‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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अन्ना का यू-टर्न

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राजीव खण्डेलवाल:

राजनीति में बयान देना, उससे पलटना और उससे फिर पलट जाना ये ‘आम’ बात है। वैसे तो राजनेताओं में यह बीमारी ‘आम’ है, लेकिन इस बीमारी की छूत आजकल सामाजिक, व धार्मिंक नेताओं में भी लग गई है। खासकर आज की स्थिति में तो भारतीय राजनीति में यह बात तो और भी ‘आम’ है, जैसे यहां हर ‘आम’ आदमी ‘आम’ है। भारत का का ‘आम’ भी बहुत प्रसिद्ध है। अर्थात यहां हर चीज ‘आम’ है। आम घटनाओं का ‘आम’ होने के कारण ‘आम’ प्रतिक्रिया के कारण ‘आम’ लोगो का ध्यान इस तरफ केंद्रित नहीं होता है। लेकिन बात जब अन्ना की हो तो वह ‘आम’ नहीं बल्कि खास हो जाती है। उसकी प्रतिक्रियाएं हल्के में नही ली जा सकती। अन्ना यद्यपि अपने आपको एक सामाजिक कार्यकर्ता कहते है, राजनीति से दूर मानते है और वास्तव में वे आज के राजनीतिक माहौल के राजनैतिक है भी नहीं। फिर भी वे आज देश की सम्पूर्ण राजनीति के धूरी के केंद्र बिंदु है। पिछले दो वर्षो से देश की राजनीति की दिशा-दशा को वे प्रभावित कर रहे है। इतिहास की सैकड़ो पुस्तकें ऐसे महानायकों की गाथाओं से भरी पड़ी है जिन्होने कभी कुछ कह दिया तो आजीवन उन शब्दों पर अडिग रहे। अपनी परम्परा, आन-बान और शान को बनाए रखने के लिए ‘‘रघुकुल रीत सदा चली आयी, प्राण जाही पर वचन न जाही’’ के कथन को सार्थक किया। परन्तु समय के साथ ही मानव जीवन के मूल्यों का धीरे-धीरे इस तरह क्षरण हुआ कि आज महापुरूषों के कथन भी ‘आम’ लोगो की तरह ही ‘आम’ होने लगे है।
                आज के मीडिया मे यह सुर्खियां छायी रही की अन्ना ने यू टर्न लिया मुद्दा प्रणव मुखर्जी के प्रधानमंत्री के पद पर समर्थन का था। इससे पूर्व उन्होने अन्ना टीम की राय के विपरीत प्रणव मुखर्जी को उपलब्ध उम्मीदवार में सबसे उपर्युक्त बताया था। बाद में अपने बयान से उन्हे पलटते देखा गया। अन्ना के यू टर्न को यह प्रथम अवसर नहीं है बल्कि इसके पूर्व भी इस तरह के वाक्ये हुए है जिनमें से कुछ उदाहरण निम्नानुसार है-
1. हिसार उपचुनाव में यूपीए के खिलाफ अभियान चलाने और उसका घोर विरोध करने के बाद अन्ना का यह बयान कि अगर यूपीए शीत ऋतु के संसद के अधिवेशन में मजबूत लोकपाल बिल लेकर आती है तो वे उसके साथ मिलकर काम करने को तैयार है।
2. पिछले दिनों अन्ना ने कोल आवंटन मामले के दस्तावेज देखने के बाद कहा था कि मैं इन दस्तावेजों के देखने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ईमानदार व्यक्ति नहीं कह सकता। इस मामले में कोई न कोई गड़बड़ी जरूर हुई है। मेरी पूरी टीम ने जो भी आरोप मनमोहन और उनकी टीम पर लगाए हैं वे सत्य हैं। वे बाद में महराष्ट्र में एक रैली को संबोधित करते हुए और बाद में एक निजी बातचीत में भी उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री तो ईमानदार है पर कुछ लोग हैं जो संप्रग में गड़बड़ हैं।
