‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
Powered by Blogger.
 
Showing posts with label अनूप दुबोलिया. Show all posts
Showing posts with label अनूप दुबोलिया. Show all posts

आपराधिक षड़यंत्र से मुक्ति दिलाने की तैयारी

2 comments
सफेदपोशों का कालाधन क्या उजागर हो पाएगा?

देश को भ्रश्टाचार की दीमकों के हवाले करने वाले सफेदपाशों के कालेधन को लेकर अरसे से बहस चल रही है। गाहे-बगाहे कोई न कोई बडा नेता कालेधन के मसले पर बयान देकर अपने आप को दूध का धुला साबित करने में जुटा रहता है। अदृश्य भ्रष्टाचार के रूप में हर साल करीब 11.5 लाख करोड़ रूपये कालेधन के रूप में इकटठा होता है। विदेशी बैंको में ये कालाधन जमा किया जाता है। स्विस बैंक में अब तक करीब 70 लाख करोड़ रूपये कालेधन के रूप में जमा किए जा चुके है। एक अंतरर्राष्ट्रीय एजेंसी के सर्वे के इन आंकड़ो पर यकीन किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि जितना कालाधन एक साल में सफेदपोश जमा करते हैं वो हमारे देश के सालाना बजट से भी दो गुना होता है। साफ जाहिर है देश को बर्बादी के कगार पर ले जाने का षड़यंत्र चल रहा है तो दूसरी तरफ इस आपराधिक षड़यंत्र का ताना-बाना बुनने वालों को इससे निजात दिलाने की तैयारी भी चल रही है। दरअसल भ्रष्टाचार के नित नए स्केंडलों से जूझ रही केन्द्र सरकार एक ऐसा ही विधेयक लाने जा रही है। सरकार की मंशा चाहे जो भी हो, लेकिन यह साफ दीख रहा है कि ‘‘ब्लैक मनी’’ पर कुंडली मारे बैठे ‘‘व्हाईट कालर्स’’ मन ही मन खुश हैं। इस विधेयक का मजमूं कुद हद तक यही है कि सरकार इसमें ऐसे प्रावधान करेंगी कि सारा कालाधन निकल आए और उसकी चांदी हो जाए। जो अपना जितना कालाधन जाहिर करेगा, सरकार उसका करीब 30 फीसदी हिस्सा बतौर दंड रखकर उस काले दलाल को एक तरह से बरी कर देगी।
.
कालेधन की एक बदरंग तस्वीर यह है इसका दूसरा घिनौना पहलू हाल ही में मुल्क के कमजोर मुखिया डॉ. मनमोहन सिंह की जुबानी उजागर हुआ है। अब तक के सबसे लाचार और बेबस प्रधानमंत्री कहे और माने जाने वाले डॉ. मनमोहन सिंह ने यह कहने में जरा भी गुरेज नहीं किया कि कुछ संधिया कालेधन को जोड़ने वालो के नाम उजागर करने में आड़े आ रही है। यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस लोकतांत्रिक देश में क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वे काले चोर कौन है जिन्होने देश की जनता की गाढ़ी कमाई विदेशी बैंको में सहेजकर रखी है। प्रधानमंत्री ने सीना तानकर यह कह दिया कि कालाधन जमा करने वाले लेागो का नाम सार्वजनिक करने में कुछ संधिया आड़े आ रही है। प्रधानमंत्री को किसी को नहीं तो कम से कम देश की जनता को यह बताना चाहिए कि वे कौनसी संधिया है जिन्हे छिपाया जा रहा है। सूचना के अधिकार के कानून को अमलीजामा पहनाने वाले प्रधानमंत्री खुद इस बात को कहे तो बड़ा आश्यर्च होता है। देश की जनता का यह मौलिक अधिकार बनता है कि वह यह जाने कि वे कौन लोग है जिनहोने देश की अकूत सम्पदा को कालेधन के रूप में छुपा कर रखा है। प्रधानमंत्री की इस गुस्ताखी को दबी जुबान में यूपीए के तमाम नेताओं और मंत्रियों ने चुप रहकर एक तरह से अपनी मंजूरी दे दी है। तभी तो अब तक इस मसले पर किसी ने कुछ भी नहीं कहा। इस मामले में सिर्फ सत्ता पक्ष ही नहीं बल्कि विपक्ष भी उतना ही कसूरवार है। पिछले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट किये गये भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवानी सहित कई बड़े नेताओं ने काले धन को और इन काले दलालो के नाम उजागर करने को लेकर बड़े-बड़े बयान दिये थे। देश के सालाना बजट से दोगुने कालेधन के मसले को लेकर ये क्यों चुप है। यह भी जनता को जानने का अधिकार है। देश में बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार को बढ़ाने में इन काले दलालो की काली भूमिका भी कम नहीं है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की दुहाई देने वाले नीति निर्धारकों को यह भी समझ लेना चाहिए कि देश की माली हालत बदतर करने में इन काले दलालो से ज्यादा वे खुद दोषी है तभी तो उन्होने 63 साल तक इस ओर संजीदगी से कोई कार्यवाही नहीं की।
Read more...

