‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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‘‘इलेक्ट्रानिक मीडिया’’ कि गलतियों का परिणाम ‘‘सोशल मीडिया’’

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आज दुनिया क्रांतिकारी गति से इलेक्ट्रानिक युग की ओर बढ़ चला है और इसमें इलेक्ट्ानिक संचार साधनों नें निश्चय ही अपनी महती भूमिंका निभाई है। भारतीय संचार साधनों में इलेक्ट्ानिक मीडिया का पूर्वज प्रिंट मीडिया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक अचूक हथियार के रूप में कार्य किया और इसलिए आज उसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद देश का चैथा स्तम्भ माना जाता है।

सोशल मीडिया के बढ़ते कदम:
कुछ ही समय हुआ विश्व पटल पर एक नये प्रकार के मीडिया ने जन्म लिया। मुख्यतहः सामाजिक खबरों और सामाजिक कार्याे से शुरूवात करने और सोशल साईट के प्लेटफार्म का उपयोग करने के कारण उसका नामकरण ‘‘सोशल मीडिया’’ हुआ। आज सोशल मीडिया की लोकप्रियता और विश्वशनीयता निश्चित ही द्रुत गति से बढ़ रही है। हालाकि सोशल मीडिया का जन्म व्यक्तिगत सूचनाओं के आदान प्रदान एवं सार्वजनिकरण के तौर पर अप्रमाणित प्रशारण की मानसीकता साथ लिए हुआ। इसके दुरूपयोग का हमेशा ही खतरा बना रहा और कुछ मामलों में देखा जाये तो निश्चित ही माना जा सकता है कि सोशल मीडिया का दुरूपयोग हुआ है। मगर फिर भी निश्वार्थ, निशुल्क, त्वरित और निस्पक्ष ‘‘रिपोर्टिंग’’ सोशल मीडिया की खासियत रही है। यही कारण है कि आज यह यह देश समाज में इतनी लोकप्रिय है।

इलेक्ट्राॅनिक बनाम सोशल मीडिया:
इलेक्ट्राॅनिक और सोशल मीडिया दोनों में एक बड़ा फर्क नजर आता है, इलेक्ट्ानिक मीडिया का जन्म और विकास एक विश्वसनीय संचार साधन के रूप में हुआ। अपने मूल ‘‘प्रिंट’’ मीडिया की ही तरह कई बार इसका समाजहित में कार्य करने का जो इतिहास रहा है इससे विश्वसनीयता बनी। लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही है आज इलेक्ट्ानिक और पिं्रट मीडिया दोनों ही अपनी विश्वसनीयता खोते नजर आ रहे है और इसके विपरीत सोशल मीडिया समाज में अपना ही एक रूतबा कायम किया है। 

इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के हाल:
  आपसी प्रतिस्पर्धा के फेर में लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ ‘‘संचार तंत्र’’ आज अपनी विश्वसनीयता और जवाबदेही दोनों ही खोता जा रहा है। आज जिस प्रकार से आधारहीन एवं तथ्यविहीन खबरें बनाकर प्रसारित की जा रही है यह बहुत ही मम्भीरतम एवं चिंतनीय विषय है। आज प्रिंट और इलेक्ट्ाॅनिक मीडिया का बाजारीकरण होता नजर आ रहा है, खबरे आज विज्ञापन का चोला ओढ़े नजर आती है। कुछ रूपयों के लिए चाहे असत्य को सत्य और सत्य को असत्य बनाकर दिखाना पड़े, खबरों को पाॅलिस कर दिखाना जैसे कार्य धड़ल्ले से किये जा रहे है। देश तो धीरे-धीरे पूर्ण स्वराज्य की ओर बढ़ रहा है परन्तु इलेक्ट्ाॅनिक मीडिया कार्यपालिका और पूंजीवाद की गुलाम होती नजर आ रही है। मीडिया की आज हालत देखे तो एक कहावत चरितार्थ नजर आती है ‘‘जिसके हाथ में डंडा उसके हाथ में भैंस’’ इसे एक कदम और आगे यदि कहा जाये कि ‘‘जिसके हाथ में चारा उसके हाथ में भैंस’’ तो कुछ गलत नहीं होगा।

अंततः
आज इलेक्ट्राॅनिक और प्रिंट दोनों ही मीडिया को आत्मअवलोकन करने की जरूरत है। समाज के इस सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ के कार्याे का अवलोकन एवं समय-समय पर मीडिया आॅडिट की आवश्यकता है। वरना एक दिन समाज मीडिया का बहिस्कार कर देगा। एक दिन लोगो से परिचय कराने वाला मीडिया खुद पहचान का मोहताज बन जायेगा। 

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