‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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सर्वोच्च निर्णय! कोई सर्वोच्च नहीं!

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माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध दिल्ली सरकार की अपील पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देकर जो व्यवस्था की, उसका घोषित प्रभाव यह हुआ कि संवैधानिक रूप से दिल्ली में न तो मुख्यमंत्री ही और न ही उपराज्यपाल सर्वोच्च है। उच्चतम न्यायालय ने चुनी हुई सरकार के महत्व को स्थापित करते हुये दिल्ली प्रदेश के संबंध में यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया कि लोकतंत्र में सत्ता का अधिकार चुनी हुई सरकार के पक्ष में ही होना चाहिये तथा मत्रिमंडल के निर्णय को उपराज्यपाल को मानना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि दिल्ली प्रदेश अन्य प्रदेशो के समान एक पूर्ण राज्य नहीं है,बल्कि कुछ विशिष्ट शक्यिाँ लिये हुये केन्द्र प्रशाषित राज्य ही है। इसलिए तीन विषयों जमीन, पुलिस और कानून व्यवस्था को छोड़ शेष विषयों में दिल्ली सरकार (मंत्रिमंडल) द्वारा लिये गये निर्णयों को उपराज्यपाल को मानना चाहिए, बल्कि उच्चतम न्यायालय ने एक कदम आगे जाते हुये यह भी कहा कि दिल्ली के एलजी राज्यपाल नहीं बल्कि प्रशासक है। उच्चतम न्यायालय ने दोनो पक्षों को समझाते/लताड़ते हुये कहा कि न किसी की ‘तानाशाही’ होनी चाहिये और न अराजकता वाला रवैया होना चाहिये। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय नेे एक ऐसा निर्णय दिया है जिसे सभी पक्ष अपनी विजय मानकर हृदय की गहराई से स्वयं की जीत मान कर पीठ थप थपा रहे है और जश्न मना रहे हैै। लेकिन वास्तव में यह जीत उच्चतम न्यायालय की है। जिसने सभी पक्ष के मन में अपने निर्णय के प्रति गहन विश्वास पैदा किया है। यद्यपि यह भी सत्य है कि कोई भी पक्ष अपने को हारा हुआ स्वीकार नहीं करना चाहता है, क्योकि राजनीति में अनुभूति (पर्सेप्शन) एक महत्वपूर्ण कारक होता है। इसलिये समस्त जनता पक्ष के बीच अपने को जीता हुआ बताकर पिछले तीन साल की संवैधानिक असफलता में अपने पक्ष को मजबूत बताने के लिये उच्चतम के निर्णय का ही सहारा ले रहे है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय द्वारा दिल्ली राज्य के उपराज्यपाल को राज्यपाल नहीं प्रशासक है कह कर उपराज्यपाल के प्रति कड़क भाव को ही व्यक्त किया है। 
फिर भी ‘अराजकता’ व ‘राज’ के बीच सीमा रेखा खींचने के बावजूद उच्चतम न्यायालय स्पष्ट रूप से उपराज्यपाल व मुख्यमंत्री के अधिकार एवं अधिकार क्षेत्र के विभाजन करने से बचती रही। इसलिये उच्चतम न्यायालय ने यह अंत में यही कहा कि विवाद की स्थिति में दोनो पक्षों को अपना मामला मिल बैठकर आपस में सुलझाना चाहिए। साथ ही मंत्रिमंडल का कोई निर्णय संविधानोंत्तर होने की स्थिति में मतभेद की स्थिति में ही विवाद को राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिए।
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लाल निशान! शांतिपूर्ण मार्च?

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‘‘ऑल इण्ड़िया किसान सभा’’ के बैनर तले लगभग 45 से 50 हजार निर्धन किसानो, खेतिहर मजदूरो व आदिवासी भूमिहीन श्रमिको का लगभग 200 किलो मीटर तक का पैदल मार्च 7 मार्च को ‘नासिक’ से लगातार पांच दिन रात चलकर सोमवार दिनंाक 12 मार्च को देश की आर्थिक राजधानी, व महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई के ‘‘आजाद मैदान’’ में पूर्णतः शांतिपूर्व तरीके से पहँुचा। आज के राजनैतिक नैतिकता व व्यवस्था के लगातार गिरते स्तर की मौजूदगी में इतने बड़े हुजूम के एक अहिंसात्मक शांतिपूर्ण आंदोलन का इतना अनुशासित अकल्पनीय मार्च वह भी पैदल चलते हुये शायद ही कभी देखा या सुना गया हो। मानो अनुशासन को ऊंचाई की पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया गया हो। सामान्य रूप से मुम्बई शहर में ऑफिस के समय पर टैªफिक जाम हो जाता है। 12 मार्च सोमवार को छात्र छात्राओं की परीक्षा थी। उन्हे परीक्षा केन्द्रो में पहंुचने तक किसी तरह की समस्या न हो इस स्थिति को दृष्टिगत रखते हुये व सम्पूर्ण मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए खुद को कष्ट में डालकर भी, रात्रि भर पैदल चलकर, समस्त आंदोलनकारी मुम्बई पहुंचे, व शासन द्वारा गाड़ियो से पहँुचानेे हेतु की गई पेशकश को भी उन्होने नकार दिया। मुम्बई के नागरिकों की अतिथी देवो भाव की भी प्रंशसा की जानी चाहिए जिन्होने आंदोलनकारियों के लिये सुविधा पूर्ण व्यवस्था बनाई। 
‘‘लाल निशान’’ कम्युनिस्ट पार्टी का निशान है। इसकी सामान्य पहचान एक हल्की उग्र सी व अहिंसा से कुछ दूर भावना के सम्यक मानी जाती है। लेकिन इस पूरे पैदल मार्च में ऐसी पहचान से हटकर जो कभी भी गांधी जी को नहीं मानते थे, उन्होने इस आंदोलन में किसान व खेतिहर मजदूरो के साथ ताल में ताल मिलाकर तथा रास्ते भर परम्परागत संगीतमय नाच के साथ पैदल चलकर गांधी जी के मूल सिद्धांत अहिसा परमो धर्म को पूर्णतः अपनाया। इस सबके लिए वे निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं। ‘यद्यपि अन्ना आंदोलन में भी लाखो लोग शामिल हुये थे। लेकिन वह आंदोलन एक ही जगह दिल्ली में रामलीला मैदान तक ही सीमित रहा था।’’ 
किसी ‘‘नामचीन’’ व्यक्तित्व के नेतृत्व के बिना किसान मजदूरों और श्रमिको का उपरोक्त सफल मार्च इस बात को सिद्ध करता है कि आंदोलनकारी मूल रूप से अहिंसक होते है। ज्यादातर केस में आंदोलनो का नेतृत्व करने वाले प्रसिद्ध नामचीन नेतागण अपनी नेतागिरी को चमकाने के चक्रव्यूह में अहिंसक आंदोलन को अपने फायदे के लिये हिंसा की ओर मोड़़ देते है। आश्चर्य की बात तो यह है कि लाल निशान अभी अभी हाल में ही त्रिपुरा में बुरी तरह हारा है। लेकिन महाराष्ट्र जहाँ लगभग लाल निशान का नामो निशान भी नहीं है, वहाँ पर किसान सभा के बैनर तले लाल निशान की यह सफलता एक अध्ययन् का विषय अवश्य है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीश ने आंदोलनकारियों के डेलीगेशन के साथ, आमने सामने बैठकर तीन धंटे से ज्यादा बात चीत करके और उनकी लगभग 80 प्रतिशत से अधिक मांगो को स्वीकार करके लिखित में आश्वासन देकर आंदोलन का सफलतापूर्वक समापन कराया। इसके लिए मुख्यमंत्री भी उतने ही प्रशंसा व बधाई के पात्र है, जितने आंदोलनकारी शांतिपूर्ण आंदोलन के लिये! आंदोलनकारियो की आंदोलन समाप्ति के पश्चात घर वापसी भी वैसे ही शानदार ढ़ग से उतनी ही शांतिपूर्ण रही। सरकार ने भी विभिन्न स्थानो से आये आंदालनकारियों को परिवहन सुविधा वाहन, स्पेशल ट्रेन इत्यादि उपलब्ध कराकर उनके गंत्वय स्थान तक पहंुचाने में सहयोग प्रदान किया। यह शायद पहला आंदोलन है जहाँ तंत्र की भीड़ के गरीब मजदूर किसान, बेरोजगार शामिल हुये तथा जिसमें आंदोलनकारियो की मांगो पर तुरंत कोई लाभ न मिलने के बावजूद जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के लिखित आश्वासन पर भरोसा करके आंदोलनकारियो ने शांतिपूर्ण आंदोलन शांतिपूर्ण सोहाद्र पूर्ण वातावरण में समाप्त किया। नेता गिरी नहीं हुई। इसके लिये आंदोलन से सम्बन्धित समस्त आंदोलनकारी, शासन, प्रशासन तथा मुम्बई निवासी बधाई के पात्र है। यद्यपि यह आंदोलन कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे तले प्रांरभ हुआ था फिर भी इस आंदोलन में शामिल भीड़ को देखते हुये वोट बैंक की खातिर समस्त प्रमुख राजनैतिक पाटियो ने अपनी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना आवश्यक समझा। लेकिन आंदोलनकारियो ने समस्त पार्टियो के किसी भी नामी गिरामी नेतृत्व को प्रश्रय नहीं दिया। 
एक बात जरूर गंभीर है, जिस पर यहँा विचार किया जाना अत्यावश्यक है। जब मुख्यमंत्री को यह ज्ञात था कि किसानो का मार्च नासिक से 180 किलोमीटर पैदल चल कर मुम्बई आने वाला है तब उन्होने तत्काल ‘‘आपकी सरकार आपके द्वार’’ की नीति को अपनाते हुए अपने डेलीगेशन के साथ जाकर नासिक में ही किसानो के डेलीगेशन से मार्च प्रारंभ होने के पूर्व बातचीत क्यो नहीं की? यह प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है, परन्तु अन्तिम परिणाम सुखद आने से गाैंण हो गया है। महत्वपूर्ण इसलिए क्योंकि वैसा करने की स्थिति में निर्धन किसानो व भूमिहीनों को 200 किलोमीटर पैदल चलने में जो कष्ट उठाने पड़े, पैरो में छाले आये, धूप में कई बार भूखे प्यासे रहना पड़ा, इन सब तकलीफो से उनको बचाया जा सकता था। 
इस आंदोलन में आंदोलनकारियो की मांगें यद्यपि भारी अर्थ व्यवस्था का बड़ा प्रश्न लिये हुये थी। तथापि आंदोलन की शांतिपूर्ण परिणिति ये यह सिद्ध हो गया कि आंदोलन चाहे कितना ही बड़ा हो, यदि आंदोलन शांतिपूर्ण अहिंसक तरीके से समझौता वादी रूख लिये हो व साथ-साथ सरकार का रूख भी टकराहट के बजाए सकारात्मक हो तो आंदोलन में नेता लोग कितना ही प्रयास कर ले आंदोलनकारियो को शांति के रास्ते से नहीं डिगा पायंेगे। इस आंदोलन की सफलता का यही मूल संदेश है। ऐसे आंदोलनकारियो को शत्-शत् नमन् व प्रणाम। महाराष्ट्र सरकार को धन्यवाद इस आशा के साथ कि बातचीत के मध्य दिये गये आश्वासनों को निश्चित रूप से तय की गई समयावधि में सफलतापूर्वक धरातल पर लाकर समझौते की भावनाओं के अनुरूप लागू करे, ताकि इस तरह के औचित्य पूर्ण आंदोलन के स्वरूप पर जनता का विश्वास बढ़ सके।
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माननीय उच्चतम् न्यायालय द्वारा केन्द्रीय विद्यालयों में की जा रही प्रार्थना पर केन्द्र सरकार को जारी नोटिस! कितना औचित्य पूर्ण!