नीतीश कुमार को चंद्रबाबू मत बनाओं

0 comments
बिहार को खुद अपना माडल विकसित करना होगा
अनूप दुबोलिया
अप्रत्याशित चुनावी नतीजों के बाद बिहार की सत्ता पर फिरसे काबिज हुई नीतीश कुमार सरकार के सामने अब ज्यादा चुनौतियां है। चुनावी नतीजों के बाद विश्लेषकों और राजनैतिक पंडितो ने नीतीश द्वारा बदली गई बिहार की तस्वीर को अपने चश्में से देखना शुरू कर दिया है। विकास के पैरोकार विकास की वास्तविक अवधारणा को नकारते हुए एक नया राग आलापना शुरू कर रहे है। इनमें से ज्यादातर बिहार के विकास को लेकर कारपोरेट इंडिया के दखल की जोरदार वकालत भी कर रहे है। हमें यहां यह समझना होगा कि बिहार में सबसे बड़ी पूंजी मानव संशाधन की है। वहां रोजगार की और खनिज की बेहद कमीं है। बिहार का ट्रेक रिकार्ड विकसित राज्यों के टेªक रिकार्ड से बिलकुल अलग है। आंध्र प्रदेश तमिलनाडू की बात हो या फिर पंजाब एवं हरियाणा की बिहार की मौजूदा और भावी तस्वीर इनसे बिलकुल मेल नहीं खाती। हम यह मान सकते है कि अभी बिहार माइनस से जीरो पर पहूंचा है अब उसे जीरो से ऊपर उठना है। फिलवक्त वहां सबसे ज्यादा जरूरत तकनीकी शिक्षण संस्थानों की है। वहां अपराध के राजनीतिकरण ने सबकुछ बदलकर रख दिया था। नीतीश ने जैसे तैसे कानून व्यवस्था एवं शांति की स्थिति को बहाल करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया। लालू राज में जहां बिहार की विकासदर 3.5 थी वहीं नीतीश के राज में यह बढ़कर 10.4 फीसद पर पहुंच गई। विकास पर 40 फीसद से ज्यादा खर्च भी हुआ। महिलाओं के आरक्षण से लेकर सड़क अस्पताल और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतो पर नीतीश ने बहुत ज्यादा काम किया। आकड़े बतातें है लालू राज में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो में प्रति माह 39 मरीज आते थे। नीतीश ने यह आकड़ा 10 गुना से ज्यादा करने में रत्ती भर कसर नहीं की। अब वहां देर रात तक महिलाएं और युवतिंया बाजार जाने में घबराती नहीं है। अपहरण उद्योग पर नीतीश ने जबरदस्त तरीके से अंकुश लगाया। इतना सब कुछ करने के बाद छद्म विकास के पैरोकार नीतीश को चंद्रबाबू बनाने के सपने संजोने लगे हैं। उन्हे ऐसा करने से इसलिए बचना होगा कि चंद्रबाबू और नीतीश की आइडियोलॉजी एवं दोनो प्रदेशो के हालातों में बेहद फासला है। बिहार को हाइटेक बनाने की बजाय बुनियादी बदलाव की सख्त जरूरत है। वहां मौजूद मानव संसाधनरूपी पूंजी के समुचित नियोजन के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करना जरूरी है। इसके बाद शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव की महती जरूरत है। इन सबके बाद ही हम नीतीश को नीतीश बने रहने देना चाहे इसी में बिहार की भलाई है क्योंकि चंद्रबाबू के विकास का मॉडल पूरी तरह फेल हुआ था। यदि ऐसा नहीं होता तो आंध्रप्रदेश की जनता चंद्रबाबू को अस्वीकार नहीं करती। यह भी स्पष्ट है कि देश के मौजूदा सियासी नक्शे में चंद्रबाबू की अब धुंधली तस्वीर भी नजर नहीं आती।
देश के प्रख्यात राजनैतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने भी कुछ यही राय मीडिया के माध्यम से सामने रखी है। उनके अलावा प्रख्यात विचारक और चिंतक शेवल गुप्ता ने इनसे कुछ अलग मशवरा दिया है। कुल मिलाकर जिस अंदाज में नीतीश ने बिहारियों के दिल में और घर-घर में अपनी जगह बनाई है, उन्हे बिहार वासियों की इन्ही अपेक्षाओं को खासी तवज्जो देनी होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, विचारक एवं राजनैतिक विश्लेषक है)
Read more...

