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से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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न 'आचार’ है न 'विचार' और न ही 'सहिंता’, फिर काहे की 'आचार-सहिंता'!

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राजीव खण्डेलवाल:
          चुनाव आयोग ने अंततः बहु प्रतिक्षित आगामी लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी  है। उक्त घोषणा के साथ ही तत्काल प्रभाव से "आर्दश आचार सहिंता" भी लागू हो गई है, ऐसा मुख्य चुुनाव आयुक्त ने  ''निर्वाचन  सदन'' मे नही बल्कि ''विज्ञान भवन'' में हुई प्रेस कांफ्रेस मे कहा। आचार संहिता लागू होते ही 'बीजेपी और 'आप' के कार्यकर्ताओ व नेताओ के बीच दिल्ली से लेकर गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों और देश के कई बडे नगरो मे झड़प हुई। आचार संहिता के प्रावधान क्या है, शायद यह देश के पुलिस प्रशासन को भी मालूम नही है। गुजरात पुलिस के द्वारा पहिले यह कहा गया कि आचार सहिंता का उल्लंघन हुआ है। लेकिन बाद में अपना रूख बदलते हुए यह कहा गया कि ट्रेफिक मे रूकावट होने के कारण उन्हे रोका गया था। कल फिर रूख पलटते हुये आचार सहिंता का उल्लंघन मानते हुये केजरीवाल के विरूद्ध 'प्रथम सूचना पत्र' दर्ज की गई है। इसलिए गुजरात के पाटन मे राधवपुर में रोके जाने पर पूरे देश में इसकी जो प्रतिक्रिया हुई, वह वास्तव मे अप्रत्याशित थी।

        उपरोक्त घटना से यह बात सिद्ध होती है कि चुनाव आयोग द्वारा लागू आचार सहिंता क्या है, किन लोगो पर लागू है, किस तरह लागू होगी, और क्या वह व्यवहारिक है, क्या उसे पूर्ण रूप से लागू किया जा सकता है, क्या आचार सहिंता लागू होने से स्वच्छ और ईमानदार तरीके से चुनाव संपंन्न हो पायेगे। ये सब प्रश्न स्वाभाविक रूप से दिमाग में उत्पन्न होते है।

        सरकार से लेकर चुनाव आयेाग तक ने पूर्व मंे करोडो रूपये अपनी योजनाओं व उदेश्यों के प्रचार प्रसार पर खर्च किये होगे, किये जाते है। अभी हाल मे ही विधानसभा चुनाव में चुनाव आयेाग ने नागरिको को वोट डालने के लिये प्रेरित करने के लिए काफी बडे स्तर पर अभियान चलाया था जो काफी खर्चीला था। ठीक उसी प्रकार चुनाव आयोग ने जनता के बीच आचार सहिंता को लागू करने के पूर्व उसके मुख्य प्रावधानो का प्रचार प्रसार क्यों नही किया, यक्ष प्रश्न यही है। उक्त आचार सहिंता क्या सिर्फ राजनैतिक पार्टियो पर ही लागू है, या आम नागरिको  पर भी लागू है। इसकी जानकारी होने पर जनता भी उसे प्रभावशाली रूप से लागू कराने मे सहयोग कर सकती है? प्रश्न यह भी पैदा होता है जो आचार सहिंता चुनाव आयोग ने  बनायी है वह कितनी व्यवहारिक है। क्या चुनावी कार्यक्रम की घोषणा हो जाने से देश के शासन व  प्रशासन की विकास कार्य करने की योजना की धडकन चुनाव आयेाग के आचार सहिंता के डंडे के डर से रूक जाये, क्या यह उचित है ? हमने यह देखा है कि आचार सहिंता लागू होते ही सामान्य विकास के समस्त कार्य रूक जाते है। कही पानी की समस्या है तो टयूबबेल- नल कनेक्शन की अनुमति देने के लिये प्रशासन, चुनाव आयोग की ओर टकटकी लगी नजर से देखता रहता है। सामान्य शासन और प्रशासन के विकास के कार्य आर्दश आचार सहिंता के नाम पर रोका न जावे, चुनाव आयेाग को इस बात पर गंभीरता से विचार करना  होगा।

        राजस्थान की गहलोत सरकार का अभी हाल मे हुए विधानसभा चुनाव मे हश्र आपके सामने है।  जहां अंतिम समय में गहलोत सरकार द्वारा की गई कई लुभावनी घोषणाए जनता को आकर्षित नही कर पाई व सरकार के पक्ष में मत मे परिवर्तन नही हो सका। अतः यदि कोई भी लोकप्रिय चुनावी  घोषणा भी है, जो चुनी हुई सरकार है, कोे यह संवैधानिक रूप से अधिकार जनता द्वारा दिया गया नैतिक बल व कानूनी अधिकार प्राप्त है  कि वह ''जनहित'' मे अपने चुने हुए अवधि के अंतिम समय की शेष अवधि में घोषणा कर सकती है। ऐसी घोषणा वादों पर आचार सहिंता के द्वारा रोक लगाना क्या उचित है, लोकतांत्रिक है। क्या यह उन मतदाताओ केे विवेक का अपमान नही है ? हम यह बात अपने मतदाता के विवेक पर क्यो नही छोड देते कि जिस शासन ने 60 महिने की अवधि मे अपने 56- 57 महिने की समाप्ति तक जनता के लिए अपने चुनावी घोषणा पत्र के आधार पर कार्य नही किये लोकलुभावन घोषणाए अमल नही की, अब वे अंतिम समय मे करने जा रही है, तो उसके औचित्य पर निर्णय करने का अधिकार मतदाताओ के विवेक पर ही छोडना श्रेष्ठ व उचित होगा, जो जनता चुनाव परिणाम के माध्यम से व्यक्त करेगी, यही लोकतंत्र है। यदि जनता के विवेक पर कोई प्रश्न चिन्ह है, तो चुनाव आयोग को नागरिको के बीच परिपक्वता अभियान चलाना चाहिए, जिस प्रकार वह वोट देने के लिए चला रहा है, ताकि जनता परिपक्व होकर अपने वोट देने के संवैधानिक व नागरिक अधिकार को बिना भय,लोभ व स्वार्थ के विवेक पूर्ण उपयोग कर चुनाव आयोग के अवांछित अधिकारहीन दखल को रोक सके।
      
                         (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

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