से निकली तू गजल है..

बता ये इत्तेफाक या समर्पण?
क्यों मेरे ख्वाब तेरी मंजिल है?
क्यों तुझ बिन मेरी सायरी अधूरी?
मेरी महक बिना तेरी कविता न पूरी?
सायद हकीकत ये हो जिंदगी की ...
सायद, मै तेरा शिव, मेरी शक्ति तू है...

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सुविचार- ’’श्रीगुरूजी’’

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‘‘यह अनिवार्य है कि मानव जाति को अपना अद्वितीय ज्ञान प्रदान करने की योग्यता के संपादन के लिये तथा संसार की एकता और कल्याण के हेतु जीवित रहने एवं उपयोग करने के लिये हमें संसार के समक्ष आत्मविश्वासी पुनरूत्थान शील और सामर्थशील राष्ट्र के रूप में खड़ा होना पड़ेगा।’’

’’श्रीगुरूजी’’

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पौधा एक फायदे अनेक

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तुलसी सुलभ, सुगम और निशुल्क उपलब्ध होने वाली वह औषधी है जो आपके जीवन को निरोगी एवं आत्मा का का शोधन कर उसे पवित्र बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती हैः

हिन्दूओ द्वारा सदियों से देवता के रूप में घर-घर पूजे जाने वाला पौधा ‘‘तुलसी (Holy Basil)’’ है। पर बहुत ही कम लोग यह जानते है कि यह पौधा मात्र धर्म और आध्यात्मिक तौर पर ही पूज्यनीय नहीं है वरन् इसके अन्य जीवनदायी गुण भी है जो इस पौधे की महत्ता में चार चांद लगा देते है।

आध्यात्मिक महत्वः- तुलसी का पौधा हमारे लिए धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व का पौधा है जिस घर में इसका वास होता है वहा आध्यात्मिक उन्नति के साथ सुख-शांति एवं आर्थिक समृद्धता स्वतः आ जाती है, वातावारण स्वच्छ एवं शुद्ध हो जाता है। तुलसी के नियमित सेवन से सौभाग्यशालिता के साथ ही सोच में पवित्रता, मन में एकाग्रता आती है और क्रोध पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। आलस्य दूर होकर शरीर में दिनभर फूर्ती बनी रहती है। देवता के रूप में पूजे जाने वाले इस पौधे ‘तुलसी’ की पूजा कब कैसे, क्यों और किसके द्वारा शुरू की गई इसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है परन्तु प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार देव और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के समय जो अमृत धरती पर छलका, उसी से ‘‘तुलसी’’ की उत्पत्ति हुई। भगवान विष्णु, योगेश्वर कृष्ण और श्री बालाजी के पूजन में तुलसी पत्रों का उपयोग किया जाता है। तुलसी पूजा का दिन विष्णु पुराण के अनुसार कार्तिक नवमी को तुलसी विवाह के रूप में उल्लेख किया है किंतु अन्य धर्म ग्रंथों में प्रबोधिनी एकादशी को शुभ एवं फलदायी बताया गया हैं इसी दिन गोधूली बेला में भगवान सालिगराम, तुलसी व शंख का पूजन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। लोग इस दिन तुलसी एवं भगवान सालिगराम का विवाह कर पूजा अर्चना करते है। यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है और मान्यता है कि इस दिन योगेश्वर भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते है और उसके बाद सारे शुभ कार्य करने शुरू किये जाते है।

औषधीय महत्व- औषधीय गुणों से परिपूर्ण पौराणिक काल से प्रसिद्ध ‘‘पतीत पावन तुलसी’’ के पत्तो का विधीपूर्वक नियमित औषधितुल्य सेवन करने से अनेकानेक बिमारिया ठीक हो जाती है। इसके प्रभाव से मानसिक शांति घर में सुख समृद्धि और जीवन में अपार सफलताओं का द्वार खुलता है। यह ऐसी रामबाण अवषधी है जो हर प्रकार की बीमारियों में काम आती है जैसे- स्मरण शक्ति, हृदय रोग, कफ, श्वास के रोग, प्रतिश्याय, खून की कमी, खॉसी, जुकाम, दमा, दंत रोग, धवल रोग आदि में चमत्कारी लाभ मिलता है। किडनी की पथरी में तुलसी की बत्तियों को उबालकर बनाया गया ज्यूस शहद के साथ नीयमित 6 माह सेवन करने से पथरी मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाता है। दिल की बीमारी में यह वरदान साबित होती है यह खून में कोलेस्ट्राल को नियंत्रित करता है।