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मध्यप्रदेश के निवासी विनायक शाह ने देश के 1125 केन्द्रीय विद्यालयों में 50 वर्षो से लगातार हिन्दी-संस्कृत में की जा रही प्रार्थना पर रोक लगाने के लिये दायर याचिका पर केन्द्रीय विद्यालय संगठनों एवं केन्द्र सरकार को नोटिस जारी करके जवाब मांगा हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं हैं कि 50 वर्षो से अधिक जारी उक्त ‘‘प्रार्थना’’ प्रक्रिया पर किसी भी भागीदार (विद्यार्थी) ने स्वयं या अपने अभिभावक के माध्यम से आज तक कोई आपत्ति नहीं की। दूसरी बात आज तक इतने सालो में पढ़ चुके विद्यार्थियों या वर्तमान में पढ़ रहे विद्यार्थियों मे से किसी ने भी कोई आपत्ति दर्ज करके रोक लगाने की मांग ही नहीं की। उच्चतम न्यायालय पहुँचे याचिकाकर्ता विनायक शाह का भी यह दावा नहीं हैं कि वे स्वयं केन्द्रीय विद्यालय में पढ़े हैं या उनके बच्चे केन्द्रीय विद्यालय में पढ़े या फिलहाल पढ़ रहे हैं। तब सबसे बड़ा प्रश्न तो यही हैं कि विनायक शाह की इस विषय में अधिकृत स्थिति (लोकश स्टेंडी) कितनी औचित्य पूर्ण हैं? दूसरी बात उच्चतम न्यायालय के पास वैसे ही लम्बित याचिकाओं की लम्बी फेहरिस्त हैं जो समयाभाव के कारण शीघ्र सुनवाई पर नहीं आ पा रही हैं इनमे कई महत्वपूर्ण याचिकाएं भी होगी जिनकी सुनवाई शीघ्र आवश्यक हैं। तब इस तरह की बेतुकी याचिका की सुनवाई करके समय खपाने का कितना औचित्य हैं, यह भी एक बड़ा प्रश्न हैं? 
भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी हैं और संस्कृत भाषा हमारी ‘‘संस्कृति’’ में समायी हुई मूल हैं, तो प्रार्थना हिन्दी-संस्कृत में नहीं होगी, तो क्या इंग्लिश, उर्दू, अरबी, यहूदी इत्यादि अन्य किसी विदेशी भाषा में होगी? क्या अन्य किसी देश का ऐसा उदाहरण हैं जहां राष्ट्र भाषा को छोड़कर दूसरी विदेशी भाषा में सरकारी शिक्षा संस्थाओं में प्रार्थना होती हैं? तो फिर हमारे देश में ही ऐसी उम्मीद क्यों की जाती हैं? शायद इसलिये कि सहष्णुता का असहिष्णु आवरण ओढ़ाने का अनर्गल प्रयास केवल हमारे देश में ही किया जा सकता हैं।
क्या प्रार्थना करने मात्र से बच्चे की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म हो जाती है या खत्म हो गई?ं क्या प्रार्थना करने मात्र से नास्तिक बच्चा आस्तिक बन सकता हैं ? क्या प्रार्थना का इतना गहरा प्रभाव हो रहा हैं कि उसके तथाकथित शाब्दिक अर्थो का पालन विद्यार्थी अपने जीवन में कर लेते हैं अथवा उतार लेते हैं? ये सभी मुद्दे याचिकाकर्ता ने उठाये हैं। क्या प्रथम दृष्ट्या उच्चतम न्यायालय को सब समझ नहीं पड़ रहा हैं। कि पी.आई.एल. फाईल करना आज कल क्या एक शगूफा एवं प्रसिद्धी पाने तथा कई बार ब्लैकमैलिंग करने का माध्यम नहीं बनते जा रहा हैं? ऐसे बेतुके उद्देश्यों को लेकर फाईल की जाने वाली याचिका पर अविलम्ब रोक लगाने की आवश्यकता हैं, न कि उसे बढावा देने की। माननीय उच्चतम न्यायालय को इस तरह की पी.एल.आई. को स्वीकार करने के पूर्व इस तथ्य को ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक हैं कि (कम से कम) पीड़ित व्यक्ति या व्यक्ति वर्ग से ही तथाकथित संवैधानिक अधिकारो की सुरक्षा को लागू करवाने  के लिए अपनी याचिका लेकर न्यायालय की शरण में आये। यदि नागरिक अपने मूल अधिकारो तथा कर्तव्यों के प्रति जाग्रत नहीं हैं तो न्यायालय का काम उसे जाग्रत करने का नहीं हैं? यह कार्य शासन तथा उससे भी ज्यादा सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं एवं सामाजिक व राजनैतिक दलों का हैं। इसके बावजूद भी यदि वे नागरिक जो उन्हे संविधान द्वारा दिये गये अधिकारो के प्रति जाग्रत नहीं हैं उन्हे तो अपने हाल पर छोड़ देना ही उचित होगा। कहा गया हैं जब तक बच्चा रोयेगा नहीं मां अपने प्राण से भी ज्यादा प्यारे बच्चे को दूध नहीं पिलाती हैं। मुद्दे की बात यह है कि ऐसे विषय पर  अविलम्ब एक संयत नीति बनाने की है न कि किसी एक घटना मात्र पर तुरंत कार्यवाही करने की हैं।  
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डॉ. ‘‘गुरमीत सिंह’’ का दूसरा रूप ‘‘बाबा‘‘ ‘‘राम रहीम’’?

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पिछले कुछ दिनो से प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रानिक मीड़िया में बलात्कारी, व्यभिचारी, अय्याश, पाखंड़ी, परमार्थ के बहाने अपनी स्वार्थी, वहशी, हवस की पूर्ति का एन केन प्रकारेन, साधक बाबा डॉ. गुरमीत सिंह से संबंधित खबरे भरी पड़ी हैं। दिन प्रति दिन नई नई गंदी स्टोरी प्रमाण सहित सामने आ रही हैं। इस बात में कोई शक नहीं हैं कि बाबा समाज के लिए एक बोझ हैं, जिसे उसकेे सही स्थान पर (जेल) पहुंचा दिया गया हैं। 
इस पृथ्वी पर जो भी व्यक्ति आता हैं वह सम्पूर्ण नहीं होता हैं। उसके हमेशा दो पहलू होते हैं, जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति के व्यक्तित्व के भी दो पहलू एक अच्छा व दूसरा बुरा होता हैं। गुरमीत में अनगिनत, अकल्पनीय, अक्षम बुराइयों के रहते हुये यह सिद्ध हो चुका हैं कि उसका व्यक्तित्व बुराईयों से अटाटूट भरा पड़ा हैं। इस तरह  से उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व खराब होकर खारिज कर दिए जाने के लायक ही हैं। फिर भी, आगे हम यहॉं पर सिक्के के दूसरे पहलू को भी पढ़ने का प्रयास करते हैं। 
अनगिनत बुराइयो की व्यापकता के कारण गुरमीत का तनिक तिनका सा भी उजला पक्ष न तो स्वतः दिख रहा हैं और न ही हम देख पा रहे हैं। हम मंे कम से कम इतना तो साहस अवश्य होना ही चाहिए कि, हम बुरे व्यक्तित्व के किचिंत तिनके भर उजले पक्ष को भी पढ़ सकें और उस पर विचार मनन् कर सके। आचार्य बिनोवा भावे व सम्पूर्ण क्रांति के जनक जय प्रकाश नारायण से प्रेरित होकर हमारे मध्य प्रदेश में ही पहले डाकू मान सिंह, फिर डाकू मोहर सिंह ने मूरत सिंह सहित बडी संख्या में अनेक डाकुओं के साथ आत्म समर्पण किया था। आज वे समाज के सभ्य नागरिक बनकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इन सबके बहुत पहले भी वाल्मिकी से लेकर चक्रवर्ती राजा सम्राट अशोक जैसे अनेक प्रसिद्ध व्यक्तियों के उदाहरण हमारे समक्ष हैं, जो प्रारंभ में बुरे थे, बाद में किसी एकाधिक घटना से प्रेरणा प्राप्त कर बुरे से अच्छे और अतंतः महान व्यक्ति बनकर इतिहास प्रसिद्ध हो गए। 
ये उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि बुरे व्यक्तित्व में भी अवश्य कुछ न कुछ अच्छाई छिपी होती हैं और अच्छे व्यक्ति में भी कुछ न कुछ बुराई होती ही हैं। जब किसी की बुराई, अच्छाई पर हावी होती हैं, तब वह बुरा व्यक्ति कहलाता हैं व जब किसी में अच्छाई ,बुराई पर हावी होती हैं, तब वह अच्छा व्यक्ति कहलाता हैं। फूलन देवी भी डाकू थी। लेकिन उसके व्यक्तित्व का एक पहलू कहीं न कहीं उजला पन लिये हुये था, जिसके बल पर वह चुनाव जीत कर संसद में पहुंॅच सकी।  
अपराधी गुरमीत सिंह के बुरे पक्ष के संबंध में पहले भी मैं एक लेख लिख चुका हैं। अब उसके उजले पक्ष जो उसके नाम राम रहीम से इंगित होता हैं, पर कुछ उजाला डालने का दुःसाहस पूर्ण  प्रयास कर रहा हूंूॅ। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह हैं कि आखिर गुरमीत राम-रहीम के करोडो अनुयायी (एक अनुमान के अनुसार लगभग 6 करोड़ से अधिक) कैसे बने, कई हजारो शिष्य अंधभक्त कैसे हुये व सैकडों शिष्य इस सीमा तक समर्पित कि उसे भगवान मानने वाले, कैसे बन गए। यही नहीं वे साधक व साध्वी बने और उन्होने अपना पूरा जीवन ही डेरे को सौप दिया। यही उसके व्यक्तित्व का एकमात्र उजला पक्ष कहा जा सकता हैं। इक्कीसवी सदी के विज्ञान से ओतप्रोत माहोल में हर तरह के व्यभिचारी बाबा के इतने सारे अंधभक्त बन गए कि वे उसके लिए मरने मारने के लिये उतारू हो जाते हैं, यह कैसे संभव हुआ? अर्थात् उसके व्यक्तित्व में अनेकानेक विध्वंशक तत्वों के साथ कुछ न कुछ निर्माण कारक तत्व भी मौजूद हैं।  
यह बात भी सामने आयी कि ‘‘बाबा’’ अपने कई सैकड़ो शिष्यों को रोजी रोटी देता रहा हैं।  उसके वृहत डेरे में सैकडों लोग प्रतिदिन मुफ्त भोजन करते हैं। उसने अस्पताल व स्कूल खुलवाये जहॉं शिष्यों को मुफ्त इलाज व मुफ्त शिक्षा की सुविधा दी जाती हैं। गुरमीत सिंह के साधक व साध्वियों ने कही भी यह दावा नहीं किया कि बाबा तांत्रिक (सिद्ध पुरूष) हैं या बाबा की किसी कार्य पद्धति सिद्धी, पूजा अथवा तंत्र से, भक्तों की समस्त इच्छाओं या मनोकामनाओं की पूर्ति हो जाती हैं। इसके बावजूद भी यदि वे उसके इतने अंधभक्त हैं, तो निश्चित रूप से गुरमीत के व्यक्तित्व में सम्मोहन अथवा कुछ ऐसा विशेष गुण भी हैं, जो एक सामान्य नागरिक को शिष्य बनाकर अंधभक्त बना लेता हैं। भक्तों की अंधभक्ति भी इस सीमा तक कि वे अपने बच्चो व परिवार के सदस्यो पर भी विश्वास न करके बाबा पर अटूट अंध विश्वास (भगवान मानने की सीमा तक) करते हैं जो बाबा की कार्यपद्धति का एक अहम तथ्य हैं। अन्यथा, यह अंधभक्ति निश्चित रूप से गुरमीत के हजारो समर्थको के दिमाग के दिवालियापन को ही दर्शाती हैं। यदि ऐसी अटूट अंधभक्ति का उपयोग  सत्कार्यो के निष्पादन हेतु किया जा सके तो समाज व देश का भला हो सकता हैं। 
गुरमीत एक आधुनिक ढोंगी बाबा हैं इसलिए उसने पीले चोले को धारण न कर 21 वीं सदी का चोला पहना। जिस कपड़े का एक बार उपयोग किया उसे दूसरी बार नहीं छुआ। डेरे में दस हजार से अधिक पोशाखें व ढेड़ हजार से अधिक जूते चप्पल मिले थे। साथ ही उसने कई गाड़ी भी अलग-अलग तरह की डिजाईन की या करवाई। उसके काफिले में सैकडों डिजाईन गाडियों का कारवॉं हैं, जो रजिस्टर्ड ब्रांड के डिजाईन की नहीं हैं। इसीलिए वह डिजाइनर बाबा कहलाए इस डिजाईनिग कार्य को रचनात्मक माना जा सकता हैं। छः म्युजिक एलबम जारी कर वह रॉक स्टार बाबा भी कहलाया। इसके साथ ही उसने फिल्म निर्माता, निर्देशक, एक्टर इत्यादि का भी कार्य किया व चार फिल्मे बनाई। उसने अपनी ऐशो आराम व व्यभिचार पूर्ण अय्याश जिदंगी के लिए अपने डेरे में सात सितारा होटल बनाया जिसकी सबसे विशेष बात  सात कमरे ऐसे बनवाए जो विश्व की सात धरोहर से रूबरू हो सके। इस प्रकार बुरे उद्देश्य को लेकर किए गये निर्माण में भी अनजाने में वह कुछ नवीन (अच्छा) कर बैठा। उसने डेरे में कई मार्केट बनाकर उनमें बहुत से शिष्यों को रोजगार भी दिया। 
बाबा के व्यक्तित्व का एक और अच्छा महत्वपूर्ण योगदान उसके द्वारा करीब 19 से अधिक वर्ल्ड़ रिकार्ड़ व अन्य रिकार्ड़ बनाये गये जो गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड़ व लिमका बुक ऑफ रिकार्ड़ व अन्य संस्थाओ में दर्ज हैं। इनके प्रमाण पत्र डेरे में प्रदर्शित किये गये हैं। यद्यपि उनमें से अधिकांश रिकार्ड कितने सही व उपयोगी हैं, इस पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगाया जा सकता हैं।  गुरमीत ने सैकडो शिष्यों से देह दान के शपथ पत्र भी भरवाएॅं हैं। लेकिन इस अच्छे कार्य में भी मानव अंगों की तस्करी का गोरख धन्धा होना बतलाया जा रहा हैं। वह क्रिकेट, बिलिर्यड़, बेड़ मिंटन आदि कई खेलो में रूचि रखता रहा हैं।   
गुरमीत के द्वारा सर्वधर्म समभाव का संदेश देने के लिये अपना नाम गुरमीत सिंह से बदल कर गुरमीत राम रहीम रखा। जाति प्रथा की समाप्ति के लिये जाति सूचक नाम हटाकर अपने भक्तों के नाम के आगे ‘‘इन्सा’’ (इन्सान) लगाने को प्रेरित किया व स्वयं भी लगाया। यह भी कहा गया हैं कि गुरमीत ने गरीब परिवार के बच्चों की शादियों में भी आर्थिक सहायता प्रदान की। भ्रूण हत्या, सामूहिक रक्तदान, आपदा प्रबंधन के लिये ग्रीन वेलफेयर फोरम के नाम से प्रशिक्षित अनुयायियों के दल का गठन किया। स्वच्छता, जैविक खेती व अन्य कई सामाजिक कार्यो के लिये अभियान भी चलाए। नेपाल में आये भूकंप में भी उसने सहायता प्रदान की थी। देश की 130 करोड़ की जनसंख्या में से कुल लगभग 29 नागरिको को सरकार द्वारा प्रदत्त की गई जेड़ प्लस सुरक्षा में एक व्यक्ति राम रहीम भी शामिल हैं।   
बाबा ने बड़ी संख्या में लोगो को शराब, मांस, तंबाकू के व्यसन से मुक्त कराया। भले ही इनकी आड़ में उसका उद्देश्य अनुचित रहा हो। उसके इन कृत्यों की आलोचना नहीं की जा सकती हैं। आज के युग में गांधी जी का वह सूत्र कि ‘‘साध्य के साथ साधन में भी शुचिता होनी चाहिये, कितना सार्थक हैं? यथार्थ धरातल पर आज यह कितना लागू हैं? जब हम आज साध्य की प्राप्ति के लिये साधन की शुचिता को छोड़ देते हैं, तो बाबा ने भी शुचिता को ही पूरी तरह ताक पर रख कर ऊपर वर्णित कुछ अच्छे कार्य सम्पन्न कर दिए। यह भी कहां जा सकता हैं कि गुरमीत ने अपनी अक्षम्य पापी दुनिया पर इस तरह के कुछ अच्छे कार्यो के द्वारा परदा डालकर ढ़कने का प्रयास किया।
गुरमीत के व्यक्तित्व का सबसे खराब पहलू उसका सेक्स के प्रति असीमित असामाजिक घृणित अनुराग रहा हैं। डेरे के स्कूल अस्पताल तथा अन्य सभी कार्य कलाप उसने इसी हवस की पूर्ति के लिए डिजाइन किए व करवाए, यहॉ तक कि इसके लिए उसने अनेक हत्या तथा सैकडो को नपुंसक बनाने में भी कतई गुरेज नहीं किया। यदि उसके व्यक्तित्व से इन अक्षम्य बुराई को हटा दिया जाये, सम्राट अशोक के समान उसका हृदय परिवर्तन हो जाय तो बाबा डॉ. गुरमीत सिंह बाबा राम रहीम बन सकता था तब वह अपने व्यक्तित्व के उपरोक्त कुछ (अच्छे) गुणों के कारण समाज के लिये उस सीमा तक उपयोगी व्यक्ति भी सिद्ध हो सकता हैं?
गुरमीत से भी गिरा हुआ यदि कोेई व्यक्ति इस पूरे कांड में हैं तो वह हनीप्रीत! हैं महिला होकर जिस तरह उसने सैकड़ो महिलाओं को बाबा गुरमीत की हवस का शिकार बनवाया जिसके लिये उसने एक ऐसी महत्वपूर्ण सक्रिय ‘‘विलेन’’ की भूमिका अदा की जो महिला समाज पर एक ऐसा कलंक हैं, जिसकी कल्पना शायद बुरे से बुरा व्यक्ति भी नहीं कर सकता हैं। हनीप्रीत ने सामाजिक रिश्तो को तार-तार कर दिया। इस घटिया कृत्य जिस का शब्दो में उल्लेख करना भी बहुत शर्मनाक हैं, के लिये शायद हमारे अपराधिक दंड संहिता में समुचित दंड़ भी नहीं हैं। अतः गुरमीत के पहिले तो सबसे पहिले हनीप्रीत को पकड़ कर बगैर मुकदमा चलाये उसे सरे आम फॉंसी देना भी शायद सभ्य समाज में असभ्य नहीं कहलायेगा।    
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रेयान इंटरनेशनल स्कूल में एक मासूम विद्यार्थी की जघन्य हत्या! क्या एक घटना मात्र हैं?

