‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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लोकतंत्र को बचाने के लिए, लोकतंत्र में सीधे भागीदारी करने का गैर राजनैतिक संत का निर्णय कितना उचित?

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                   टीम अन्ना ने इस घोषणा के साथ कि देश के लिए ‘राजनैतिक विकल्प’ देना जरूरी है और बिना सत्ता में आये वे राजनैतिक विकल्प देंगें अनशन समाप्त करने की घोषणा कर दी। मतलब अन्ना अभी तक जिस वर्तमान राजनीतिक तंत्र की लगातार आलोचना कर रहे थे अन्ना उसमें अपने समर्थको की भागीदारी कराकर उक्त तंत्र का भाग बनेंगे। वास्तव में यह एक लोकतांत्रिक एवं लोकतंत्र को मजबूत करने वाला निर्णय है। इसलिए कि लोकतंत्र में कोई भी तंत्र (सिस्टम) पूर्ण (एब्सोल्यूट) नहीं होता है। हम एक बेहतर तंत्र (सिस्टम) की कल्पना करते है और देश को सर्वश्रेष्ठ तंत्र देने का प्रयास करते है। कोई भी तंत्र अपने आप मंे गलत नहीं होता है। लेकिन उस तंत्र के जो अंश होते है जिसे मिलकर वह तंत्र बनता है, जो उसको कार्यान्वित करने के लिए जिम्मेदार होते है और जिनके लिए वह तंत्र बनाया जाता है उनकी सामुहिक कमिया ही उस तंत्र को खराब करती है। अन्ना अब तक यह कहते रहे कि यह तंत्र वर्तमान में जो है जिसका केंद्र बिंदू ‘संसद’ है। यह वह संसद है जहां 15 मंत्री भ्रष्ट है 166 से अधिक सदस्य अपराधी है। इनसे न तो स्वच्छ शासन की उम्मीद कर सकते है और न ही उनसे भ्रष्टाचार के विरूद्ध कड़ा कानून की उम्मीद की जा सकती है। 
                   अन्ना ने इसके पूर्व वर्तमान संसद को नकारकर ग्राम सभा की रायशुमारी की बात पर जोर दिया। लेकिन अब उन्हे इस बात का अहसास अवश्य हो गया होगा कि संसद चाहे कैसी हो कानून वही बना सकती है। इसलिये संसद को चाहे जितनी गाली दी जाये, आलोचना की जाय, जब तक उनके मन मुताबिक संसद का गठन नहीं हो पाएगा तब तक जन लोकपाल बिल पारित नहीं हो पायेगा। वर्तमान संसद के संसंद सदस्यों पर जनमत के दबाव के द्वारा जनलोकपाल बिल पर उनको सहमत करने में असफल होने के कारण ही उनके पास उक्त निर्णय के अलावा शायद कोई चारा बचा ही नहीं था। वे आखिरी सांस तक ‘लोकतंत्र’ में अपने विश्वास से डगर नहीं होना चाहते है इसलिए मजबूरी में लिया गया यह निर्णय उनकी हार के रूप में न देखा जाए बल्कि लोकतंत्र के पहियों को मजबूती प्रदान करने व स्वच्छता प्रदान करने के रूप में देखा जाना चाहिए।
अब जब अन्ना व उनकी टीम व समर्थक इस लोकतंत्र के मंदिर संसद में प्रवेश करने के लिये जनता के बीच जायेगी। तब उन्हे वे सब बुराइयों का सामना करना पड़ेगा जिसकी आलोचना वे अभी तक करते आ रहे है। इन बुराईयो का सामना करने पर उन्हे बुराईयो से लड़ना पड़ेगा। जब अन्ना जैसा व्यक्तित्व राजनीति के कीचड़ से युक्त समस्त ‘बुराइयो से लड़ेगा’ व जन जनार्दन के सहयोग से यदि वह विजय प्राप्त कर पायेगा तो ही राजनीति को इस कीचड़ से दूर कर स्वच्छ कर पायेगा। 
                   यदि यह प्रयोग सफल हो गया तो सच मानिये देश प्रगति की ओर अग्रसर होता हुआ पुरानी सोने की चिड़िया के रूप में प्रसिद्धि पा सकता है बशर्ते जनता भी उतनी ही ताकत व क्षमता से अन्ना के इस दिशा में बड़े हुये कदम का ताल ठोककर साथ दें।
 
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