बच्चों की आम बीमारियों जैसे सर्दी, बुखार, उल्टी दस्त आदि में तुलसी का रस लाभदायक है। यदि चिकनपॉक्स (माता) हो गया हो तो केसर के साथ तुलसी पत्र लेने से शीघ्र आराम मिलता है। तुलसी का रस आखों के दर्द, रात्रि अंधता जो सामान्यतः विटामीन ‘ए‘ की कमी से होता है के लिए अत्यंत लाभदायक है। तुलसी का पौधा जिस घर में हो वहा बैक्टिरिया जो की स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते है इन्हे पनपने नहीं देता।

सामान्य प्रयोग- (1) तुलसी की पॉच पत्तियॉं, 2 नग काली मिर्च का चूर्ण, रात को पानी में भीगी हुई 2 नग बादाम का छिलका निकालकर फिर उसकी चटनी बनाकर एक चम्मच शहद के साथ सेवन करें एवं लगभग आधा खण्टा अन्न-जल ग्रहण ना करे। (2). तुलसी के पत्तों को साफ पानी में उबाल ले उबाले जल को पीने में उपयोग करें। कुल्ला करने में भी इसका उपयोग कर सकते है। (3) 2-3 पत्तिया ले और छाछ या दही के साथ सेवन करें। बहुत सारी आयुर्वेदिक कम्पनियां अपने जीवनदायी अवषधियों में तुलसी का उपयोग करती है।

प्राकृतिक महत्वः- जिस घर में तुलसी का पौधा लहलहा रहा हों वहां आकाशीय बिजली का प्रकोप नहीं होता। तुलसी का पौधा जहां लगा हो वहा आसपास सांप बिच्छू जैसे जहरीले जीव नहीं आते। तुलसी के पौधे का वातावरण में में अनुकूल प्रभाव पड़ता है। हमारा प्रयास होना चाहिए की प्रत्येक घर में एक तुलसी का पौधा जरूर हो समाजसेवा का इससे अच्छा, सुलभता, सुगमता और निशुल्क उपलब्ध होने वाला और क्या उपाय हो सकता है।

(उक्त लेख स्वयं के अनुभव एवं विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखा गया है, गंभीर बिमारियों में आयुर्वेदिक डॉक्टर के सलाह अवस्य लें)

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अनेकता में एकता

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‘‘अनेकता में एकता का हमारा वैशिष्टम हमारे सामाजिक जीवन का भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में व्यक्त हुआ है। वह उस एक दिव्य दीपक में समान है जो चारों ओर विविध रंगों के शीशों से ढका हुआ हों। उसके भीतर का प्रकाश दर्शक के दृष्टिकोण के अनुसार भांति भांति के वर्णों एवं छायाओं में प्रकट होता है।’’

’’श्रीगुरूजी’’
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क्या है ये प्यार-व्यवहार-दुराचार या फिर "सहमति सेक्स"?