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‘गुरूग्राम’’ के ‘‘रेयान इंटरनेशनल स्कूल’’ में हुई एक 7 वर्ष के विद्यार्थी प्रद्युम्न की जघन्य हत्या को पिछले कुछ दिनो से इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया ने इतना अधिक कवरेज दिया है कि फिर वही पुराने अलाप व आरोप मीडिया ट्रायल की स्थिति उत्पन्न हो गई हैं। निश्चित रूप से मासूम की उक्त जघन्य हत्या ने अभिभावक के साथ साथ आम नागरिको को झकझोर दिया हैं जिसकी भर्त्सना के लिये शब्द नहीं हैं। एक मॉं ही उस असीमित, असहनीय, अविरल दुख को महसूस कर सकती हैं व वह उसे घिसटते हुये  जी रही हैं। अन्य लोग सिर्फ शब्दो द्वारा ही संवेदना व्यक्त कर सकते हैं। इन सबके बावजूद इस घटना को जिस तरह से मीडिया के द्वारा प्रसारित प्रचारित किया जा रहा हैं ‘‘क्या यही एक उचित तरीका बचा हैं’’ प्रश्न यह हैं?
सर्वप्रथम इस तरह की यह घटना देश की प्रथम घटना नहीं हैं, पूर्व में भी घटित होती रही हैं। विद्यमान घटना के 24 घंटे के भीतर ही न केवल अभियुक्त पकडा जा चुका हैं बल्कि उसने अपने इकबालिया बयान में जुर्म भीे स्वीकार कर लिया हैं। वह एक मानसिक रोग का शिकार हो सकता हैं, जैसा कि उसने हत्या के उद्देश्य के संबंध में अपने बयान में बतलाया था। इसके बावजूद पीडित परिवार के सदस्य पुलिस जांच से संन्तुष्ट नहीं हैं, एवं सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं जिसके लिये वे उच्चतम् न्यायालय भी पहुंचे हैं। यह उनका एक पूर्ण संवैधानिक अधिकार हैं जिसकी हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिये। उच्चतम् न्यायालय ने घटना का संज्ञान लेते हुये इसे मात्र एक घटना भर न मानकर राष्ट्रव्यापी स्कूलों में हो रहे ऐसी घटनाओं व अव्यवस्था को रोकने के लिए केन्द्र सरकार, हरियाणा सरकार, मानव संसाधन मंत्रालय व सीबीएसई को नोटिस जारी कर पूछा हैं कि स्कूल के बच्चो की सुरक्षा के बारे में व ऐसे घटना घटित होने पर स्कूल प्रबंधक की जवाबदेही क्या होनी चाहिए? लेकिन परिवार का यह कहना हैं कि उक्त हत्या में कन्डक्टर के अलावा और कोई ‘‘दूसरा’’ भी शामिल हैं। यह दूसरा कौन ? न तो पीड़ित परिवार ने अभी तक किसी की ओर निश्चित्ता के साथ इंगित किया हैं और न ही मीडिया ने। यद्यपि मीडिया इस घटना को जोर-शोर से प्रचारित कर रहा हैं। पुलिस की जांच में भी अभी तक कोई दूसरी थ्योरी भी सामने नहीं आयी हैं। एसआईटी की जांच रिपोर्ट में प्रथम दृष्ट्या स्कूल प्रशासन पर गहन लापरवाही व सुरक्षा बंदोबस्त में चूक व विभिन्न नियमों के उल्लंघन के आरोप पाये गये हैं। इस आधार पर पुलिस ने स्कूल के दो प्रशासनिक व्यक्तियों को गिरफ्तार भी कर लिया हैं व कार्यवाहक प्राचार्य को भी पूछताछ के लिये हिरासत में लिया हैं।
यदि हम एसआईटी की उक्त रिपोर्ट की सूक्ष्म  विवेचना करे तो यह स्पष्ट हो जाता हैं कि रेयान स्कूल में जो तीन प्रमुख कमियॉं बतलाई गई हैं, वे सब कमोेवेश लगभग हर सरकारी/गैर सरकारी स्कूल में भी मिल जायेगी। इलेक्ट्रानिक मीडिया के ओवी वेन आज भी किसी स्कूल में चले जाएॅं तो उनमें कमोवेश उपरोक्त कमियों के साथ और अन्य कई कमियॉं भी मिल जायेगी। कुछ मीडिया हॉऊस ने यह कार्य किया भी हैं। तब सरकार इस घटना से सबक लेकर तुरंत समस्त स्कूलो की विस्तृत जांच करवाने के आदेश क्यों नहीं दे रही हैं ताकि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो। मीड़िया ने भी न तो स्वयं इस दृष्टि से कार्य किया हैं और न ही सरकार का ध्यान ऐसी कार्यवाही के लिये आकर्षित किया हैं। यद्यपि अब केन्द्रीय सरकार मानव संसाधन मंत्रालय एवं कुछ राज्य सरकारे ने उच्चतम् न्यायालय द्वारा नोटिस जारी होने के बाद इस दिशा में कुछ कार्यवाही करने हेतु कदम उठाए हैं।
सिर्फ पीड़ित परिवार की असहनीय असीमित व्यथा को लगातार 72-72 घंटे से ज्यादा व्यक्त करके क्या मीडिया अपने दायित्व से मुक्त हो गया हैं? इस तरह की घटना जब एक ग्रामीण इलाके में छोटे से स्कूल में हो जाती हैं तब मीडिया कहां चला जाता हैं?किसी ग्रामीण इलाके की स्कूल की व्यवस्था देख ले। क्या वहॉं बाउंड्रीवाल हैं? क्या सिक्योरिटी गार्ड हैं। क्या वे सब व्यवस्थाएॅ इन ग्रामीण स्कूलो में हैं, जिनकी ओर एसआईटी ने उंगली उठाई हैं। क्या ग्रामीण स्कूल के ‘‘बच्चे’ -‘बच्चे’ नहीं होते हैं? अब जब शिक्षा का अधिकार पूरे देश में एक मूल संवैधानिक अधिकार बन गया है, तब सुरक्षित शिक्षा के पैमाने भी पूरे देश में क्यों नहीं लागू होना चाहिए?
एक बात और हैं, राजनेताओं का शिक्षण संस्थाओं के साथ गहरा नाता हैं, जिसके कारण यदि पब्लिक स्कूलों में कही शिक्षा का स्टेन्डर्ड बढ़ता हैं तो दूसरी ओर अभिमावकों का आर्थिक शोषण भी बढ़ता हैं। साथ ही शिक्षण संस्था संचालन में नियमो की बडी अनदेखी भी होती हैं। लेकिन राजनैतिक दखल होने के कारण कोई भी प्रशासनिक व्यवस्था इन पर कार्यवाही करने में तब तक हिचकते रहते हैं जब तक केाई घटना घटित न हो जाय। इस नेक्सस को तोडना भी समय की पुकार हैं। 
अंत में उक्त जघन्य घटना की भर्त्सना मात्र करते हुये पीड़ित परिवार के साथ पूरी हार्दिक संवेदना दर्शाने के साथ मीडिया अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ, मीडिया ट्रायल कर, अपनी लक्ष्मण रेखा को खुद तोड़ रहा हैं, और यह पहली बार नहीं हो रहा हैं।
  
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‘‘बहुमत’’ का निर्णय ‘नैतिक’ रूप से कितना ‘‘बलशाली’’?

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एक साथ ‘‘तीन तलाक’’ के संदर्भ में माननीय उच्चतम् न्यायालय द्वारा दो के विरूद्ध तीन के बहुमत से ऐतहासिक फ़ैसला देकर लम्बे समय से चली आ रही बहस को विराम देते हुए ‘‘त्वरित तीन तलाक’’ को असंवैधानिक करार देने के साथ साथ तुरन्त ही एक अन्य बहस को भी अवसर प्रदान कर दिया हैं। वह इसलिए कि ऐसे महत्वपूर्ण संवेदनशील मुद्दे पर तीन दो के बहुमत का निर्णय संविधान के तहत तो बंधनकारी हैं, जिसने (सिवाए पुर्नावलोकन की स्थिति को छोड़कर) मुद्दे को अंतिम रूप से निर्णीत कर दिया हैं। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में नैतिक बल के आधार पर क्या यह निर्णय उतना ही प्रभावी माना जायेगा? यह निर्णय ऐसा प्रश्न पैदा करने का एक अवसर आलोचको को देता हैं। उच्चतम् न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेकर उक्त मामले की सुनवाई प्रारंभ कर मुस्लिम महिलाओं के बराबरी (समानता) से जीने के संवैधानिक अधिकार पर ‘‘तीन तलाक’’ द्वारा जो अतिक्रमण किया जा रहा था, उस बाधा को समाप्त कर, मुस्लिम महिलाओं को एक बड़ी राहत प्रदान की हैं। उनके असहय जीवन में तनाव को समाप्त कर उनमें नव जीवन का संचार किया हैं। इस ऐतहासिक निर्णय ने एक और विवाद समान सिविल संहिता के संबंध में कानून बनाने का रास्ता भी साफ कर दिया हैं। वैसे भी जब आपराधिक न्यायशास्त्र, मुस्लिम सहित समस्त भारतीयो पर लागू हैं, तब सिविल सहिंता के मामले में मुस्लिम समाज अलग क्यों रखा जाना चाहिए?
लोकतांत्रिक देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया निश्चित रूप से बहुमत के आधार पर संचारित होती हैं। वह बहुमत भी पूर्ण बहुमत न होकर उस प्रक्रिया में भाग लेने वाले व्यक्तियों के बीच का ही होता हैं। अर्थात् ऐसी प्रक्रिया में भाग लेने के लिये अधिकृत रूप से भागीदार होने वाले समस्त पात्र व्यक्तियांे की संख्या का बहुमत गिनने की व्यवस्था हमारी वर्तमान लोकतंात्रिक प्रक्रिया में नहीं हैं। मतलब साफ हैं कि कुल मतो का 50 प्रतिशत से अधिक की संख्या के मत से होने वाले निर्णय को ही बहुमत मानने की व्यवस्था हमारी लोकतंात्रिक प्रक्रिया में नहीं हैं। माननीय उच्चतम् न्यायालय के ऐसे कुछ, बहुत ही संवेदनशील प्रकरणों में भी ऐसी ही प्रक्रिया का लागू होना क्या एक श्रेष्ठ न्यायिक प्रक्रिया/प्रणाली मानी जानी चाहिए? 
कानूनी रूप से संवैधानिक एवं बंधनकारी इस कानूनी व्याख्या को छोड़कर निम्न तीन बिन्दु इस निर्णय को अन्यथा व नैतिक रूप से कमजोर बनाते हैं। एक, ऐसा निर्णय जो समाज विशेष या धर्म विशेष अर्थात् अल्पसंख्यक मुसलमानों के इस्लाम धर्म केे व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) को अक्षुण्ण मानते हुये मात्र आधे अंक से ज्यादा वाले बहुमत के निर्णय के कारण दिया गया हैं। वह नैतिकता के बल के साथ उक्त विवाद को तार्किक रूप से पूर्ण स्पष्टता के साथ अंतिम रूप से निर्णीत कैसे कर पायेगा। आप को मालूम ही है, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में कोई भी निर्णय सर्व सम्मति से ही लागू होता हैं। पांच सदस्यों में से किसी भी एक सदस्य के वीटो के कारण बहुमत के निर्णय को भी लागू नहीं किया जा सकता हैं। क्या ऐसे ही निर्णय की परिस्थिति इस प्रकार के अल्प लेकिन अतिसंवेदनशील विषयों में उच्चतम् न्यायालय की निर्णय प्रणाली पर भी लागू नहीं किया जाना चाहिए? दूसरा उच्चतम् न्यायालय के उक्त निर्णय में जब स्वयं माननीय न्यायालय ने यह ध्यान रखा कि उक्त मुद्दे की सुनवाई पांच विभिन्न धर्मो के न्यायमूर्तियॉं द्वारा (जिसमें कोई महिला जज शामिल नहीं थी) करें ताकि किसी भी प्रकार की अल्प शंका का भी वातावरण न बन सके। इन बरती गई सावधानियों के बावजूद मुस्लिम धर्मावलम्बी माननीय न्यायमूर्ति ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) से संबंधित प्रकरण में, ही बहुमत के निर्णय से अपने को अलग रखा, तब क्या यह स्थिति इस निर्णय को और भी कमजोर नहीं कर देती हैें? तीसरा मुख्य न्यायाधीश जो इस बंेच के भी प्रमुख थे, ने भी अपने को बहुमत के निर्णय से अलग रखा हैं। इसी कारण से मैंने इसे ‘‘आधे अंक के बहुमत का निर्णय’’ ऊपर पेरा में लिखा हैं। यह भी पहली बार देखने को मिला व क्या यह उचित हैं कि किसी विशेष धर्म पर्सनल लॉ से जुड़े मामले में उच्चतम् न्यायालय ने विभिन्न धर्मावलम्बीयों के न्यायमूर्तियों की (धर्म के आधार पर?) बेंच बनाई। पूर्व में शाहबानो प्रकरण में भी जिसमें मुस्लिम महिला के गुजारे के अधिकार का मामला था उसमे भी ऐसा नहीं हुआ था जहॉ समस्त न्यायमूर्ति जो विभिन्न धर्मो के नहीं थे और मुस्लिम धर्म के कोई भी न्यायमूर्ति नहीं थे। तब सर्वसम्मति से शाहबानो के पक्ष में निर्णय दिया गया था जिसे बाद में संसद ने कानून बनाकर निष्प्रभावी कर दिया था। 
न्याय का मूल सिद्धांत यह भी हैं कि न केवल न्याय मिलना चाहिए बल्कि न्याय मिलता हुआ महसूस भी होना चाहिए। अर्थात परसेप्शन (अनुभूति) का ‘‘न्याय क्षेत्र’’ में बहुत महत्वपूर्ण स्थान हैं जिसका वर्त्तमान निर्णय में अभाव सा महसूस होता हैं। उपरोक्त सब कारणों से यहॉं यह प्रश्न पैदा होता हैं कि नैतिकता के धरातल पर भी यह निर्णय क्या उतना ही बलशाली माना जायेगा जितना कानूनी आधार पर? ऐसी स्थिति के कारण यह निर्णय मुस्लिम समाज के एक वर्ग को क्या यह अवसर प्रदान नहीं कर देता हैं कि आगे किसी बड़ी बेंच में मामला रेफर किया जाय, जहॉं कम से कम दो तिहाई बहुमत से स्पष्ट निर्णय हो। जब हमारे संविधान में संसद में सामान्य बहुमत न होने पर सरकार गिर जाती हैं लेकिन वह सामान्य बहुमत वाली सरकार जब कोई संविधान संशोधन बिल लाती हैं तो उसे दो तिहाई बहुमत से पारित करना होता हैं। ठीक इसी प्रकार की दो तरह के बहुमत की व्यवस्था न्यायपालिका की उपरोक्त स्थिति में भी क्यो नहीं होनी चाहिए? ऐसी व्यवस्था होने पर ही ऐसे संवेदनशील मुद्दे के निर्णय पर से धुंध की छाया हटकर यर्थाथ स्थिति स्पष्ट हो सकेगी और एक स्पष्ट निर्णय पूरे मुस्लिम कौम को कानून के साथ-साथ पूरे नैतिक बल के साथ मानने के लिये बाध्य होना पडे़गा। अभी अभी आया माननीय उच्चतम् न्यायालय की सात सदस्यीय बेंच का निजता का अधिकार के मामले में आम सहमति का निर्णय उक्त मत की पुष्टि ही करता हैं।
इस निर्णय के बाद माननीय मुख्य न्यायाधीश ने सिंगल बेंच के रूप में अभी तक जो निर्णय दिये हैं वे कितने सही होगंे, यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ सकता हैं, क्योंकि उनके विचार (ओपिनियन) को अन्य तीन न्यायमूर्तियों ने उक्त एक मामले में ही स्वीकार नहीं किया हैं।
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‘‘सर्जिकल स्ट्राइक’’ से क्या ‘‘समस्या’’ ‘‘हल’’ हो जायेगी?