3. अगस्त 2011 आंदोलन के सम्बंध में अन्ना हजारे चौबीस घंटे भी अपने दिए बयान पर कायम नहीं रहे। अन्ना हजारे ने पहले कहा था कि यदि जंतर-मंतर पर अनुमति नहीं मिलेगी तो अनशन के लिए अन्य स्थल का निश्चित किया जाएगा और बाद में पत्रकारों के सामने फिर से कहा कि 16 अगस्त से जंतर-मंतर पर ही अनशन होगा।
4. नवम्बर 2011 में अन्ना हजारे के लिखे एक अप्रकाशित ब्लॉग को उनके ब्लॉगर राजू परूलेकर द्वारा सार्वजनिक करने के चलते पैदा हुए विवाद के बाद गांधीवादी कार्यकर्ता ने फैसला किया था कि वह अपना ब्घ्लॉग बंद कर देंगे। राजू परूलेकर ने अपने ब्लॉग में लिखा कि हजारे ने स्वीकार किया था कि जब उनके साथियों पर आरोप लग रहे थे तो उन्होंने कई बार अपनी टीम को बदलने के बारे में सोचा था। अन्ना हजारे ने इन सभी बातों पर सफाई देते हुए कहा था कि यह सब बातें हवा में हो रही हैं।
5. अक्टूबर 2011 में कश्मीर में जनमत संग्रह की बात करने वाले प्रशांत भूषण को लेकर अन्ना हजारे प्रशांत की राय से पूरी तरह से किनारा करते हुए उसे प्रशांत का निजी विचार बताया। इसके साथ ही अन्ना ने कहा कि प्रशांत भूषण टीम अन्ना में रहेंगे या नहीं, इस पर आगे फैसला लिया जाएगा। कुछ देर बाद अपने ब्लॉग पर जारी बयान में अन्ना अपनी बात से पलट गए और कहा कि प्रशांत भूषण उनकी टीम के अहम सदस्य हैं और आगे भी बने रहेंगे।
6. अप्रेल 2011 में उन्होंने सभी नेताओं को भ्रष्ट बताया था। बाद में अन्ना ने यह साफ किया कि उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि सभी नेता भ्रष्ट हैं।
                जब अन्ना जैसे व्यक्तित्व यदि वास्तव में अपने बयानों से पलटते ही नहीं है बल्कि यू टर्न ले लेते है वह भी बिना किसी स्पष्टीकरण के कि पूर्व में जो उन्होने बयान दिया था वह गलत था और अब मेरा मत और जानकारी प्राप्त होने पर बदला है तब निश्चित रूप से इस देश की जनता के माथे पर चिंता की लहर इस बात के लिए उत्पन्न होती है कि क्या अन्ना भी अन्य राजनेताओं और सामाजिक या धार्मिंक नेताओं के समान अपने बयान सुविधा की राजनीति अनुसार पलटने लगे है? यदि वास्तव में ऐसी स्थिति बन रही है तो फिर आज की स्थिति में हमारे पास अब ऐसा कौनसा व्यक्तित्व बच गया है जो सार्वजनिक जीवन के इस रोग से अब तक अछूता है। अन्ना के बाबत आम राय लोगो की अभी तक यही रही कि उनकी कथनी और करनी में उतना अंतर नहीं है जितना अन्य सार्वजनिक जीवन जीने वाले नेताओं के व्यक्तित्व में है। इसलिए अन्ना के यूट टर्न होने पर आम जनता के सामने ऐसा कोई बहतर चेहरा सामने नहीं है, जो उक्त स्थिति का सामना कर सके। इसलिए फिलहाल तो उसकी आंखो के आगे अंधेरा ही अंधेरा है और यह अंधेरा तभी हटेगा जब या तो कोई दूसरा व्यक्तित्व ऐसा आ जाए। यदि नहीं तो अन्ना को यू-टर्न से वापिस अपनी मूल स्थिति में लाना व बनाये रखकर हमारी मजबूरी होगी।

(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)


3 Responses so far.

  1. Anna has to be supported in spite of his changing statements in certain respects, we should support him just for striving tirelessly for stopping corruption.

    Krishna Khandelwal

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