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                         मेरा पिछ्ला ही लेख सरकार द्वारा १२ साल तक के बालिकावो  और बालको को सहमति सेक्स देने सम्बन्धी विचाराधीन बिल पर आक्रोस के रूप में था.. जब इस लेख पर लोग प्रतिक्रिया कर रहे थे तभी मेरी आँखों के सामने और मेरे बहुत करीब एक ऐसी घटना घट गयी जिससे लगा.. जैसे कोई यह घटना करके मुझे सिर्फ यह भान दिलाना चाह रहा था कि इस बिल के पारित हो जाने के बाद इसका असर क्या होगा देख लो.. मेरा बचपन का मित्र है अपने सगे भाइ जैसा सुबह-सुबह मुझे उसका फ़ोन आया और वो यह घटना बताने लगा तो मुझे लगा की क्या ये मेरे ही लेख पर कोई प्रतिक्रिया है ? घटना मध्य प्रदेश में बैतूल जीले के एक छोटे से ग्राम मांडवा की है  मेरे दोस्त की भतीजी (बड़े भाई की बेटी) है उम्र १५ साल क्लास ९ वी में पढ़ती है.. उस ०२.०२.२०११ को २ लडको ने अपने साथ कार में बैठकर सुनसान इलाके में ले गए और उसके  साथ दुष्कृत्य किया..  बेहोस हो जाने पर उसे लाकर नगर के बस स्टैंड के पीछे यूं ही लावारिस छोड़ दिया... बेसुध अवस्था में लोगो ने उसे हास्पिटल में भर्ती करवाया.. 
                         पीडिता के अनुसार आरोपी युवक "कृषि उपज" खरीदने का व्यवसाय करता है इसी बहाने घर वालो के सामने और ना रहने पर भी उसके घर आते जाते रहता था.. उसने अपने ऐश्वर्य और प्रभाव से लड़की को अपने प्रेम जाल में फसा लिया.. और उसे विवाह के बाद के रंगीन सपने दिखाए.. घटना के दिन उसने लड़की को मिलने के लिए जिला केंद्र बैतूल बुलाया.. पीडिता अपनी सहेली के साथ अपने गाव से बस के द्वारा जिला केंद्र गयी..  पीडिता की सहेली वहा से स्कूल चली गयी.. वही से अपराधी ने अपनी वेंन में पीडिता को बैठा लिया और थोड़ी दूर से अपने एक साथी को भी बिठा लिया... नगर के बाहर लगभग २० किमी दूर "ताप्ति घाट" ले गए वन क्षेत्र में ले जाकर उसके साथ दुष्कृत्य किया... जब पीडिता बदहवास हो गयी तो उसे वापस नगर में ले आये और उसे बस स्टेंड के पीछे सुनसान में छोड़ आये... पीडिता ने होश में आने पर अपने सरीर पर लगे ब्लीडिंग के धब्बे सार्वजनिक सौचालय में धोये... उसे चक्कर आने लगे तो आसपास के लोगो को इस बात का भान हुवा.. तब पोलिस की मदद से उसे हास्पिटल में भर्ती किया गया.. रातभर उपचार के बाद सुबह पीडिता को होश आया और आगे की कार्यवाही सुरु की जा सकी..दुसरे दिन उसे होश और पोलिस का काम सुरु हो इसके पहले ही अपराधी के सारे चाहने वाले और परिवार वाले आ गए पीडिता और पोलिस पर अपनी राजनैतिक पकड़ की धौंस जमाने.. इसका असर देख लीजिये पोलिस जहा रात में पीडिता की हमदर्द थी उसके सुबह होते होते सुर बदल गए.... अपराधी को बचाने के लिए उसके मातहत हास्पिटल के आसपास उनकी ऐसे भीड़ लगी हुई थी मानो उनके लाडले ने कोई मेडल जीत लिया हो.. बार-बार पीडिता के परिवार को समझौते के लिए दबाव बना रहे थे, मान मनौव्वल कर रहे थे:- हो गया बेचारे लड़के से, अब उसकी जिंदगी बर्बाद हो जायेगी.. उसे इस बार जाने दो, उसे हम घर में ही सजा दे देंगे, उसे यहा से कही और भेज देंगे वगैरह वगैरह... इतने दबाव के बावजूद पोलिस को रिपोर्ट लिखनी पड़ी क्योंकि ओ भी क्या कर सकती थी जब सबूत सामने था आखिर रिपोर्ट लिखाई गयी और पीड़ित बालिका का जो बयान आया प्रथम द्रष्टया तो ऐसा लगा मानो यह "किशोर सहमति सेक्स" का मामला हो.. ओ तो सुकर है की कम उम्र के लिए अभी सहमति सेक्स का बिल विचाराधीन है.. वरना अगर ये पास हो गया होता तो अपराधी साफ़ बच जाता..  
                       उक्त घटना को हम क्या कहेंगे? यदि अपराधी की नजर से देखा जाए तो यह तो सहमति सेक्स ही कहलायेगा.. लेकीन मानवीय नजर से देखे तो क्या इस तरह एक नाबालिक किशोरी को बहकाकर उसके साथ अमानवीय कृत्य किया जाना उचित है? प्यार में तो साथी का एक आंसू भी देख नहीं सकते पर यहाँ पीडिता के साथ दुष्कृत्य किया गया और फिर उसे उसी हालत में सुनसान स्थान पर छोड़ दिया गया अपनी आगे की जिंदगी इसी अँधेरे में जीने के लिए क्या यही प्यार है? हमारे देश में "सहमती से सेक्स" जो बाद में धोके में बदल जाता है को प्यार की श्रेणी में रखा जाता है, और उसके द्वारा लगे जख्मो की गहराई नापे बगैर ही अपराधी को सहानुभूति मिल जाती है.. हमारे देश में इस तरह की घिनौनी घटनाओ का ग्राफ इतना अधिक बढ़ता जा रहा है कि अब सायद हमें इनके खात्मे के लिए नए सीरे से सोचना ही होगा.. पर इसके लिए इस अपराध को कानूनी मान्यता तो कम से कम ना ही दे.. इसके अलावा भी बहुत से रास्ते हो सकते है..
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संघर्ष ही जीवन