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    1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के पश्चात् शायद यह पहला अवसर हैं जब देश का राजनैतिक नेतृत्व ने न केवल दृढ़ इच्छा शक्ति प्रदर्शित करते हुये सेना को सर्जिकल स्ट्राइक की अनुमति प्रदान की बल्कि वह सेना के पीछे पूरी ताकत के साथ खडा हुआ भी हैं। शायद इसीलिए 56 इंच सीने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व की न केवल देश में सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही हैं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी उनके इस कदम को अवाक व बेबाक मूक सहमति मिल रही हैं। युद्ध व सर्जिकल आपरेशन में अंतर होता हैं। इसीलिए ‘‘कारगिल’’ को तत्त्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा सेना को दिया गया समर्थन ‘‘सर्जिकल आपरेशन’’ न माना जाकर ‘छोटा युद्ध’ माना गया। इसीलिये उक्त सर्जिकल आपरेशन को वर्ष 71 के बाद की प्रथम कार्यवाही कहा गया है। ‘यूपीए’ के कुछ नेतागण एंव पूर्व रक्षा मंत्री शरद पंवार यह दावा कर रहे हैं कि यूपीए सरकार ने इससे पहिले भी चार बार सर्जिकल आपरेशन किये थे, जिसका उनके द्वारा ढिंडोरा नहीं पीटा गया हैं। यदि यह बात सत्य हैं जैसा कि एक समाचार पत्र ‘‘द् हिन्दु’’ ने 2011 में सर्जिकल स्ट्राइक की बात को तथ्यों के प्रमाण के साथ छापा हैं तो यूपीए सरकार भी और ज्यादा बधाई की पात्र हैं क्योंकि उसने तुलनात्मक रूप में मौन रहकर उक्त कार्य को अंजाम दिया था। यद्यपि इस बात पर भी ध्यान देने की आवश्यकता हैं कि सरकार ने सेना के माध्यम से बाकायदा पत्रकार वार्ता कर उक्त सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी दुनिया को दी जिसका एक खास मकसद पाकिस्तान शासको पर मानसिक दबाव ड़ालने के साथ-साथ विश्व जनमत को उक्त कार्यवाही के पक्ष में अनुमोदन करवाना भी एक पक्ष हो सकता हैं।  
जब से सर्जिकल स्ट्राइक हुआ हैं, इस देश में मीड़िया खासकर इलेक्ट्रानिक मीड़िया द्वारा राजनेताओं के बीच चलाई जा रही घातक बहस न केवल चिंतनीय हैं, बल्कि निंदनीय व दंड़नीय भी हैं। ‘‘सर्जिकल स्ट्राइक’’ को प्रत्येक भारतीय ने अंतर्मन से सराहा हैं। सेना को पूर्ण होश हवास में आंख मंूद कर, खुलकर समर्थन दिया हैं। लेकिन राजनीति के चलते विपक्ष द्वारा सेना का प्रांरभिक समर्थन करने के साथ-साथ एक ही संॉस में (दुर्भाग्वश देश का दुर्भाग्य ही यही हैं) कुछ इस तरह के बयान व प्रतिक्रियॉये दी गई जिससे यह आभास/प्रतीत होने लगा हैं कि वे देश के राजनैतिक नेतृत्व के साथ -साथ सर्जिकल स्ट्राइक पर भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं। वस्तुतः  विपक्ष ने शायद तुच्छ राजनीतिक भावना के तहत प्रतिक्रिया देते समय अनजाने में नहीं लेकिन अनचाहे कुछ इस तरह कि प्रतिक्रिया दे दी जिससे हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान को हमारी राजनीति पर हमला करने का सुअवसर प्राप्त हो गया। उक्त मुद्दे पर मीड़िया ने स्वयं आगे आकर विभिन्न दलो व नेताओं की प्रतिक्रिया लेकर (लगभग 99 प्रतिशत) उसे पूरे विश्व में  प्रसारित किया गया। नगण्य लोगो ने ही स्वतः आगे आकर ट्विटर इत्यादि माध्यम से प्रतिक्रिया दी लेकिन स्वयं मीड़िया द्वारा उक्त आलोचनात्मक प्रतिक्रिया देने वालों कीे देश भक्ति पर ही प्रश्न चिन्ह लगाये जाने का प्रयास किया गया। क्या इस तरह की प्रतिक्रिया का प्रसारण कर उन्हें एक प्लेटफार्म देकर मीड़िया स्वयं की देशभक्ति पर भी प्रश्न वाचक चिन्ह नहीं लगवा रहे हैं? इस पर न केवल विचार करने की आवश्यकता हैं बल्कि इस पर अवश्य विचार करना चाहिए यदि मीड़िया अपने प्रोग्रामों में ऐंकर के माध्यम से इस तरह के वाद-विवाद बहस नहीं कराते तो इस तरह की फजीहत की नौबत तो नहीं होती। अतः क्या अब यह समय नहीं आ गया हैं कि जब देश दुश्मन देश द्वारा पोषित आंतकवादियों गतिविधियों से लड़ रहा हो, देश की सीमा पर लगातार सीज-फायर भंग किये जा रहे हैं, सर्जिकल आपरेशन हो रहे हो, युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने लगी हो तब क्या मीड़िया खासकर इलेक्ट्रानिक मीड़िया पर प्रभावशाली नियत्रंण रखने की आवश्यकता नहीं है? क्योंकि हम मीड़िया हाउस से आत्मानुशासन की उम्मीद तो खो चुके हैं (कुछ एकाध मीड़िया हाउस को छोड़कर)
इस एक सर्जिकल स्ट्राइक से यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है कि क्या यही प्रमाण पत्र एक साधन हैं, जिससे कश्मीर का मामला, पीओके का मामला या अंर्तराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान द्वारा लगातार किये जा रहे उल्लघंनांे के मामले या आंतकवादी घटनाओं के मामले सुलझ सकते है?ं यहां पर सर्जिकल आपरेशन और पूर्ण आपरेशन में अंतर क्या हैं यह समझ लेना भी जरूरी हैं। पूर्ण आपरेशन अर्थात् युद्ध। क्या पाकिस्तान के पापी शरीर का मात्र कुछ अंग ही खराब हैं जिनका सर्जिकल स्ट्राइक कर हमारी उपरोक्त उल्लेखित समस्त समस्याएॅं सुलझ जायेगी? उत्तर 100 प्रतिशत नहीं में हैं। इसका पूरा आपरेशन किया जाना नितांत आवश्यक हैं। तब हम स्वयं ही एक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का ढिंडोरा क्यों पीट रहे हैं, क्यो नहीं सुदृढ़ दीर्घायु नीति बनाकर समग्र आपरेशन की पूर्ण तैयारी करके समय बद्ध अवधि में पूर्ण आपरेशन सम्पन्न क्यों नहीं करते हैं? क्या अब पूर्ण आपरेशन का समय नहीं आ गया है? क्या हमारे देश के नेतृत्व को इस तरह की समस्या के निराकरण के लिये अमेरिका, जर्मनी, इजराईल, इंग्लैड़, रूस इत्यादि देशों द्वारा की गई कार्यवाही से दिशा-दर्शन नहीं मिलता हैं जिन्होंने अपने स्वाभिमान के खातिर तत्कालीन परिस्थिति के अनुसार ऐसी समस्याओं को सुलझाने के लिये संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति लिये बगैर व परवाह किये बिना परिस्थितियों का यथार्थ अंाकलन कर दुश्मन देशों में जाकर विभिन्न तरीकों के गुरिूल्लावार, सर्जिकल आपरेशन व आवश्यकतानुसार युद्ध कर समस्या को सुलझाया। हम एक तरफ तो पूर्ण कश्मीर हमारा हैं जिसमें पीओके भी शामिल हैं के लिये संसद में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करते हैं, इस प्रस्ताव के क्रियांन्वयन के लिये विगत 78 सालों में हमारे द्वारा कोई भी सार्थक, प्रभावी कदम नहीं उठाया गया? यदि एक सर्जिकल स्ट्राइक सिद्ध रामबाण माना जा रहा हैं तत्पश्चात् तब भी पाकिस्तान के द्वारा सीमाओं का लगातार उल्लंघन क्यों हो रहा हैं जिसमें हमारे सैनिक शहीद होते जा रहे है। यदि एक सर्जिकल स्ट्राइक से रोग का इलाज नहीं हो पा रहा हैं तो कई सर्जिकल आपरेशन लगातार करके आवश्यकतानुसार एक पूर्ण आपरेशन अर्थात् ‘‘आक्रमण’’ करके समस्या का अंतिम समाधान क्यों नहीं निकाला जाता हैं? हम क्यों शत्रु देश के आक्रमण रूपी आंतकवादी कार्यवाहीयों का इंतजार कर मात्र उसे विफल करने की सीमा तक ही प्रत्याक्रमण करके उसे नेस्ता नाबूद करते रहेगे। कुछ प्रगतिशील कहे जाने वाले लेखक, नेता, साहित्यकार जो अपने को शंाति का देव-दूत मानते हैं, वे यह कह सकते हैं कि यह अव्यावहारिक हैं, तो फिर यह राग अलापना छोड़ दे कि पूर्ण कश्मीर हमारा हैं व हम उसे साहित्यकारांे की विभिन्न किताबों में लेखनी मात्र इतिहास की किताबों के पन्नों में नजर आयेगी, धरातल पर नहीं!  
देश के नागरिकों, समस्त राजनैतिक पार्टियों व नेताओं को याद होगा कि जब वर्ष 1971 यु़द्ध के फलस्वरूप बंग्लादेश के रूप में एक नये राष्ट्र का जन्म हुआ था तब पक्ष-विपक्ष प्रत्येक नागरिक ने चाहे वह किसी भी विचार धारा का ही क्यों न हो, सब ने एक साथ मिलकर एकजुट होकर तत्कालीन नेतृत्व का बिना शर्त समर्थन किया था। तत्कालीन विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने तो प्रंशसा में इंदिरा गांधी को दुर्गा का अवतार तक कह ड़ालने में हिचक तक नहीं की थी। (यद्यपि बाद में कुछ क्षेत्रो से यह खंडन भी आया कि अटलजी ने ऐसा नहीं कहा था।) आम नागरिक वैसे ही प्रतिक्रिया तत्कालीन सत्तापक्ष जो वर्तमान में अब विपक्ष ंहै,ं से उम्मीद करता हैं। लेकिन वर्ष 1971 के बाद 45 सालों में राजनीति में इतनी गिरावट आ गई हैं, नैतिक मूल्यों का इतना ह्रास हुआ हैं कि वर्तमान विपक्ष नरेन्द्र मोदी को वैसा समर्थन देने से हिचक रहे हैं (जिसके वे हकदार भी है।) जैसा कि पूर्व में इंदिरा गांधी को को मिला था। लोकतंत्र का यह सर्वमान्य सिंद्धान्त हैं कि सत्ता पर बैठा हुआ राजनैतिक नेतृत्व जो भी निर्णय लेता हैं उसके यश-अपयश का भी वही हकदार व जिम्मेदार होता हैं। अतः देशहित में केवल यही उपयुक्त होगा कि विपक्ष अनावश्यक रूप से इस मुद्दे पर राजनीति न कर पडौसी देश को हमारे विरूद्ध कुछ कहने का मौका न दे। सत्तापक्ष से भी यह उम्मीद की जाती है कि वे अतिरेक में सेना द्वारा की गई कार्यवाही को राजनीति से दूर रखने का प्रयास करे। ऐसे समय देश की 100 प्रतिशत एकजुटता की आवश्यकता हैं यदि हमे पीओके पर कब्जा कर पाकिस्तान को वास्तव में सबक सिखाना हैं तो! अंत में देश की सीमा के सजग प्रहरी व देश के आत्म सम्मान की रक्षा करने वाले समस्त सैनिकों को दंडवत् प्रणाम। 

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‘‘क्या भारत देश में शासन ‘‘न्यायपालिका’’ चलायेगी?’’

