‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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जीती न हारी, इस बार तो ठगी गई दिल्ली!

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           दिल्ली ने अभिमानी सत्ताधीशो के खिलाफ न जाने कितने ही आंदोलन देखे है। जाने कितने ही आंदोलनों को सत्ताधीशो के हाथों कुचलते देखा। उसने कई परिवर्तन देखे है अपने साहस और शौर्य से कई परिवर्तन किये है। देष का मुखिया होने के नाते दिल्ली ने अपना हर फर्ज निभाया। अपने इस सफर में दिल्ली न जाने कितनी ही बार हारी और कितनी ही बार जीती है। परन्तु इस बार दिल्ली जिस प्रकार इस षहर अपने अदम्य शाहस का परिचय दिया और एक बड़ा राजनैतिक परिवर्तन करके दिखा दिया। एक संदेश दिया कि अभिमानी सत्ताधीषों को वह कभी बरदास्त नहीं करेगी। इसके लिए दिल्ली के प्रत्येक नागरिक को श्रेय देना चाहिए उन्होने देष को एक नया रास्ता दिखाया, देश  को नई उर्जा दी। लेकिन इस परिवर्तन के बाद प्रदेश के हाथों में परिणाम आया, शायद आज वहां की जनता ठगा सा महशूस कर रही है।

           दिल्ली ने केंद्र और प्रदेश में ‘कांग्रेस सरकार’ के राज में हो रहे भ्रष्ट्राचार, महंगाई, कुशासन जैसे मम्भीर मुद्दो और जनलोकपाल कानून पारित कराने को लेकर अन्ना हजारे के नेतृत्व में एक लम्बे जन आन्दोलन का नेतृत्व किया। इस आंदोलन के बटवारे से एक पार्टी का उदय हुआ ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के रूप में। अब दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में जनता के पास एक विकल्प था। ‘कांग्रेस’ के प्रति अपना रोश  दिखाने का और सत्ता परिवर्तन के लिए एक ‘विकल्प’ था। जनता ने दिल खोलकर विकल्प का इस्तेमाल करते हुए आम आदमी पार्टी को अप्रत्याषित समर्थन दिया। 

           दिल्ली की लगभग देढ़ करोड़ जनता तब ठगी की ठगी रह गई जब उसने देखा की जिस कांग्रेस के खिलाफ उसने वर्षो जनसंघर्श कर उसे सत्ता से बाहर किया। आज वहीं कांग्रेस फिर परोक्ष रूप से सत्तासीन नजर आ रही है। चुनावों में भलेही जनता ने कांग्रेस के खिलाफ जनादेश दिया और ‘‘भारतीय जनता पार्टी’’ सहित ‘‘आम आदमी पार्टी’’ को समर्थन दिया। परन्तु दोंनो शीर्ष पार्टियों ने जिनके पास ‘कांग्रेस’ के खिलाफ गया ‘जनमत’ था उन्होने स्वयं के बल पर या साझा सरकार बनाने के बजाय एक दूसरे के खिलाफ भ्रकुटियां तान ली। आम आदमी पार्टी ने तो एक कदम आगे आकर उसी पार्टी से हाथ मिलाकर सरकार बना ली जिसे वो देश ही नहीं दुनियां की सबसे भ्रष्ट पार्टी बताते थे। यहां तक कि आम आदमी पार्टी के संयोजक ने अपने बच्चों की कसम खाकर कहा था कि वे कांग्रेस से हाथ नहीं मिलायेंगे। क्या अब उन्हे अपने बच्चों से मोह नहीं रहा? क्या वे सत्तामद में जनता के जनादेष को भी दरकिनार कर देना चाहते है? जिस पार्टी के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई लड़ी गई। जिस पार्टी पर बड़े-बड़े आरोप लगाये गये, चुनाव मंे जीत के बाद उसी पार्टी से हाथ मिला लिया गया। क्या इसके बाद भी जनता को ‘‘आम आदमी पार्टी’’ का साथ मिलेगा? यह एक चिंतनीय प्रश्न तो है ही।

         निश्चित ही ‘‘आम आदमी पार्टी’’ ने सरकार बनाने से पहले जनता से एक बार फिर राय जानी, लेकिन वह जनता के बजाय पार्टी समर्थकों का उत्साह मात्र नजर आती है। चूंकि 5-10 लाख समर्थको की राय दिल्ली की देढ़ करोड़ जनता की सहमती नहीं हो सकती। जिस प्रकार सरकार बनाने के लिए ‘‘कांग्रेस’’ से बाहर से समर्थन लिया गया इस से निष्चित ही दिल्ली की जनता ठगा सा महसूस कर रही है। दिल्ली की जनता का कांग्रेस को सत्ता से दूर करने का सपना सपना ही रह गया। चाहे परोक्ष ही सही पर आज कांग्रेस तीसरी बार सत्ता में आ ही गई।

4 Responses so far.

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन "तुम चले जाओगे तो सोचेंगे ... हम ने क्या खोया ... हम ने क्या पाया !!" - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

  2. कांग्रेस ही अपरोक्ष रूप से सत्तासीन हैं ????

    नहीं जी हमें तो किसी भी तरह से ऐसा कभी नहीं लगा । सवाल नीयत है साहब । मुझे लगता है लोगों ने भी अपने बीच से खडे अपने इन अगुआओं की नीयत को टटोला और उन्हें वो दिखा जो वे देखना चाहते थे , अन्य सबों से लोग क्यों उकता गए ये तो अब अन्य दलों को सोचना चाहिए और सोचना ही होगा , क्योंकि विकल्प और साफ़ नीयत वाला विकल्प तो अब पूरा देश ही तलाश रहा है

  3. Anne Lin says:

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