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                                   जिंदगी अपने आप मै एक अजीब कहानी है ! इसके अपने कई - कई पहलूँ हैं जिसमे से होकर हमें  अक्सर गुजरना पड़ता है ! कभी इसके अनुभव बहुत कडवे होते हैं जो हमेंदर्द का एहसास देते हैं  तो कभी इतने   मीठे और  सुखद  की वो  जिन्दगी से  दूर हमे जाने ही नहीं देते ! पर वास्तविकता  यही है की सुख और दुःख दोनों हमारे जीवन  की सच्चाई है और दोनों ही पहलूँ हमें कोई न कोई सीख ही दे कर जाती है ! दोनों ही हमें जीवन मै आगे  बड़ते रहने की प्रेरणा देते रहते हैं क्युकी ये तो तय है की वक्त कभी  किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता वो तो अपनी गति से चलता ही रहता है हमें ही उसके साथ चलते रहने की लिए  कदम से कदम मिलाकर  उसकी रफ़्तार को पकडे रहना पड़ता है ! वेसे तो ये एक साधारण  सी 19 वर्ष की लड़की की एक एसी कहानी है जिसका  विश्वाश और द्रिड निश्चय  हमारे जीवन मै जीने के होंसले को बुलंद  करती है की अगर मन मै जीने की चाह और दिल मै उमंग हो तो हम अपनी मेहनत और लग्न से हर बुलदियों को छु  सकते हैं ! क्युकी हमारे होंसलें हमें वहां तक ले जाने मै पूरा - पूरा साथ देते  है !
                                                 माली (MALI) एक 19 वर्षीय बेले नर्तकी  थी जो एक कार दुर्घटना मै अपना बयाँ  हाथ गवां देती है उसका दोस्त उसे इस हालत मै देखते ही छोड़कर चला जाता है अब उसकी जिंदगी उसे वीरान लगने लगती है वो अपने आप को सँभालने की बहुत कोशिश करती है पर एक दिन हार कर अपने आप को खत्म करना चाहती है पर परिवार वाले उसे समझाते  हैं और उसे आगे बड़ने को प्रोत्साहित करतें हैं तो माली एक बार फिर से वही हिम्मत और होंसले को अपने अन्दर विकसित करती है और नए सिरे से अपनी जिन्दगी की शुरुवात  करती है की वो अब केसे लिखेगी , केसे बाल बनाएगी ,  केसे कपड़े धोएगी  ओर किस तरह से अपना खाना बनाएगी और इन सब के साथ वो अपने जीवन को फिर से एक दिशा दे पायेगी !
                               5  साल के बाद उसके अन्दर फिर से वही जोश और उमंग सर उठाने लगता है और वो एक बार फिर से उसी जोश के साथ  अपने नृत्य को जारी रखने के लिए थियटर जाती है पर तब तक वहां बहुत कुछ  बदल चुका था पर फिर भी उसके होंसले बुलंद  थे और वो  हार नहीं मान सकती थी  ! वहां उसे अपना एक हमदर्द दोस्त मिलता है  जो  उसकी मदद करने को राज़ी हो जाता है  पर उन    दिनों  2004  मे चीन में सार्स फेलने की वजह से सभी सिनेमाघर बंद हो गये थे  और वो अपने  नृत्य        का प्रदर्शन न कर पाई  पर फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी उसने अपने साथी कलाकार के साथ वो नृत्य बर्फ मै किया और उसे पसंद किया गया और उसका अपने ऊपर और बढ गया !                          
                           सितम्बर 2005 मै उसकी  मुलाकात राष्ट्रिय साइकलिंग ओलंपिक चेम्पियन जही क्सिओवेई ( zhai xiaowei ) से हुई ! जब जही 4 साल का था ट्रेक्टर से गिर गया था उस  उस दोरान उसनेअपना बायाँ पैर खो दिया था ! उस समय जब जही के पिता ने अपने 4 साल के बेटे से पूछा "   डाक्टर तुम्हारा पैर काटना चाहतें हैं क्या तुम तैयार हो ! " जही उस वक़्त इस बात को नहीं समझ सकता था वो बोला नहीं ! पिता ने फिर कहा " तुम्हें जिंदगी मै बहुत सी चुनोतियों  और कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है ! तुम घबराओगे तो नहीं ? जही ने पूछा ... क्या होती हैं ये कठिनाइयाँ और चुनोतियाँ ? क्या इनका स्वाद  अच्छा होता है ? उसके पिता  हँसे और उनकी आँखों से आंसूं आ गये और उन्होंने कहा " हाँ वो तुम्हारी मिट्ठी केन्डी की तरह होती है , तुम्हें सिर्फ उन्हें एक वक्त में एक  खाने की आवश्कता होती है ! " ( और इतना कहते ही पिता आंसुओं के साथ बाहर की और चले गये ! ) जही हमेशा एक आशावादी और महान विचारक की तरह खेलते रहें ! जब माली ( MALI ) ने पहली बार उससे नृत्य करने को कहा तो वो समझ नहीं पा रहें थे  की ये केसे संभव हो सकता है पर उसने विश्वास के साथ हांमी  भर दी की वो कोशिश जरुर करेगा ! जही और माली ने दिन रात मेहनत की ! इस दोरान वो बहुत बार गिरा पर फिरभी वो  उससे दुगनी ताकत से फिर से जुटा  रहा  और उनकी मेहनत एक दिन रंग ले आई !
                                माली और जही एक एसी पहली विकलांग जोड़ी थी जिसने पहली बार  सी . सी . टी . वि राष्ट्रिय नृत्य प्रतियोगिता मै भाग लिया था और लाखों  दिलों को जितने मै सफल हुई थी तो ये कहानी हमें  एक जोश और साहस से जीने की राह दिखाती  है की मंजिल कितनी भी दूर सही होंसला बनाये रखने वालों को मंजिल मिल ही जाती है !
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बाल सेक्स करने की इजाजत देने से पहले.......!