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राजीव खण्डेलवाल:
विगत दिवस माननीय उच्चतम् न्यायालय ने डांस बार के लिए लाईसेंस देने के सम्बंध में महाराष्ट्र सरकार को पूर्व में दिये गये निर्देशों का पालन न करने पर कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि बार में डांस करना भीख मांगने से अच्छा है। यहॉ यह उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र सरकार ने पूर्व में वर्ष 2005 में अधिकांश राजनैतिक दलों एवं जनभावना के अनुरूप, नैतिकता के आधार पर डांस बार पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके लिये महाराष्ट्र विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित किया गया था। इसके खिलाफ कुछ डांस बार संचालको ने न्यायालय में पिटीशन दायर की थी जिस पर अतंतः माननीय उच्चतम् न्यायालय ने नियम बनाकर डांस बार के लाईसेंस दिये जाने के आदेश दिये थे। महाराष्ट्र सरकार ने न्यायालय के निर्णय को ध्यान में रखते हुए साथ ही नैतिक मूल्यो के प्रति अपनी भावनाओं को सुरक्षित रखते हुए इस प्रकार के नियम बनाये कि किसी भी संचालक के लिए डांस बार का लाईसेंस लेना लगभग अव्यावहारिक व असंभव सा हो गया। इस पर उच्चतम् न्यायालय में पुनः याचिका दायर की गई जिस पर उपरोक्तानुसार निर्देश दिये गये।
भारतीय संविधान में लोकतांत्रिक शासन की व्यवस्था की गई है जिसके द्वारा देश का शासन चलाने के लिए कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका का प्रावधान किया गया है, जिनके अधिकार क्षेत्र भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किये हुए है। भारत विश्व का सबसे बड़ा सफल लोकतांत्रिक देश माना जाता है, जहां जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार ही कार्यपालिका के माध्यम से शासन करती है। यदि शासन कानून या संविधान के किसी प्रावधान के विरूद्ध कोई निर्णय लेता है तो, न्यायपालिका को उसे रद्द करने का अधिकार प्राप्त है।
यदि उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में माननीय उच्चतम् न्यायालय के उक्त निर्णय को कसौटी पर परखा जाय तो यह स्पष्ट होता है कि यह राज्य व केन्द्र सरकार का अधिकार क्षेत्र हैं कि वह शासन चलाते हुए न केवल नैतिक मूल्यों का संरक्षण करे, संधारण करे बल्कि उन्हे उच्च स्तर पर ले जाने का प्रयास भी करे ताकि वह अपने निर्णयों को आसानी से क्रियांवित कर सके जो जनहित में लोकप्रिय एवं लोकोपयोगी निर्णय साबित हो सके। इस सम्बंध में कोई दो मत नहीं हो सकते है कि भारतीय संस्कृति के संदर्भ में डांस बार का चलना न केवल नैतिक मूल्यों के विरूद्ध है अपितु इससे समाज में अपराध और कई गैर कानूनी कार्याे को बढ़ावा मिलता हैं व पारिवारिक क्लेश भी बढ़ता है। बार-डंास बार गर्ल को डंास जीवन उपार्जन के लिए संवैधानिक अधिकार प्रदान नहीं करता है। कोई भी कृत्य जो नैतिकता के विरूद्ध है, उसे रोजी-रोटी के आधार पर संवैधानिक आधार का औचित्य  प्रदान नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा माना गया तो जुएं के अड्डो से लेकर वैश्यागमन आदि तक के समस्त गैर-नैतिक कार्य संवैधानिक व कानूनी बन जावेंगे। 
‘डांस’ (नृत्य) करना एक कला है और उससे पैसा कमाया जा सकता है, कमाया भी जाता हैं और यह संवैधानिक अधिकार भी हो सकता है जैसा कि माननीय उच्चतम् न्यायालय ने कहा है। लेकिन डांस बार में जिस प्रकार का डांस होता है वह प्रायः अश्लीलता की सभी हदे पार कर जाता है। जो हमारे नैतिकता के मूल्यों के विपरीत है। समाज में भी बार डांसर को हेय दृष्टि से देखा जाता है। (यद्यपि उसी डांस को फिल्मों में हम परिवार के साथ बैठकर देखते भी है) इसलिए बार डांस के द्वारा पैसा कमाना गलत तरीके से पैसा कमाना नहीं है तो और क्या है? एक अन्य तथ्य का यहा उल्लेख करना समाचीन होगा जहां उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनाये गये डांस बार लाईसेंस के नियमों पर यह कथन किया कि इसकी शर्ते ऐसी है कि सरकार द्वारा प्रतिबंध (बेन) न लगाने के बावजूद इन शर्तो के कारण बार खोला जाना सम्भव नहीं है। क्या माननीय उच्चतम न्यायालय ने इस दिशा में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के अंतर्गत 2013 में बने नियमों पर कभी ध्यान गया है? इस नियम में जिस तरह की शर्ते बनाई गई है, वे ठीक बार लाईसेंस की शर्तो के समान उतनी ही कड़क - कठोर व अव्यवहारिक है जिनके तहत सरकार भी यदि चाहे तो उन नियमों को पूर्णतः लागू करते हुए अपना रेस्टॉरेंट नहीं चला सकती है इन नियमों के सम्बंध में कभी माननीय न्यायालय ने ऐसा नहीं कहा कि इन नियमों के रहते कानूनन् कोई भी रेस्टॉरेंट नहीं चल सकता है। इस कारण से यह अधिनियम खाद्य् विभाग के लिए भ्रष्ट्राचार का बहुत बड़ा माध्यम बन गया है। 
मैं नहीं समझता कि महाराष्ट्र सरकार ने डांस बार प्रतिबंधित कर किसी कानून या नागरिक अधिकारों का उलंघन किया या जिसके लिए उच्चतम् न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़े। क्योंकि कोई भी नागरिक अधिकार निरपेक्ष या पूर्ण नहीं होता हैं। आखिर चुनी हुई सरकार को जनहित में (उसकी दृष्टि में) अपने विवेक के अनुसार निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। और यदि कोई निर्णय जनता के विरूद्ध है तो पांच वर्ष बाद जनता के पास यह अधिकार है कि वह उस मुद्दे पर सरकार को मतदान के अधिकार द्वारा उखाड़ फेंके। तब यहॉं पर न्यायालय को हस्तक्षेप करने का क्या अधिकार है? विगत कुछ वर्षो में न्यायालय ने न्यायिक सक्रियता के रहते हुये बहुत से ऐसे  निर्णय दिये है जो सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से उसके अधिकार क्षेत्र में आते प्रतीत नहीं होते है। चूंकि वे निर्णय प्रथम दृष्ट्या जनता के हित में हुए इसलिए वे जनता द्वारा स्वीकार कर लिए गये। फिर चाहे वह सीएनजी गैस-बस का मामला हो, डीजल टैक्सी का मामला हो, पर्यावरण का मामला हो, शनि सिंग्नापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला हो, जल संकट के कारण आई.पी.एल मैच स्थानातंरित करने का मामला हो या इसी तरह के अन्य अनेक इसी तरह के मामले हांे। उच्चतम् न्यायालय का शायद यह प्रथम निर्णय है जो आम जनता के हित में न होकर समाज के एक छोटे से वर्ग की संतुष्टि मात्र के लिए दिया गया प्रतीत होता है। ‘‘न्यायिक सक्रियता’’ (जिसके संबंध में हाल में ही माननीय उच्चतम् न्यायालय के मुख्य न्यायधीश ने चिंता व्यक्त की है) के प्रभाव में न्यायालयों द्वारा न्यायिक निर्णयों के माध्यम से राज्य -केन्द्र शासन को समय -समय पर विभिन्न निर्देश कुछ करने या न करने के जो दिये गये है, उनसे यह लगता है कि न्यायपालिका अप्रत्यक्ष रूप से उन बहुत से क्षेत्रो में अपने उन निर्देश-निर्णयों के द्वारा शासन करने का आभास दे रही है, जो निर्णय वास्तव में एक चुनी हुई सरकार को लेने चाहिए थे। इसका दूसरा पहलू शायद न्यायपालिका द्वारा स्वयं को सुर्प्रीम मानना भी है। हाल में ही उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने के मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की गई कि राष्ट्रपति राजा नहीं हैं जिसके आदेश की समीक्षा नहीं की जा सकती हैं। क्या यहीं सिंद्धान्त न्यायपालिका पर भी लागू नहीं होता हैं? यदि राष्ट्रपति सर्वोपरि नहीं तो न्यायपालिका के न्यायाधीश किस तरह सर्वोपरि मान लिये जॉंय। जबकि संविधान ने उच्चतम् न्यायालय के निर्णय के पूर्नावलोकन (रिव्यु) का प्रावधान किया हैं जिसका उपयोग करके कई बार उच्चतम् न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय को बदला भी है। 

    न्यायालय सरकार का ध्यान अवश्य उन मुद्दो की ओर आकर्षित कर सकती है ताकि सरकार उस पर तदानुसार निर्णय ले सके लेकिन उन मुद्दो पर आदेश देना भले ही वह जनहित में ही क्यों न हो, (जहां संविधान या कानून का उलंघन नही होता है,) वे न्यायालय की कार्य सीमा को अतिकृमित करते प्रतीत होते है। इसका कारण एक यह भी हो सकता है कि जब एक ‘‘संस्था’’ अपने उत्तरदायित्व के प्रति विफल हो रही हो तब दूसरी संस्था उस शून्य को भरने का प्रयास कर रही होती है। लेकिन दूरदृष्ट्रि में यह भारतीय लोकतंत्र के लिए न तो एक स्वस्थ्य परम्परा होगी न ही उसके ‘‘स्वास्थ्य’’ के लिए ठीक रहेगी। इसलिए यदि न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार में रहकर सरकार की गलतियों को या उनके जनहितैषी  कर्तव्य के प्रति उदासीनता को समय-समय पर चेताने की सीमा तक उजागर करे तो उससे संवैधानिक संस्था विधायिका अपनी गलतियों को सुधारकर दूर करने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहेगी, और तभी एक स्वस्थ्य लोकतंत्र सुचारू रूप से कार्य कर पायेगा जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेड़कर ने की थी। 
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त्वरित न्यायिक सक्रियता! क्या न्यायपालिका कार्यपालिका बनते जा रही है?

