‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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बाबा रामदेव की धमकी के मायने!

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कृष्णा बारस्करः
             आगामीं लोकसभा चुनाव में मोदी जी योग्यता और मुद्दों पर आधारित समर्थन देने वाले बाबा रामदेव ने अचानक भाजपा को चेतावनी दी है कि समर्थन के मुद्दों पर लिखित में आश्वासन दे अन्यथा उनके पास और भी विकल्प खुले है। इस प्रकार का बयान आते ही पूरे देश में अनेकों तरह की प्रतिक्रियायें आने लगी। लोग स्वामींजी के शब्दों का अपने-अपने तरीके से अर्थ और अनर्थ निकालने लगे। कुछ मोदी जी के कुछ अंध भक्त तो सोसल मीडिया पर रामदेवजी को अन्ना हजारे जी की तरह हाल होने की चेतावनियां तक देने लगे। हालाकि स्वामीं रामदेवजी ने सिर्फ भाजपा को चेतावनी दी है, उन्होने मोदीजी के विषय में कुछ भी नहीं कहां। इसलिए इतनी जल्दबाजी में कुछ भी परिणाम निकालने से पहले मोदी भक्तों को इस विषय पर गम्भीर चिंतन की आवश्यकता है।  

पार्टी के बजाय बाबा से सवाल क्योंः

             कई लोग बार-बार सवाल उठा रहे है कि ऐन चुनाव के वक्त बाबा को ऐसी बात कहने की जरूरत क्या थी? कुछ लोग कहते और मानते है कि बाबा के इस कदम से पार्टी को नुकसान भी हो सकता है। परन्तु वे यह बात कभी नहीं सोचते की मोदी जी के कट्टर समर्थक होेन के बावजूद बाबा रामदेव को ऐसी बात कहने की जरूरत क्यों पड़ी!
             खुद या मोदी समर्थक चाहे इस बात को जितना भी छुपाये लेकिन पार्टी के अंदर की उठा-पठक किसी से छुप नहीं सकती। नरेन्द्र मोदी के जितने दुश्मन बाहर बैठे है अन्दर बैठे विरोधी उससे कमतर तो नहीं लगते। बहुत से लोग यह मानते है कि भाजपा में एक खेमा ऐसा भी है जो चाहता है कि पार्टी को 272 से कम शीट मिलें ताकि उसके बाद गठबंधन की सरकार बनने पर किसी तरह से मोदी विरोधी हवा बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी हथियाई जा सके। 

चुनाव के निकट आकर ऐसी धमकी की आवश्यकता क्यों?:

              भाजपा मंे टिकट वितरण में जिस प्रकार के मापदण्ड अपनाये जा रहे है, यह घोर चिन्ता का विषय है। निश्चित ही बाबा रामदेव को भाजपा के अन्दर की इस अंदरूनी कलह का आभाश हो गया है। देश के हृदयस्थल मध्य प्रदेश की बात की जाये तो नरेंद्र मोदी से छूआछूत पिछले विधानसभा चुनाओं के दौरान ही नजर आ गया था। तब भाजपा और शिवराज जी के पास मौका था कि गांव-गांव प्रचार के दौरान वह अपने पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का भी परिचय लोगो से करवाती। उस समय केवल भोपाल की विशाल रैली को छोड़ दिया जाये तो मोदी जी के नाम की भागीदारी नगन्य थी।  
             ऐसे ही भाजपा आज सत्ता मद में ऐसी-ऐसी पार्टियों और लोगो से गठबंधन कर रही है जिनपर भ्रष्टाचार और चरित्रहीन होने जैसे संगीन आरोप लगे है। ऐसे में मोदी जी की छवी पर गहरा आघात पड़ रहा है। वहीं टिकट वितरण में पारदर्शिता की कमी भी बाबा रामदेव की नाराजगी की बड़ी वजह रहीं है। कई लोकसभा उम्मीदवार ऐसे है जिनका जनता के बीच में या तो कोई जनाधार ही नहीं है या फिर उनका घोर विरोध है। कुछ लोकसभा सीटों पर नेताओं के रिस्तेदारों का या दबदबा रखने वाले नेताओं की मनेच्छा का खास खयाल रखा गया है। कुलमिलाकर जनता के मनमाफिक उम्मीदवार नहीं दिये जा सके। ऐसे में भी पार्टी की इच्छाशक्ति और मंशा पर सवाल उठना लाजमी है। 

भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं की उपेक्षाः

             बाबा के नाराज होने की एक वजह यह भी है कि टिकट वितरण को लेकर जनता के बीच हुए प्रत्येक सर्वे को नकार दिया गया। इसीके साथ भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं से कोई राय नहीं ली गयी, ली भी गई तो कोई तवज्जो नहीं दी गई। जबकि बाबा रामदेव ने लोकसभा चुनाव की तैयारिया भाजपा से भी पहले शुरू कर दी थी। आज पूरे देश में फैला उनका संगठन भाजपा से भी अधिक सक्रीय है। उन्होने मोदी जी के समर्थन में पूरे देश में जो अभियान चला रखा है वह खुद अपने बल पर खड़ा किया है। आज अगर देखें तो उधर भाजपा में टिकट वितरण पर गुटबाजी एवं लड़ाई हो रही होती है और इधर भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ता घर-घर पहुंचकर नारा लगा रहे होते है ‘‘उम्मीदवार चाहे जो भी हो, वोट मोदी जी को ही देना होगा’’।

आगे की संभावनायेंः

             बाबा रामदेव ने जिस प्रकार कठोर शब्दों का प्रयोग करते हुए ‘‘राजनैतिक विकल्प’’ खुले होने की बात कहीं उसके बहुत गम्भीर परिणाम हो सकते हैं। बाबा रामदेव का जैसा व्यक्तित्व है वे बिना किसी तैयारी या बिना किसी आधार के कोई बात नहीं कहते। ऐसे में अगर भाजपा उन्हे साधनें में नाकाम रहीं और वे ‘‘राजनैतिक विकल्प’’ की घोषणा कर देते हैं तो भाजपा के लिए बहुत कठिन परिस्थिया खड़ी हो सकती है। हालाकि जैसा कि स्वामीं जी को मोदी जी पर आज भी पूर्ण विश्वास है ऐसे में नये ‘‘राजनैतिक पार्टी’’ के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी मोदी ही हो सकते है। 

और अंत मेंः

             जैसा कि मोदी जी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने से पहले के विभिन्न सर्वे मंे एनडीए की सम्भावित सीटे 150 के आसपास थी। मोदी जी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के बाद अब परिस्थितियां बदल गई एवं उनकी रेलियों के बाद अब सीटों का अनुमान बढ़कर 220-250 हो गया है। ऐसे में पार्टी की इस प्रकार की गुटबाजी और बाबा रामदेव की नाराजगी बहुत ही घातक सिद्ध हो सकती है। कहीं ऐसा न हो की बाबा रामदेव जी की नई पार्टी बने और उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ‘‘नरेन्द्र मोदी’’ हो, ऐसी परिस्थिति में भाजपा के हिस्से में ‘‘आडवानी जी’’ ही आयेंगे और सब जानते है इसके बाद चुनाव परिणाम क्या होने वाले है।
 
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