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आज सुबह उठा और जैसे ही पेपर हाथ में लिया तो हमारी देश नपुंसक केंद्र सरकार के एक और काले कारनामे पर मेरी नजर पड़ी वो लोग 12 साल के बच्‍चों को भी आपसी सहमति से सेक्‍स करने की इजाजत देना चाहते है.. उसके पीछे तर्क यहाँ है कि वे बच्‍चों को यौन अपराधों से सुरक्षा दिलाना चाहते है..

जिस अपराध को ये रोकना चाहते है उस रोकने के लिए कानून बनाने के बजाये उसे सामान्य व्यवहार में लाना चाहते है... ताकि बाद में देश के सामने पीठ थपथपा सके कि देखो हमने योन अपराधो पर रोक लगा दी.. ये तो वैसे ही हुआ जैसे किसीका खून करना अपराध है, कही डाका डालना, चोरी करना अपराध है तो इन्हें कानून द्वारा मान्यता दे दी जाए जिससे होगा ये की चाहे लोग जितना भी अपराध करे लेकिन ओ अपराध नहीं कहलायेगा वो राष्ट्र कि संस्कृति कहलाएगी... इन्होने देश को भ्रष्टाचारी तो बना ही दिया है अब सम्पूर्ण देश को बाल अपराधी बनाना चाहते है.. भारतीय संस्कृति को पुर्णतः वैश्यालय बना देना चाहते है..

जिस महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से यह बिल भेजने की बात चल रही है उसके मुखिया का नाम मैंने ढूँढना चाह तो श्रीमती कृष्णा तीरथ का नाम सामने आया.. सोचकर हैरानी होती है कि एक महिला होकर वो इस प्रकार कि कलुषित सोच रखती है ... क्या यह कांग्रेसी संस्कृति का असर है? या वे पागल हो गयी है? या वे भी इटली या अमेरिका की अगेंट बन गयी है? इनके इस तरह के पागलपन को जनता कभी स्वीकार नहीं करने वाली है..

बाल अपराध बढेगा..
१२ की जिस उम्र में ये लोग बच्चो से सेक्स करवाना चाहते है उस उम्र में उनकी इतनी समझ नहीं होती की अच्छा क्या है और बुरा क्या है.. अगर उन्हें इतनी छोट दे दी जाए तो हमारे देश में पहले से ही पाँव फैलाए बैठा बाल अपराध के मार्केट को लाइसेंस मिल जाएगा.. अभी रोक है तो अपराध कहलाता है, जब रोक ही नहीं होगी तो हर मामले में अपराधी यह बोलकर साफ़ बच जाएगा कि यह सेक्स हम दोनों की सहमति से हुआ है.. ब्लू फिल्मो का व्यवसाय करने वालो की चांदी कटेगी ये लोग हम उम्र बच्चो को सेक्स करने के लिए प्रेरित करेंगे और फिर उनकी अश्लील विडियो बनाकर धडल्ले से बेचेंगे... उसे रोकने का समर्थ तो सरकार में ना कभी था ना ही कभी होने वाला है वो बस इतना ही कर सकती है कि इन सबको कानूनी मान्यता ही दे डाले..

बालपन ख़त्म हो जाएगा
१२ साल की उम्र में बच्चे नासमझ ही होते है उन्हें अच्छा क्या है बुरा क्या है इसका ज्ञान नहीं होता उन्हें ज़रा सी बात पर बहकाया जा सकता है.. उन्हें ये नहीं पता होता कि असल में ये प्यार, सहमति, सेक्स क्या होता है.. कोई भी उन्हें इस बात पर बहका सकता है कि मै तुम्हे प्यार करता हू और इस उम्र में भी सेक्स किया जा सकता है.. उन्हें जब इस बात का चस्का लग जायेगा तो उन्हें फिर वापस लाना बहुत मुस्किल है..