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राजीव खण्डेलवाल:
भारतीय संविधान के तीन प्रमुख स्तम्भ है। विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका। संविधान में तीनों के कार्य क्षेत्र स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं तथा उन्हें सीमंाकित भी किया गया है। संविधान लागू होने के 65 साल व्यतीत हो जाने के बावजूद तीनों संस्थाएॅं समय-समय पर एक दूसरे के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप करने के आरोपो के साथ साथ सर्वोच्चता के मुद्दे पर भी बहस व विवाद करते रहती है, तथा प्रथक-प्रथक रूप से दूसरी संस्थाओं के साथ सांमजस्य के साथ परस्पर मान सम्मान का ध्यान रखते हुए कार्य करते चली आ रही है। लेकिन इतना सब होने के बावजूद न्यायिक सक्रियता (यह शब्द सर्व प्रथम उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती के द्वारा प्रकाश में लाया गया) के कारण न्यायपालिका ने कई बार ऐसे निर्णय दिये है जो प्रथम दृष्टया कार्यपालिका के क्षेत्र में अतिक्रमण प्रतीत होते हैं। लेकिन जनता के हित में होने के कारण अन्ततोगत्वा जनता ने उन निर्णयों को सर अंाखो पर रखकर स्वीकार किया है। तथापि न्यायिक क्षेत्र के बुद्धिजीवी वर्ग ने इस तरह कानून से परे जाने के आधार पर उक्त निर्णयों की आलोचना भी की हैं।
विगत तीन दिवस आये माननीय उच्चतम् न्यायालय के निर्णयों व आज उच्च न्यायालय दिल्ली के निर्भया मामले में आये निर्णय ने पुनः इस विवाद को न केवल सतह पर ला दिया बल्कि एक नया विवाद भी पैदा कर दिया। माननीय उच्चतम् न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुये उत्तरप्रदेश के लोकायुक्त की नियुक्ति स्वयं कर उत्तर प्रदेश सरकार को उसे कार्याविन्त करने के आदेश दिये है जो स्पष्टतः कार्यपालिका का कार्य होने के कारण उच्चतम न्यायलय द्वारा प्राथमिक दृष्टि में कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण कहा जा सकता है। लेकिन यह निर्णय तब आया जब पूर्व में उत्तर प्रदेश सरकार को लोकायुक्त की नियुक्ति कंे संबंध में दिये गये निर्देश का उसने पालन नहीं किया तब उच्चतम् न्यायालय ने मजबूरी में उक्त नियुक्ति का आदेश पारित किया। इसके विपरीत लोक हित के विरूद्ध निर्भया कांड में उच्च न्यायालय द्वारा (‘‘आदेश की तारीख पर बालिग हो जाने के बावजूद चूॅकि यौन अपराध करने वाला आरोपी अपराध करते समय नाबालिग था’’) नाबालिक अभियुक्त की रिहाई को रोकने से इनकार कर दिया, चूॅंकि वैसा आदेश पारित करना कानूनन् सम्भव नहीं था। इस प्रकार यहॉं उच्च न्यायलय ने जनता की भावना के अनूरूप निर्णय नहीं दिया, जबकि पूर्व में कानूनन् सम्भव न होने के बावजूद कई ऐसे निर्णय दिये गये जो जन हित में थे। फिर चाहे वह सी.एन.जी का मामला हो, या ड़ीजल गाडी का मामला हो, या अन्य अनेक ऐसे मामले हुये हैं, जहॉ उच्चतम् न्यायालय द्वारा कानून के स्पष्ट प्रावधान न होने के बावजूद जनता की भावना के अनुसार जनहित में निर्णय दिये गये हैं। इस प्रकार न्यायालय द्वारा कार्यपालिका के क्षेत्र में बार बार हस्तक्षेप हो रहा है, क्योकि कार्यपालिका अपने कार्य क्षेत्र में अपने दायित्वो को पूरा करने में बारम्बार असफल हो रही है। इसीलिए इस कमी की पूर्ति न्यायिक सक्रियता के मद्ेदनजर न्यायालय जन हित में दिये गये अपने निर्णयो के द्वारा करने का प्रयास कर रही है। अब समय आ गया है कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे हेतु उच्चतम संवैधानिक स्तर पर एक समिति बनाई जाय जो इस पर गंभीरता से विचार करे, ताकि भविष्य में इस तरह के निर्णय जन हित में आड़ में न आवे अन्यथा न्यायिक-सक्रियता न्यायिक आराजकता में बदल भी सकती है जिसकी कल्पना आज के शासन व न्यायिक वर्ग शायद नहीं कर पा रहे है।
अंत में लेख की समाप्ति करते करते एक संभ्रात और स्वच्छ छवि व उच्च सोच के नागरिक के समक्ष यह लेख लिख रहा था, के मुख से निकली गई बात को रेखांिकत करना आवश्यक मानता हूं, जो वास्तव में एक प्रश्न पैदा करती है ‘‘न्यायपालिका द्वारा इस तरह के आदेश जो प्राथमिक रूप से अधिनियम के दायरे के बाहर है, जनहित में होने के कारण जिन पर निर्णय वास्तव में मूल रूप से कार्यपालिका व विधायिका को लेना चाहिए था, इस कारण नहीं ले पा रहे है क्योंकि जनहित के बावजूद राजनीति का दंश उतर जाने के कारण उनके द्वारा राजनैतिक रूप से (शायद सम्भावित जन आक्रोश के कारण) निर्णय लेना संभव नहीं हो पा रहा था तो ‘‘क्या कहीं कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच इस हेतु कोई अलिखित गुप्त संधि तो नहीं है?’’
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)
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‘‘असहिष्णुता‘‘> - <‘‘सहिष्णुता‘‘, आमिर खान + मीडिया’’

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 राजीव खण्डेलवाल: 
आज जिस तरह पूरे देश में चारो तरफ सहिष्णुता व असहिष्णुता पर बहस चल रही है, उसकी ‘‘गर्म हवा’’ देश की संसद के दोनो सदन तक वृहस्त चर्चा के माध्यम से पहुॅच चुकी है। ऐसा लग रहा है कि देश की समस्त समस्याओं का एक मात्र कारण व इलाज ‘असहिष्णुता’ - ‘सहिष्णुता’ है। यद्य्पि बहस ‘‘असहिष्णुता’’ के नाम पर हो रही है लेकिन सहिष्णुता बताये बगैर असहिष्णुता पर बहस पूरी नहीं हो सकती है। यद्यपि असहिष्णुता पर बहस पिछले कुछ समय से खासकर बिहार चुनाव के समय से चल रही है परन्तु फिल्म उद्योग के एक बडे ‘‘आईकॉन’’ आमिर खान की अनजाने में लेकिन सोच समझकर की गई टिप्पणी जिसके द्वारा मूल रूप से उन्होने उनकी पत्नी की भावना को प्रकट किया था, पर पूरे देश में एक बवाल व भूचाल सा मच गया। आमिर द्वारा टिप्पणी बहुत सोच समझकर की गई थी यह इसलिए कह रहा हूॅ कि आमिर ने उस टिप्पणी के बाद एक एक शब्द की दुबारा पुष्टि की थी।
बवाल व भूचाल मचने के मूलतः तीन-चार कारण हो सकते है। एक तो टिप्पणी चूॅंकि आमिर खान ने की है जो देश के तीन सबसे अधिक पसंद किये जाने वाले (जो संयोग वश सभी मुस्लिम) हीरो में से एक है। सत्यमेव जयते, अतुल्य भारत जैसे कार्यक्रम को चलाये जाने के कारण वे फिल्मी आईकॉन से ज्यादा देश के आईकॉन हो गये हैं, दूसरे आमिर खान का मुस्लिम होना, तीसरा आमिर खान की पत्नी का हिन्दू होना, और चौथा बयान के समय का चुनाव। जब समाचार पत्र व इलेक्ट्रानिक मीडिया की डिबेट (बहस) के कारण देश का वातावरण सहिष्णुता व असहिष्णुता के भॅंवर में पहले से ही फंसा हुआ है, तब आम लोगो का ध्यान आमिर के बयान पर ज्यादा गया।
असहिष्णुता (या सहिष्णुता) पर चर्चा कर जो भी लोग उसका जोरदार तरीके से विरोध कर रहे है उन्हें भी इस बात की समझ ही नहीं है कि ‘‘असहिष्णुता भी कभी सार्थक हो जाती है या सहिष्णुता भी कभी घातक हो सकती है’’। वास्तव में 130 करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाला देश का प्रत्येक वयस्क नागरिक जिस दिन असहिष्णु हो जायेगा, उस दिन अखंड भारत की कल्पना पूरी हो जायेगी। लेकिन हमारा देश महान भारत सहिष्णुता के मामले में किसी भी देश से श्रेष्ठ सहिष्णु है। इसके लिए हमें किसी व्यक्ति ,संस्था या अन्य देश के प्रमाण पत्र की आवश्यकता बिलकुल नहीं हैं। चौक चौराहों एवं अखबारो सहित समस्त प्रकार के मीडिया में इस संबंध में चल रही बहस क्या यह देश की जनता की सहिष्णुता नहीं दिखाता है? या मीडिया की असहिष्णुता को नहीं दर्शाता है? यह कौन तय करेगा? क्या यह तय करने की आवश्यकता नहीं है? किसी भी बात को लेकर मीडिया जिस तरह लगातार बेवजह बे-बहस चलवाती है, क्या यह मीडिया की असहिष्णुता नहीं है? देश की यथार्थ सहिष्णुता का फायदा लेकर असहिष्णुता का पाठ वास्तव में वे लोग पढाना चाह रहे है जो लोग स्वयं इससे ग्रसित है। उनको स्वयं के सहिष्णु होने की आवश्यकता है।
यह सहिष्णुता का ही परिचायक है जहॉं 130 करोड से अधिक की जनसंख्या के बीच मात्र सैकडो, हजारो लोगो की असहिष्णुता की प्रतिक्रिया आमिर खान के उक्त पुष्टि किये गये बयान के संबंध में आई, जो वास्तव में मूलतः निंदनीय है। निंदनीय इसलिए नहीं कि आमिर खान ने जो कुछ कहा वह व्यक्तिगत रूप से सही नहीं हो सकता है। लेकिन निदंनीय इसलिए कि उसको सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर मीडिया के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व के क्षेत्र में प्लेग की महामारी के समान फैला दिया, जिससे देश की बदनामी हुई है, जो कि वास्तविकता के विपरीत कोसो दूर व परे है। देश की सीमा के कुछ भाग पर हमला करने वाले तुलनात्मक रूप से आंतकवादी संगठन कम अपराधी है जिसका सटीक जवाब देकर गौरव पूर्ण रूप से हम सुरक्षित रह सकते है। लेकिन देश की सहिष्णुता के कारण ही अनजाने में ही आमिर खान का देश पर असहिष्णुता का आक्रमण वाइरल के समान विश्व में फैल गया जिसको हमें सुधारने के लिए कड़ी मेहनत करना पड़ेगी व लम्बा समय भी लगेगा। वास्तव में आमिर खान को अपनी पत्नी से ही प्रेरणा लेना चाहिए जो सहिष्णु है वे इसलिये कि वे स्वयं की नजर में असहिष्णुता की भुक्त - भोगी होने के बावजूद उन्होंने अपने विचार को वाइरल नहीं किया, बल्कि पति को बताकर उनके साथ शेयर करने का प्रयास किया। यदि वे चाहती तो स्वयं ही मीडिया के माध्यम से बात कर सकती थी।
फिल्मी कलाकार आमिर को इस बात पर अवश्य विचार करना चाहिए कि सेक्स परदेे के अंदर ही मान्य है। उसी प्रकार उनके या उनके परिवार के आहत विचार जिसके आहत होने का कोई सीधा या परोक्ष कारण देश की सरकार से नहीं है तब उन्होंने देश के आन बान सम्मान पर किसी दूसरे व्यक्ति को प्रश्न् चिन्ह लगाने का अवसर (अनजाने में ही सही) क्यों प्रदान किया? अन्ततः आमिर की पत्नी को कब महसूस हुआ कि ‘असहिष्णुता’ के कारण उनके जीवन पर संकट आया है? पूर्व में आमिर ने स्वतः देश व मोदी के नेतृत्व की तारीफ की थी तो फिर अचानक क्या घट गया कि पत्नी किरण राव के बहाने उन्हे देश का वातावरण इतना असहिष्णु महसूस होने लगा कि वे विदेश में स्थानांतरण की बात करने लगे। ऐसी कौन सी घटना उनकी पत्नी व उनके परिवार के साथ घटित हुई जिस कारण उनमें उक्त भावना उत्पन्न हुई? क्या आमिर खान यह बताने का कष्ट करेगे की उनकी फिल्म से रूष्ट होकर जनता ने कभी उनके परिवार को घमकी दी? क्या आमिर खान यह बतलायेगे कि उनके किस पड़ोसी ने धमकी दी? क्या आमिर खान यह बतलाने का प्रयास करेंगे कि उनसे किस डॉन ने पैसे वसूली की मांग की जिस कारण उक्त भावना उत्पन्न हुई? इस संबंध में क्या उन्होने कोई प्रथम सूचना पत्र जान के खतरे के रूप में दर्ज कराई? यदि यह सब नहीं हुआ है तो ऐसेे में आमिर खान व पत्नी को बताना ही होगा कि पिछले आठ महीनों में ऐसी कौन सी घटना हुई है जिसके कारण आमिर की पत्नी किरण राव के मन में वह विचार आया व दहशत की भावना उत्पन्न हो गई जो 130 करोड़ नागरिको के दिल में उत्पन्न न हो सकी, जबकि आमिर की तुलना में आम नागरिको को वैसा सुरक्षा तंत्र तथा आईकॉन के पावर के दम पर उपलब्ध सुरक्षा शक्ति प्राप्त नहीं थी जिस कारण आम नागरिको को तो आमिर खान से ज्यादा डरना चाहिए था।
जब हम देखते है कि आम लोगो के सामने किसी व्यक्ति को मारा जाता है गोलियों से भूना जाता है, महिलाओं के साथ अश्लीलता की जाती है तथा सभी मूक दर्शक बने रहते है तब हमारी सहिष्णुता सहनशीलता ,क्या प्रशन्सनीय होती है? तब वक्त की मांग असहिष्णु होने की होती है। इसलिए आलोचक, समालोचक, लेखक, विचारक, बुद्धिजीवी, और डिबेट करने-कराने वाले देश को सहिष्णु व असहिष्णु अलग अलग खानो में या मत में न बंाटे, बल्कि नागरिको को सिर्फ इस बात की प्रेरणा दे कि वक्त पर वक्त की मांग के अनुसार सही रूप से सहिष्णु - असहिष्णु रहे, तभी हमारा उद्धार होगा। देश का उद्धार होगा।
अन्त में आमिर को देशद्रोही कहना ज्यादती होगा लेकिन उनके द्वारा की गई हरकतों से देश को जो नुकसान हुआ है व देश की छवि का जो ह्रास हुआ है वह किसी देशद्रोही द्वारा की गई कार्यवाही से कम नहीं है।    
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)
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‘‘बिहार चुनाव से निकले संकेत’’ ‘‘कई मानो में अभूतपूर्व व महत्वपूर्ण ’’

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राजीव खण्डेलवाल:

1).     चुनावी पूर्व सर्वेक्षण और एक्जिट पोल पहले की तरह बुरी तरह से फ्लाप और लगभग विपरीत रहे। लेकिन इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया में चुनावी विश्लेषण के दौरान बढत व घटत बताते समय पहली बार यह घटित हुआ कि प्रथम डेढ घंटे में जिस तरह से एनडीए को दो तिहाई बहुमत की ओर बढ़ना बताया गया और तदनुसार उसका औचित्य व कारणों की समीक्षा भी की जाने लगी। लेकिन शाम होते होते सम्पूर्ण परिणाम आने तक परिस्थितियॉं एकदम बदलकर परिणाम विपरीत हो गये। इस कारण सुबह के प्रारंभिक तर्को को बेमानी ठहराकर उन्हीं व्यक्तियों द्वारा अब विपरीत तर्क दिए जाने तथा परिणाम को ठीक बताने के प्रयास किये गये। शायद इसीलिए कहा गया है कि ‘‘जो जीते वही सिकंदर ...........’’ 
2).     ‘‘भाजपा की धरोहर अटल, आडवाणी एवं मुरली मनोहर के नेतृत्व ने जहांॅ पार्टी को 2 से 120 तक पहंॅुचाया और नरेन्द्र मोदी को प्रारंभिक दिनों की राजनीति में मजबूती प्रदान की। परन्तु प्रधानमंत्री पद पर मोदी के सत्ताशीन होने के बाद जिस तरह से इन तीनो नेताओं को (अटल जी की अस्वस्थ्यता के कारण) साइडलाईन किया उसी का फल आडवाणी जी के जन्म दिवस के अवसर पर उक्त चुनाव परिणाम के रूप में मिला’’ ..............ऐसा कुछ व्यंगकारो ने कथन किया है?
3).     लालू प्रसाद यादव एक घोषित सजायाफ्ता अपराधी है एवं अन्य कई भ्रष्टाचार के प्रकरणों में अभियोगी भी है। उनके एक ईमानदार, स्वस्थ्य छवि, व विकास पुरूष कहलाने वाले नीतीश कुमार के साथ मिलने के जो परिणाम आये हैं वे इस तथ्य को पुनः रेखांकित करते है कि यदि सही व्यक्ति गलत व्यक्ति का साथ लेगा तो उसका नुकसान होगा और गलत व्यक्ति द्वारा सही व्यक्ति का सहारा लेने पर फायदा होगा। साथ ही परस्पर लड़ने के बजाय यदि एकत्रित होकर चुनाव लडा जाय तो उसमें विजयी होने की सम्भावना ज्यादा रहेगी। जैसा कि पिछले चुनाव की अपेक्षा 8.31 प्रतिशत ज्यादा वोट मिलने के बावजूद दो विपरीत ध्रुवों वाले ‘‘महागठबंधन’’ के सामने ‘‘भाजपा’’ को हार का सामना करना पडा। 
4).      यह चुनाव दो तरह के विपरीत संकेत एक साथ इंगित करता है जो चुनाव प्रणाली की कमी को दर्षाता है। जहॉ स्पष्टतः सीटों की संख्या की दृष्टि से भाजपा की भारी हार परिलक्षित होती है वहीं पर वोटो की संख्या की दृष्टि से भाजपा की भारी जीत प्रतीत होती है। वह इस अर्थ में कि भाजपा ने सत्ता से बाहर रहने के बावजूद पिछले चुनाव की अपेक्षा इस चुनाव में 8.31 प्रतिषत अधिक वोट प्राप्त किये जो भाजपा के पक्ष में परिर्वतन के वोट कहे जा सकते है। 
5).     यह चुनाव इस बात को भी इंगित करता है कि यदि आपको अपनी जीत सुनिष्चित करना है व उसमें निरंतरता बनाये रखना है, तो आपकी जीत का आधार आप की स्वयं की मजबूत नींव ही हो सकती है। दूसरे की कमजोर पिच को अपनी जीत का आधार मानने से विरोधी की कमजोर पिच के सुधर जाने की स्थिति में आप विजय से दूर होते जायेगे क्योकि आप की स्वयं की पिच मजबूत नहीं है।  
6).      भाजपा के मार्गदर्षक मंडल ने चुनाव परिणाम पर जो साझा बयान जारी किया वह भी इस चुनाव के तथ्यों से मेल नहीं खाता है क्योकि भाजपा हारी नहीं है, बल्कि सीटों के आंकडों की लड़ाई में विपक्ष अवष्य जीत गया हैं। भाजपा में किसी एक व्यक्ति के जिम्मेदारी स्वीकार करने की परंपरा भी नहीं रही है। जनसंघ से लेकर भाजपा तक व अन्य समस्त पार्टियां (सिवाय कम्यूनिष्टों के) में यह प्रथा कभी नहीं रही। अभी तक भारतीय राजनीति का यह मान्य स्वीकृत सिद्धान्त रहा है कि जीत का श्रेय मुखिया को एवं हार पर अपयष का भार सामूहिक नेतृत्व को दिया जाता है। दूसरी बात ‘‘जंॉच कमेटी में वे लोग नहीं होने चाहिए जो नीतिकार व भागीदार रहे’’ यह भी गलत है। क्योकि एक बहुत अच्छा क्रिकेट खिलाडी भी जो बहुत समय तक खेल से दूर रहा हा उसे यदि एकाएक अम्पायर बना दिया जाये तो वह भी एक अच्छा अम्पायर साबित नहीं हो पाता है। बिहार में यदि पार्टी की हार व तथ्यों सही का पता लगाना है तो उन लोगो को भी शामिल किया जाना आवष्यक है जो नीतिकार व भागीदार थे तभी इस पर सम्पूर्ण सार्थक चर्चा हो सकेगी। कोैन सी नीति सही थी कौन सी नीति गलत थी, व निर्धारित नीतियो का कितना पालन किया जा सका इन सब तथ्यों का विष्लेषण चुनावों में शामिल लोगों के साथ मिलकर ही किया जा सकता है। 
7).     किसी भी भारतीय फिल्म की सफलता केवल हीरो पर निर्भर नहीं होती वरण उसमें विलेन का होना भी आवश्यक होता है। ठीक इसी प्रकार महागठबंधन में नीतीश हीरो के साथ लालू जैसा सशक्त विलेन भी था। जबकि भाजपा में केवल मोदी जी ही हीरो थे जिनका भाजपा ने इस प्रकार दुरूपयोग किया कि अन्जाने में वे हीरो न रहकर विलेन के रूप में प्रस्तुत करा दिये गए। चंूॅंकि (अ) उन्हे नीतीश से नहीं लालू से ज्यादा (ताष के खेल में हुकुम के इक्के का सामान्य दुर्री की काट के लिए दुरूपयोग तुल्य) मुखातिब होना पडा तथा (ब़) भाजपा ने अपना हीरो (होने वाला मुख्यमंत्री) घोषित ही नहीं किया था। 
8).     स्वाधीन भारत के इतिहास में पहली बार शायद देश के प्रधानमंत्री ने केवल एक राज्य में 30 से अधिक चुनावी सभाएंॅ की हैं।
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)
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सर संघचालक मोहन भागवत जी को शत्-शत् नमन्

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राजीव खण्डेलवाल:
Photo: www.india.com
                    राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पिछले समस्त सर संघचालको से अलग अपनी विशिष्ट भूमिका वहन करने वाले सर संघचालक माननीय मोहनराव जी भागवत का पांचजन्य/आर्गनाइजर को विगत समय दिए गए विशेष साक्षात्कार ने देश में एक नया भूचाल पैदा कर दिया है। ऐसे साक्षात्कार की उम्मीद सिर्फ दृढ़, साहसी, और निरतंर राष्ट्र के लिये सोचने वाले व्यक्ति से ही की जा सकती हैं। इस पर जिस तरह की प्रक्रिया देश के विभिन्न अचंलो से आ रही है वह वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुये स्वाभाविक ही हैं। आरक्षण के जमे हुये बर्फ को पिघलाने के लिये व आरक्षण के संबंध में वर्तमान संवैधानिक, राजनैतिक, व सामाजिक स्थिति कोे तोडनें के लिए ऐसे साहस पूर्ण विचारो के आघात की प्रबल आवश्यकता थी, जो माननीय भागवत जी ने ‘‘आरक्षण’’ पर अपने बेबाक विचार व्यक्त कर परिपूर्ति कर दी।
 जब देश में संविधान सभा में डॉ भीमराव आम्बेडकर के द्वारा ‘‘आरक्षण’’ का प्रस्ताव लाया गया था तब उनका यह स्पष्ट मत था कि देश के कुचलित, अविकसित अत्यधिक पिछडे, कमजोर,  अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्गांे के उत्थान के लिए एक ऐसी आरक्षंण व्यवस्था किया जाना अत्यन्त आवश्यक है जो अन्य सुदृढ़, मजबूत, विकसित एवं विकासशील  वर्गों के मुकाबले ठहर सकने योग्य उनके  आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिये अस्थायी व्यवस्था बन सके।  इस प्रकार प्रारंभ में ही संविधान में आरक्षण की यह अस्थायी व्यवस्था किये जाने के साथ ही, निर्धारित समयावधि में अपेक्षित उद्वेश्य की पूर्ति न हो पाने की दशा में, दस - दस वर्षो के लिए आरक्षण बढाये जाने का प्रावधान किया गया था। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आरक्षण की समयावधि की समीक्षा का प्रावधान आरक्षण को संविधान में प्रावधित करते समय ही कर दिया गया था। भागवत जी ने उक्त विशेष साक्षात्कार में कहीं यह नहीं कहा कि आरक्षण समाप्त होना चाहिए। उन्होनें सिर्फ इतना ही कहा कि जिस उद्धेश्य के लिए पिछले 65 साल से आरक्षण की नीति लागू की गई है उसका कितना प्रभाव, कितना, यर्थाथ फायदा उन (कुचले) वर्गो को मिल सका है, उसकी समीक्षा की जानी चाहिए।
 इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है खासकर मंडल आयोग कि सिफारिश लागू होने के बाद जो आरक्षण की नीति अपनाई गई व लागू की है उसके तहत सिर्फ और सिर्फ वोटो की राजनीति के लिए ही आरक्षण की व्यवस्था को समय - समय पर बढाया गया। इसके परिणाम स्वरूप कालान्तर में  एक दिन ऐसा आ जाता जब आरक्षित वर्ग , अनारक्षित वर्ग से अधिक हो जाता। भला हो माननीय उच्चतम् न्यायालय का जिसने आरक्षण की सीमा को अधिकतम 50 प्रतिशत पर सीमित कर दिया। राजस्थान में जाटो को आरक्षण देकर कुल आरक्षण लगभग 68 प्रतिशत (उच्चतम् न्यायालय द्वारा घोषित सीमा से अधिक) कर दिया गया जो न केवल गैर संवैधानिक है वरण राजनीति के दिवालियापन का बेशरम उदाहरण भी  है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि वोटो के लिए आरक्षण की ऐसी राजनीति के चलते कालान्तर में आरक्षण की सीमा 70 से 80 प्रतिशत हो जाती तथा एक दिन ऐसा आता जब गैर आरक्षित वर्गों के लिए कुछ भी नहीं बचता ,और तब आरक्षण की मूलभूत भावना की हत्या ही हो जाती। इसलिए यदि सर संघचालक जी ने आज की राजनीति से प्रभावित हुये बिना देश में आरक्षण की समीक्षा पर बल दिया है तो यह पैमाना उन सब राष्ट्रवादी नागरिको के लिए है जो राष्ट्रवादी देश भक्त होते हुये भी तथाकथित वोटो के प्रलोभन के लिए जाने अनजाने में आरक्षण की उस नीति का समर्थन कर रहे है, जिससे देश और समाज अंततः विघटन की ओर  चला जायेगा। आज उन शूर ,वीर, साहसी नेताओं की आवश्यकता है जो जनता के बीच आगे आकर आरक्षण को समाप्त या बढाने जाने के विपरीत उसकी वर्तमान में कितनी प्रासंगिकता है, किस सीमा तक है, कब तक है, यदि इस दृष्टि सेे विचार करंेगे तो निश्चत रूप से देश को मजबूत बनाये रखने में महत्वपर्ण योगदान देगें। देश के एक राज्य गुजरात में पटेलो द्वारा आरक्षण की मांग पर पटेलो के नेता हार्दिक पटेल का यह रूख कि हमें भी आरक्षण दो या समाप्त करो। इसका मतलब साफ है कि  आरक्षण का दायरा इतना विशाल और जातिगत होता जा रहा है तथा जिस मूल आर्थिक कारणों के कारण समूह विशेष को दुर्बल व कमजोर व अविकसित पाकर आरक्षण प्रदान किया गया है उसी कारण से अब सामान्य जाति का व्यक्ति भी आरक्षण की मांग कर रहा है। 
 आरक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू क्रिमीलेयर भी  जिस पर भी विचार किया जाना आवश्यक है आरक्षण के कारण आरक्षित जातियों के उन सक्षम वर्गो द्वारा आरक्षण का फायदा उठाया गया है जिसे क्रिमीलीयर कहते है। उन सक्षम वर्गो को आरक्षण का फायदा अब आगे क्यो मिलना चाहिए, इस पर समस्त बुद्धिजीवी का भी मुह बंद है। इतिहास में यह अवसर बार बार नहीं आता। आरक्षण के लाभ  से दरकिनार किये गये शेष बचे वर्गाे को  यदि आरक्षण का फायदा दिया जायेगा तो आरक्षित            असमानता की जो दूरी बढ रही है वह कम होती जायेगी। अतः यह आवश्यक है कि आरक्षण पर देश में गंभीर विचार हो तथा उसे एक निश्चित दिशा तक ले जाने  का प्रयास हो  ताकि व्यक्ति का स्वयं का भला हो, और समाज का भला हो।  
मेरे विचार में देश के दबे, कुचले,कमजोर एवं अक्षम वर्गों के लिए आरक्षण का औचित्य तो सदैव था, है और रहेगां चॅूकि प्रत्येक जाति में सक्षम एवं अक्षम आरक्षित वर्ग सदैव रहते आये है तथा रहेगे भी। जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था से जाति का अक्षम वर्ग तो पहुॅच बनाने में सफल नहीं हो पाता और वह कमजोर ही बना रह जाता है। परन्तु आरक्षण का आधार लेकर आरक्षित जातियों के सक्षम अयोग्य वर्ग (क्रिमीलेयर) भी हर सम्भव लाभ प्राप्त करते रहते है। दूसरी ओर अनारक्षित जातियों के कमजोर एवं अक्षम वर्गो के सर्वथा योग्य व्यक्ति अपना औचित्य पूर्ण हिस्सा प्राप्त करने से वंचित हो जाते है। अतः समाज एवं न्याय के हित में आरक्षण की व्यवस्था का आधार जाति न होकर केवल और केवल व्यक्ति का पिछडा पन यानी आर्थिक आधार पर अक्षमता होना चाहिए जिसके तहत देश में सम्पूर्ण समाज को समग्रता में लाभ मिल सके तथा जाति के नाम पर आरक्षण के तहत क्रीमीलेयर के जो अयोग्य व्यक्ति अभी अनुचित लाभ प्राप्त करते जा रहे हैं उन पर लगाम लग सके। यानी समग्रता में बराबरी से सबको औचित्यानुसार एवं न्यायपूर्ण लाभ के अवसर प्राप्त हों तथा सबका बराबर विकास हो सके।

      अतः मेरा पुनः मोहन भागवत जी को विकट विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यह मुद्वा उठा  कर अपने अत्यंत संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित विचार व्यक्त कर समाज का यथोचित संदेश देने के लिये साधूवाद एवं नमन्। 

(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)
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नावेद का जिंदा पकड़ना सफलता? या भारतीय राजनीति की पैतरेबाजी को देखते हुये अपशकुन!