मध्यभारत का अनूठा ऐतिहासिक आयोजन

1 comments

धर्म, अध्यात्म और परमार्थ की त्रिवेणी प्रवाहित होगी
श्रीराम महोत्सव हेतु भूमिंपूजन 22 को

बैतूलः- सूर्यपुत्री मां ताप्ती के तट पर स्थित खेड़ीघाट में 8 से 16 दिसम्बर तक होने वाले ‘‘श्रीराम महायज्ञ एवं श्री रामचरित मानस पारायण’’ के लिए 22 नवम्बर सोमवार को प्रातः 9 बजे भूमिं पूजन किया जाएगा। समूचे मध्यभारत में अपनी तरह का यह अनूठा धार्मिक आयोजन है, जहां धर्म, अध्यात्म और परमार्थ की त्रिवेणी प्रवाहित होगी। इस अनूठे आयोजन में भारतवर्ष में उपलब्ध सम्पूर्ण रामायणों पर देश के प्रख्यात एवं प्रकाण्ड विद्वान अपने विचार प्रकट करेंगे। अनेको ब्राम्हणों का यज्ञोपवीत संस्कार होगा एवं निर्धन कन्याओं के विवाह भी सम्पन्न होंगे। भूमिं पूजन कार्यक्रम में कई प्रशासनिक अधिकारी, गणमान्य नागरिक एवं पत्रकारगण उपस्थित रहेंगे। आयोजन समिति ने महोत्सव में पधारने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए समुचित व्यवस्थाएं की है। यह आयोजन श्रीराम सेवा समिति के तत्वावधान में मानस महारथी पं. निर्मल कुमार शुक्ल के मार्गदर्शन में सम्पन्न होगा।
मॉ ताप्तीजी के पावन तट पर सूर्यवंशावतंश मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीरामजी की प्रसन्नता हेतु एवं जनमानस में श्रीराम भक्ति की अभिवृद्धि तथा चराचर विश्व के मंगल की दिव्य भावना से श्रीराम महायज्ञ का पावन कार्यक्रम दिनांक 08 दिसम्बर से 16 दिसम्बर तक होगा। इस आयोजन के तीसरे दिन पंचमी तिथि को देवयोग से भगवान श्रीराम के विवाह का प्रसंग होगा, त्रेता युग में इसी तिथि को सीता माता एवं भगवान श्रीरामजी का विवाह हुआ था। वक्तागणों में चित्रकूट से श्री श्री 1008 रामानन्दाचार्य कामतगिरी पीठाभीस्वर स्वामी रामस्वरूपाचार्य जी महाराज, श्री मुरलीदासजी महाराज एलकीमठ (महाराष्ट्र), मानस कोकिला नीलम गायत्रीजी (झांसी), श्री आलोकजी मिश्र (कानपुर), पत्रकार विचारक एवं चिंतक श्री गीत दीक्षित (भोपाल), नवान्ह परायण आचार्य पंडित जगजीवनजी शुक्ला (प्रयाग), श्री रघुनाथदास जी रामायणी (करेली), यज्ञाचार्य श्री केशवप्रसादजी उपाध्याय (रहटगांव) पधारेंगे।
Read more...
 
स्वतंत्र विचार © 2013-14 DheTemplate.com & Main Blogger .

स्वतंत्र मीडिया समूह