बचपन वैश्यालय बन जायेगा एड्स को बढ़ावा मिलेगा
बचपन में बच्चो का मन बहुत ही चंचल होता है, ना तो एक जगह टिकता है और ना ही एक चीज पर स्थिर रहता है.. दोस्त भी बनते है बिछड़ते है और फिर दुसरे आ जाते है.. कुछ दिन कोई अच्छा लगता है फिर कोई और अच्छा लगने लग जाता है.. अभी दर है कि सेक्स ठीक नहीं है इसलिए काफी कण्ट्रोल है... अगर छूट मिल गयी तो बच्चे लगभग हर अच्छे लगने वाले साथी के साथ सेक्स का मजा लेने के लिए प्रेरित होंगे और बच्चो का बचपन वैश्यालय कि तरह हो जायेगा और उस से एड्स को बढ़ावा मिलेगा.. अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देसों में जहा बचपन में सेक्स की छूट है वहा शादी करने की उम्र तक बच्चे कई प्रकार के योन रोगों से ग्रषित हो जाते है.. और वैवाहिक जीवन नरक हो जाता है..

शिक्षा पर असर पड़ेगा..
अभी बच्चो को यह पता होता है कि १८ साल से पहले शारीरिक सम्बन्ध अच्छा नहीं होता है.. इसलिए वे फालतू बाते छोड़कर अपनी पढाई पर ज्यादा ध्यान देते है.. पर जब उन्हें सेक्स की व्यावहारिक छूट मिल जाएगी तो उनका ध्यान पढाई कि बजाये सेक्स पार्टनर ढूँढने में ज्यादा रहेगा.. सेक्स जैसे महत्वपूर्ण फैसले पर बहुत गौर करने की जरुरत है.. जहा देश की जनता ने सेक्स शिक्षा को स्कूली पध्यक्रम में स्वीकार नहीं किया तो क्या व्यवहार में लाने के लिए तैयार हो जायेंगे ?
ऐसे बहुत से ऐसे मुद्दे है जिनपर सोचने की जरुरत है.. अपराध को काम करने का मतलब ये नहीं होता कि उस स्वीकार ही कर लिया जाये.. यदि उस ख़त्म करना है तो उसके तरीके निकालना होगा.. किसी भी योजना को सुरु करने से पहले उसका प्रक्टिकली परिक्षण किया जाता है.. यही हर राष्ट्र की परंपरा रही है और इसीका निर्वहन हमें भी करना चाहिए..

मेरा सुझाव:-
यदि हमारे केंद्र सरकार को ऐसे बेतुके कानूनों से इतना ही मोह है तो इसे सार्वजनिक करने से पहले इसका प्रयोग सबसे पहले उन्हें अपने बच्चो से ही करना चाहिए... अक्सर जो वैज्ञानिक नयी-नयी खोज करते है उसका प्रक्टिकल वे सबसे पहले स्वयं पर ही करते है.. तो ऐसा ही हमारी केंद्रीय सरकार को भी करना चाहिए..
सबसे पहले वे अपने १२-१३ साल के बच्चो-नाती, पोतो को इस बात की जानकारी दे और उन्हें सेक्स करने की छूट दे दे.. उनके लिए सेक्स पार्टनर तलासने में उनकी मदद करे.. जब मिल जाये तो उनसे अपने सामने सेक्स कराये.. उनकी मानसीकता जांचे, उनसे उनके अनुभव के बारे में पूछे.. अगर संभव हो तो सेक्स के समय वहा उपस्थित रहे.. अगर उनका अनुभव ठीक रहा तो ही इस कानून को देश पर धोपा जाये.. अन्यथा उन्हें कोई हक नहीं है देश के के भविष्य इन नन्हे मुन्नों के बालपन से खेलने का.
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परदे में रहकर उन्हे बेपरदा करो इतने बेशर्म न हो