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Rajeeva Khandelwal, Betul:
पंजाब के गुरूदासपुर में हाल में हुई आंतकवादी घटना में पंजाब पुलिस, अर्ध सैनिक बल, व भारतीय सेना ने दीनानगर थाने पर हुये आतंकवादी हमले को सफलतापूर्वक विफल कर दिया। न केवल एक आतंकवादी को मार डाला गया बल्कि दूसरे आतंकवादी नावेद को जिंदा पकडने में भी सफलता प्राप्त की। यद्यपि इसमें एस पी (खुफिया) बलजीत सिंह ,भारतीय पुलिसकर्मी व तीन नागरिक सहित सात लोग भी शहीद हुये। सैनिक-अर्ध सैनिक क्षेत्रो से लेकर सार्वजनिक जीवन के कुछ क्षेत्रो में एक आतंकवादी को जिंदा पकडने पर खुशी भी जाहिर की गई। यह माना गया कि ‘‘आंतकवादी घटनाओं में पाकिस्तान के हाथ लगातार सने हुये है’’ यह सिद्ध करने के सबूतों की कड़ी में नावेद एक महत्वपूर्ण साक्ष्य सिद्ध होगी, यहॉं तक तो बात ठीक लगती है।
                यदि सिक्के को पलटकर देखे और तदनुसार भारतीय राजनीति के दूसरे पहलू को देखा जाएॅ तो बहुत से नागरिकों के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से कौंधता है कि क्या आंतकवादी नावेद का जीवित रहना भारतीय लोकतंात्रिक राजनैतिक परिवेश व वर्तमान परिस्थतियो के प्रसंग में उचित है? उसे भी हमले में क्यो नहीं मार डाला गया? देश हित में यह प्रश्न उठना जायज भी है। 22 साल पहले मुंबई में हुये सीरियल बम ब्लास्ट वाले मामले में अभी हाल ही में मात्र एक अपराधी याकूब मेमन को ही फंासी पर लटकाया जा सका व शेष अभियुक्तो की फांसी की सजा को बदल दिया गया। इसके बावजूद भी इस देश के लोकतंत्र के प्रहरी माने जाने वाले देश प्रेमी बुद्धिजीवी वर्ग से लेकर कुछ राजनैतिक पार्टियांे के नेताओं व सार्वजनिक जीवन के सम्माननीय गणमान्य नागरिक गण तथा कला व अन्य क्षेत्रों के कुछ ‘‘कोहिनूरों’’ ने उसकी फंासी केा मानवता व धर्म जाति के आधार जैसे विभिन्न कारणों पर उसे क्षमा प्रदान कर सजा बदलने की अपील उच्चतम् न्यायालय से लेकर राज्यपाल व राष्ट्रपति तक से की थी। उक्त प्रकरण में स्वाधीन भारत के इतिहास में पहली बार फंासी दिये जाने के दो धंटे पूर्व तक देश की सबसे बडी अदालत देश की न्याय प्रक्रिया को अपना कर ‘न्याय’ देने के लिए विशेष रूप से बैठी। अंततः पूर्व में दिये गये निर्णय की ही पुष्टी की गई। इस पर कुछ लोगो ने लोकतंत्र की विचार व बोलने की आजादी की उदारता का अनुचित रूप से फायदा लेते हुये उस ‘न्याय’ को ‘अन्याय’ ठहराने की बेगैरत जुर्रत की।
                लोकतंत्र बनने के बाद से लगातार पिछले 68 वर्षो में देश में कानून की स्थिति भी ऐसी बनावटी बनाकर रख दी हैै और हर क्षेत्र एवं स्तर पर भ्रष्टाचार इस कदर व्याप गया है जिसमें (1) न्याय मिलने में अत्यधिक समय लगता है। (2)पहॅुच /पैसे/दंबगई /आतंकवाद वाले आरोपी पर अपराध साबित करना दिन में तारे गिनने जैसा होता है। (3). अपराधी साबित हो जाने के बाद भी (क) विभिन्न न्यायलय/राज्यपाल/राष्ट्रपति आदि के पास पुनः पुनः प्रकरण चलता रहता है (ख) जेल में रहकर भी पसन्द का खाना, पीना ,पहनना तथा वहीं से अपनी पसन्दगी का व्यापार /धन्धा/राजनीति व षड़यंत्र चलाये जा सकते हैं। ऐसे में नावेद जैसे आरोपियो पर अपराध सिद्ध करने तक देश के न्याय तंत्र का समय एवं धन खर्च करना क्या व्यर्थ नहीं होगा? 
अन्तर्मन को यह बात कचोटती है कि ‘‘ऐसी राजनीति के चलते करोडो रूपये आतंकवादी के खाने, पीने व सुरक्षा आदि पर खर्च कर सरकार ,न्यायपालिका, और पूरे न्यायिक तंत्र का महत्वपूर्ण समय लगा कर पूर्ण न्यायिक प्रक्रिया अपना कर ,जब आतंकवादी (नावेद) को फंासी का दण्ड़ सुनाया जायेगा तब फिर पुनः देश के ही तथाकथित बुद्धिजीवी नागरिक मानवता के नाम पर आगे आकर राष्ट्रपति से लेकर उच्चतम् न्यायालय तक से वैसे ही क्षमा माफी की याचना नहीं करेगे जैसा कि मेमन के मामले में उनके द्वारा असफल प्रयास किया गया था, इस बात की क्या कोई ग्यारंटी दे सकता है? लेकिन इन दयावान बुद्विजीवी वीर व्यक्तियो के मन में कमी यह भाव नहीं आया कि वे आतंकवादी तथा अपने देश के विरोधी निर्णीत घोषित अपराधी से भी ‘‘शहीद हुये सैनिको’’ की जिंदगी भी वापस दिलाने के लिए भी अपील करते। कुत्ते की पूॅछ को कितना ही सीधा करने का प्रयास किया जाय वह जस की तस बनी रहती है, कभी भी सीधी नहीं होती है। उसी के समान वर्तमान में भारतीय राजनीति की भी वही गति है। इस लिए युद्ध लडने वाले सैनिको को आगे से सदैव इस बात का कूटनीतिक ध्यान रखना होगा कि किसी भी आतंकवादी घटना में आतंकवादी को मार डालने के बजाय उससे गुप्त जानकारी प्राप्त करने की उम्मीद में यदि वे उसे जिंदा पकडते है तो वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिवेश में निराकरण तक होने वाला न्याय हम भारतीयों के सीने में अपेक्षाकृत ज्यादा कष्ट दायक होगा। खासकर नौजवानो के दिल में , क्योकि बाद में वही कहानी दुहराई जा सकती है। कुछ लोग मेरे विचारो से मत भिन्नता अवश्य रखते होगे ,लेकिन उन सब विचारो का समर्थन करने के बावजूद भारतीय राजनीति की वर्तमान स्थिति को देखते हुए मैं अपने विचारो पर अड़िग हूॅ। 
                ‘‘भले ही सौ अपराधी बच निकलंे परन्तु एक भी निरपराध को सजा न हो’’ ऐसी कानूनी व्याख्या के कारण अपराधी का दोष सिद्ध करना वैसे ही मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में बमुश्किल फंासी की सजा प्राप्त व्यक्ति उपरोक्त परिस्थितियों का लाभ लेकर फंासी की सजा को बदलवा लेगा यह उचित आशंका ही इस लेख की उत्पत्ति का कारक है।
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)
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‘‘व्यापमं’’कांड कितना व्यापक!

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(सी.बी.आई की जॉच का निर्णय प्रदेश शासन के अधिकार क्षेत्र में?) 
                                                                         
             पिछले दिनो ''आज तक'' न्यूज चेनल के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह की मौत व जबलपुर के मेडीकल कॅालेज के डीन डॉ अरूण शर्मा की मौत के बाद व्यापमं प्रकरण अखिल भारतीय मुद्दा बनते जा रहा है। वर्ष 2007 में प्रथम बार व्यापमं के घोटाले की जानकारी सामने आयी। यद्यपि यह कहा गया है कि वर्ष 2004 के बाद से ही यह घोटाला चला आ रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति से अभी तक देश के इतिहास के पन्नो में हजारो घोटाले कांड दर्ज हुए जिनमें लाखो करोडो रूपये का लेन देन हो चुका जिसमें कुछ कांडो में जनहानि भी हुई है। लेकिन व्यापमं घोटाला इस मामले में अपनी तरह का ऐसा अलग मामला है जो न केवल मध्य प्रदेश व भारत में बल्कि विदेश में भी अभी तक ऐसा भीषण कांड नहीं हुआ है। इसमें हजारो करोडां़े रूपये से लेकर 47 से अधिक संदेहास्पाद मृत्यु हो चुकी हैं। मध्य प्रदेश का व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) प्रदेश के अंदर विभिन्न प्रवेश परीक्षा के आयोजन के साथ साथ विभिन्न पदो पर नौकरियों की भर्ती के लिए भी परीक्षा आयोजित करते चला आ रहा है। जिस तरह से व्यापमं कांड की परतंे दिन प्रतिदिन ख्ुालते जा रही है और अभी तक भी जितनी जॉच हुई हैं (जबकि अभी तक मात्र 20 प्रतिशत से कम जॉच हो पाई है ) उनसे व्यापमं की सभी परीक्षाओ पर प्रश्न चिन्ह लगे हैं। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि व्यापमं के इतने व्यापक कांड में अभी तक दो हजार से अधिक आरोपियो के विरूद्ध चालान प्रस्तुत किए जा चुके है तथा अन्य 500 से अधिक के विरूद्ध जॉच विचाराधीन हैं। बहुत से आरोपी फरार हैं। यदि जंॉच का दायरा बढाया गया तो इस दृष्टि से यह देश का सबसे अनोखा और अकेला कांड है जो पैसो की दृष्टि से नहीं बल्कि आरापियो की संख्या की दृष्टि से भी सबसे बडा कांड कहा जा सकता है। 
दूसरे इस कांड में देश के इतिहास में पहली बार राज्य के पदासीन गवर्नर पर एफ आई आर तक दर्ज हो चुकी है। इस कारण भी यह अनोखा कांड बन गया है जिसमें प्रथम सूचना पत्र दर्ज होने के बावजूद भी महामहिम राज्यपाल को इस्तीफा नहीं देना पड़ा और न ही उन्होनें जरूरत समझी। यू पी ए सरकार द्वारा नियुक्त पूर्व  गवर्नर से न तो भाजपा नेताओं ने इस्तीफा लेने की जरूरत समझी, न ही मांग की, और न ही केन्द्र की भाजपा सरकार ने उन्हे पद से हटाया। वह भी इस तथ्य के बावजूद कि राजनैतिक रूप से अन्य कांग्रेसी गर्वनरों को पद से हटने के लिये या तो उन्हे मजबूर किया या उन्हे स्थानांतरित कर हटाया गया। तीसरे इस कांड का महत्वपूर्ण व दर्दनाक पहलू यह है कि वे दो हजार परीक्षार्थी जो व्यापमं की परीक्षा में बैठे थे वे अबोध (इनोसेन्स) अपराधी है जिन्हें आदतन अपराधी के समान जेल में बंद किया गया तथा अधिकांश मामले में उच्च न्यायालय द्वारा जमानत नहीं दी जा रही है। इसके विपरीत व्यापमं को आधार बनाकर बदले में आर्थिक लाभ पाने के उद्ेदश्य से जो लोग काम कर रहे हैं, वे व्यापमं के संक्षम अधिकारी हैं तथा उनको संरक्षण और बढावा देने वाले उनसे फायदा लेने वाले अन्य कई सरकारी आई ए एस अफसर ,उनके बडे अधिकरी एवं प्रदेश के मंत्री, व नेताओं के नाम आने के बावजूद ,उन सब पर वैसी आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा रही है। (मात्र कुछ को छोड़कर) अपना जीवन प्रारंभ करने वाले विद्यार्थीगण जो अपने भविष्य को सुनहरा बनाने के लिए शार्ट कट रास्ता अपनाने की मनसा के कारण उक्त कांड के भागीदार आरोपी बन गये है। इस कांड में सबसे बडा खेल जॉच एजेंसिया कर रही है जो दलालो के फोन रिकार्ड कर उन सब विद्याथियों से भी धन वसूली कर रही है जो न तो परीक्षा में बैठे है और न जिन्होने कोई लाभ ही प्राप्त किया।
        अब तक की घटना से यह बात सिद्ध होती है कि उक्त कांड में जो प्रभावशाली व्यक्तिगण हैं ,चाहे वे अफसर या राजनेता हो या न्याय क्षेत्र से जुडे व्यक्ति हो जिन पर भी उगलियॉं उठी है उनकी जॉच म.प्र.शासन द्वारा गठित एस टी एफ या एस आई टी से किया जाना मुनासिब व सफलता पूर्वक संभव नहीं है। यद्यपि उक्त जॉच की निगरानी उच्च न्यायालय द्वारा की जा रही है। वास्तव में यह इतना बडा कांड है जिसकी जॉच सी बी आई से भी हो पायेगी यह भी संदेहास्पद है। मुख्यमंत्री का यह कथन कि यदि माननीय उच्च न्यायालय म.प्र.शासन के विरूद्ध कोई भी जॉच सी बी आई से कराना चाहते है तो वे तैयार है। इसके लिये वे यदि उच्च न्यायालय से कहेंगे तो वह भी उच्च न्यायालय की अवमानना के समान होगा। उनका यह कथन बिलकुल गलत है। इसके लिए उच्च न्यायालय के आदेश की आवश्यकता या अनुमति बिलकुल जरूरी नहीं है। जॉच का अधिकार प्रदेश शासन को है तदनुसार मुख्यमंत्री स्वयं यह जॉच करा सकते है। इसके पूर्व कितनी सी बी आई जॉच के लिए उच्च न्यायालय से अनुमति ली गई? अभी तक हाई कोर्ट ने सी बी आई जॉच के मध्यप्रदेश शासन के अधिकार पर किसी प्रकार की रोक अपने पूर्व आदेशो में जिसमें अन्य आवेदको के सी बी आई की जॉच की मांग को निरस्त करते समय नहीं लगाई है। वास्तव में इसकी तभी सही जॉच हो पायेगी जब उच्चतम् न्यायालय के न्यायधीश के नेतृत्व में एक न्यायिक आयोग का गठन किया जाकर जॉच करेगी तभी इस व्यापमं गेट कांड की गठाने खुल पायेगी। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि इस केस में मीडिया द्वारा अभी तक अपेक्षित तवज्जों नहीं दी गई। जब उनके एक साथी की असामयिक मृत्यु हुई तभी मीडिया कार्यशील हुआ। अक्षय सिंह की मृत्यु के पूर्व 44 मौते होने के बावजूद भी मीडिया ने अपेक्षित संज्ञान नहीं लिया। क्या मीडिया अपनी इस गैर जिम्मेदारी सेे इंकार कर सकता है?









          

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