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नगर भ्रमण करते-करते कुछ यूवक, युवतिया रूमाल से पूरे चेहरे को लपेटे हुए पैदल व वाहनों पर नजर आये। मेंरे मन में खयाल आया कि आधुनिक तड़क-भड़क संस्कृति के अंग ये युवा जो अर्धनंग कपड़ो से परहेज नहीं करते। उन्हे ऐसी कौनसी शर्म आने लगी जो उन्हे चेहरा ढकने की जरूरत पड़ने लगी? मैं सोचने पर विवस हो गया कि इस तरह चेहरा तो गर्मियों से बचने के लिए युवतियां, युवतियां बांधती है। फिर इस ढण्डी के कट्टरवादियों के पारम्परिक पहनावें की क्या जरूरत पड़ गई आज की यंग ब्रिगेड को? मुझे इस तरह से चेहरा ढकने और इस्लाम के परदा प्रथा में समानता नजर आई। पर लेख का मूल उद्वेश्य है परदा प्रथा की भारतीय समाज में घुसपैठ और क्या इस पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है?
विश्व के कई देशो में यदा-कदा परदा प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठती रही है। कुछ देशो ने तो पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध भी लगा दिये है और कुछ लगाने की तैयारी कर रहे है। सर्वप्रथम हम यह जान ले कि परदा प्रथा होती क्या है? परदे के चार रूप होते है जिसमें 1) हिजाब (सर ढकना), 2) जिजाब (एक वस्त्र जो केवल हाथ और चेहरे को खुला रखता है), 3) नकाब (आंखो को छोड़कर बाकी सब आवृत रखता है), 4) बुर्का (सम्पूर्ण सर और शरीर ढकना)। विश्व पटल पर इस प्रथा का प्रचलन को काफी पुराना है परन्तु भारत में यह प्रथा इस्लामिंक देन है। इतिहास में इस्लामिक आक्रमन के समय महिलाओं के साथ किये जा रहे दुर्व्यहार के कारण अपने आत्मसम्मान की रक्षार्थ महिलाओं द्वारा धारण किया गया यह लिवास आग चलकर एक परम्परा बन गया। 
आत्मसम्मान बचाने हेतु अंगिकार की जाकर सामान्य जीवन की आवश्यकता बनी इस प्रथा के दुरूपयोग होने के कारण इसे खत्म करने हेतु एड़ी चोटी का जोर लगाया जा रहा है। इसका उपयोग आतंकवादी, लुटेरे, चोर और अवैध व्यापार करने वाले लोग कर अपनी पहचान छुपाने के लिए है। इस बुर्के के कारण समय-समय पर इस्लाम के कायदे-कानूनों पर खूब सवाल उठाये जाते रहे है। सवाल ये है कि क्या सिर्फ ईस्लाम में ही बुर्के का उपयोग किया जाता है? मेरे विचार में बुर्का सिर्फ ईस्लामिक परम्परा की मजबूरी न रहकर आज के आधुनिक समाज की सामान्य जरूरत बन गया है। इससे भी एक कदम आगे 19 वी सदी के पारम्परिक रीति-रिवाजों और 20 वी सदी के आधुनिक विचारों के बीच सामजस्य बैठाने का एक उत्तम जरिया है ये बुर्का। फर्क सिर्फ इतना है कि ईस्लाम में शरीर ढकने वाले इस साधन को पारम्परिक तौर पर इस्तेमाल जाता है। जबकि अन्य धर्म इसे शौक या जरूरत के लिए आवश्यकतानुसार पूर्ण या आंशिक रूप में इस्तेमाल करते है। बहुत सारे देशो ने तो इस प्रथा की कुरीतियों को देखते हुए प्रतिबंध लगा दिया जिसमें इस्लामिंक मत वाले देश अग्रणी रूप से शामिल है। सर्वधर्मसमभाव वाले देश ’’भारत’’ में जहां धर्म की बात करना ही कट्टरता कहलाता है बुर्का प्रथा पूर्णतः खत्म कर पाना आसान होगा? 
धार्मिक कट्टरता और परम्परा से इतर आजकल नगर, मुहल्ले, ग्राम हर तरफ आम प्रचलन बढ़ चला है धूप से बचने के लिए युवक-युवतियां अपने मुह को रूमाल, गमछा या ओढ़नी से पूरी तरह से ढक लेते है। सफेद, हरे, नीले, पीले हर तरह के बुर्का, रूमाल, गमछे (स्कार्फ) बाजार में उपलब्ध होते है जिनका उपाय धूप से बचने के लिए किया जाता है। आज आप किसी भी युवक या युवती को देख लीजिए चाहे वे स्कूल जाये, कॉलेज जाये, घूमने जाये ‘‘परदा’’ का उपयोग ये ’’स्कार्फ (रूमाल)’’ के रूप में करते है। ये घर से निकलते समय ही अपने चेहरे को एक स्कार्फ से ढक लेते है। यह सिर्फ दोपहर में धूप से ही बचने के लिए उपयोग नहीं किया जाता बल्कि सुबह हो या शाम हर समय यह चेहरो पर देखा जा सकता है।
आज का युवा 19 वी और 20 वी सदी के बीच झूल रहा है। वह 20 वी सदी में जीना तो चाहता है पर बगैर 19 सदी को नाराज किये। इसके लिए उसे इस ‘‘परदे’’ की शख्त जरूरत है। विस्तार में इस तथ्य को समझने हेतु इस उदाहरण देता हूं। एक युवक है और युवती दोनो बीसवी सदी की संस्कृति में रचे-बसे है और एक दूसरे से सम्बंध होने की बात भी स्वीकार करते है। इन दोनो ही के परिवार है जो इन्हे बहुत चाहते है। ये भी अपने-अपने परिवार का बहुत मान करते है। साथ ही आस-पड़ोस, रिस्ते नाते सभी की ये इज्जत करते है। इनका परिवार 19 वी सदी के पारम्परिक संस्कारों के आधीन है। इस कारण ये दोनो कभी ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते जिससे परिवार, समाज और नगर में इन पर कोई उंगली उठा सके। इन्हे इनके परिवार का मान किसी भी कीमत पर रखना है। इनके मन आधुनिक होने के कारण आधुनिकता के सारे रंग भी जी लेना चाहते है। इसका उपाय इन्होने यह निकाला की ये जब भी दोनो साथ निकलते है, किसी पार्क में जाते है, किसी सार्वजनिक स्थान पर मिलते है तो लड़की एक ‘‘स्कार्फ (रूमाल)’’ अपने चेहरे पर लपेट लेती है। इसके उपयोग कर वे खुलेआम शहर की गलियों में घूम लेते है। पहचान छुप जाने से इनके दोनो ही मनोरथ पूरे हो जाते है। शादी से पूर्व किसी लड़के के साथ देखे जाने के कलंक  से बचना साथ ही अपने आधुनिक विचारों के पंखो को उड़ान देते हुए अपने साथी के साथ खुलेआम दूनिया के सामने अपना प्रेम भी अभिव्यक्त कर देते है।
भारत के कई क्षेत्र है जहां हिन्दू धर्म में बुर्का प्रथा प्रचलित है जिसे स्थानीय भाषा में परदा प्रथा या घूंघट के नाम से जाना जाता है। यहां इस प्रथा कि इतनी अधिक घुसपैठ है कि बहु बेटिया अपने बड़े बुजुर्गाे के सामने बिना सिर ढके बाहर नहीं निकल सकती। यूवतियों को समाज से थोड़ी बहुत छूट मिल जाती है विवाह तक उनपर उतनी शख्ति नही होती। परन्तु विवाह के पश्चात् पत्नि का चेहरा तो मायके वालों और पति के अलावा शायद ही कोई भाग्यशाली हो जो देख पाता हो। यही नहीं देश के कोने कोने में यह प्रथा किसी न किसी रूप में किसी न किसी नाम से चलन में है। देश में उच्च शिक्षित एवं सम्पन्न परिवारों को अगर छोड़ दिया जाय तो लगभग सभी जाति वर्ग और समाज पर इसका असर देख सकते है। फिर क्यूं हम एक ऐसी रूड़ीवादी कट्टर परम्परा जिसमें हम स्वयं बराबर के भागीदार है इसे ‘इस्लाम’ पर थोपते है। 
सर्वधर्म समभाव वाले भारत में जहां ’’बुर्का’’ किसी एक धर्म की सम्पत्ति न होकर देश के प्रत्येक धर्म और वैचारिक मतों में आस्था, परम्परा या जरूरत के रूप में अपनी पकड़ बनाये हुए है। इसे प्रतिबंधित कर पाना आसान न होगा। जहा अन्य धर्मो के अनुयायी इस प्रथा को किसी न किसी रूप में संरक्षण दे रहे है। तब इसे इस्लामिंक परम्परा मानकर मानकर कट्टरता की आड़ में यदि इसके एक स्वरूप पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो फर्क सिर्फ इस्लाम को नहीं पड़ेगा पीड़ित हर भारतीय होगा। मेरे विचार में बुर्का पर प्रतिबंध लगाने से पहले इस पर गम्भीर सोच विचार करने की जरूरत है। इन्हे इन्ही स्वरूप में रहने देते हुए सिर्फ इनकी कुरीतियों को दूर करने की आवश्यकता है। भारत अपनी स्वयं की सांस्कृतिक रचना के अनुसार चलता है। यहां थोपी गई संस्कृति या परम्परा नहीं टिक सकती। कोई बाहरी चीज आती भी है तो वह तभी स्वीकार होगी जब उसका सामाजिक जीवन में व्यापक उपयोग हो और उसके नुकसान से अधिक फायदे हो। 


‘‘उन्हे बेपरदा करने तो चले शान से
जब उनका पर्दा उतरे तो खयाल रहे,
उन्हे बेपरदा देखो तो चेहरे पर शर्म का पर्दा न हो,
और परदे में रहकर उन्हे बेपरदा करो इतने बेशर्म न हो।।‘‘

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