‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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नये साल की वो तीन कसमें! तीन वादें और बेकार इरादे!

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  दिसम्बर की 31 और जनवरी की 01 तारीख बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। जैसे ही दिसम्बर की 31 और नये केलेण्डर वर्ष की 01 जनवरी की तारीख करीब आती है। इन महत्वपूर्ण तारीखों के लिए लोग तीन बड़ी-बड़ी सूचियां बनाते है। पहली यह की वे 31 दिसम्बर को अपनी जिन्दगी से कौनसी बुराईयां छोड़ेंगे! दूसरी यह की वे 01 जरवरी को क्या-क्या नया अपनायेंगे? तीसरी सूचि में इन तीन दिनों में पर किये जाने वाले खर्च खरीदी बिक्री की होती है।

तीन सूचियों पर उठते कुछ प्रश्न:
         पर क्या वास्तव में ये दों दिन के लिए बनी सूचियां पूरे साल अमल में ली जाती है? जो लोग पूरे साल में एक दिन भी शुबह 10 बजे से पहले नींद से नहीं उठते वे लोग घर में सबसे पहले उठ जाते है। इतना ही नहीं वे करीब की पवित्र नदी में ठंडे-ठंडे पानी में नहा धोकर भी आ जाते है, तो क्या अब वे अगले पूरे साल ऐसा ही करने वाले है? पूरे साल जो मंदिरों की आरे मुह तक नहीं फेरते, 01 तारीख को मंदिर में सबसे पहले पूजा पाठ करनेे के लिए लाईन में नजर आते है, तो क्या ये मानले की ये लोग अब आस्तिक हो गये और पूरा साल ये धर्म-कर्म करेंगे? वर्ष भर दुनिया से झूठ बोलने वाले 31 और 01 जनवरी को किसी से झूठ नहीं बोलते, जहां बोलना पड़े वहां शालीनता से चुप हो जाते है, तो क्या हम मान ले की अब ये लोग सत्यवादी राजा हरिशचंद्र की तरह सच्चे हो गये है? 01 तारीख को नये-नये कपड़े पहने जाते है, तो क्या अब पूरे वर्ष, प्रत्येक दिन नये-नये कपड़े पहने जायेंगे? वर्ष भर भिकारियों को दुत्कारने वाले भी इन दिनों दानपूण्य करते नजर आते है, तो क्या अब पूरा वर्ष भिकारियों का यही सत्कार होने वाला है? कोई बताये ऐसा कौनसी बात है जिसे हम इन दो दिनों में तय करते है और उसे ताउम्र निभाते है, कौनसा?

कसमें-वादों पर विचारः-
           कोई कसम खाता है कि वों 31 दिसम्बर को आखरी बार शराब पियेगा, मटन खायेगा, और नये वर्ष के इस पावन दिन 01 के बाद वो इन्हे छुयेगा भी नहीं! क्या वास्तव में यहीं होने वाला है? कोई अपने गुस्से को बीते वर्ष के साथ ही चलता कर देने की कसम खाता है! कोई झूठ बोलना छोड़ना चाहता है, कोई सच बोलना चालू करता है! कुछ युवा अपने बॉय फ्रेण्ड या गर्ल फ्रेण्ड से पूरी जिन्दगी का अटूट रिश्ता बनाने के वादा करते है। कुछ अपने मित्रों से वादे लेते है कि 01 जनवरी को वे बिल्कुल लड़ाई या बहस नहीं करेंगे वरना पूरा साल हमारी लड़ाई होती रहेगी। तो क्या मान लिया जाये की इन दिनों खाई हुई कसमें, वादे, इरादें, योजनाएं सर्वसिद्ध है, और ये जरूर पूरे होते है? क्या यह ग्यारंटी है कि ये कसमें-वादें अब जिन्दगी भर के लिए हो गये है। अब अगले वर्ष की इन्ही पवित्र तारीखों और इन्ही पवित्र दों दिनों में दोबारा यहीं सूचियां नहीं बनानी पड़ेगी?

विशेष ‘‘डे’’ की भरमारः-
          आजकल ये ‘‘डे’’ मनाने का चलन बहुत जोर पकड़ता चला है। केलेण्डर में एक वर्ष में जितने दिन नहीं है उतने ‘‘डे’’ हमारे पास है, याद करने के लिए। हर दिन एक ‘‘डे’’ है, और हम अपना-अपनी सहुलियत के हिसाब से ‘‘डे’’ सेलीब्रेट करते है। जैसे 31 दिसम्बर को ‘‘थर्टी फर्स्ट’’, 01 जनवरी को ‘‘न्यू ईयर डे’’, 02 अक्टूबर को ‘‘गांधी जयंती’’, 14 फरवरी को ‘‘वेलेनटाईंस डे’’, 15 अगस्त को ‘‘इंडिपेंडेंस डे’’, 26 जनवरी को ‘‘रिपब्लिक डे’’। इसी तरह ‘‘फ्रेंडशिप डे’’, ‘‘मदर्स डे’’, ‘‘फादर्स डे’’, ‘‘गुड-डे’’, ‘‘बेड-डे’’ अमका-डे, ढमका-डे पता नहीं कितने ही ‘‘डे’’हैं।  हमें तो जिन्दगी एन्जॉय करने का बहाना चाहिए और वैसे ये एसएमएस भी, अब सस्ते हो गये है न, उसका फायदा उठाना ही चाहिए। हमारी आदत पिछलग्गू हो गई है, आदत हो गई है नकल करने की, इतिहास रट्टा मारने की, ‘‘डे’’ मनाने की। अब हममें इतिहास बनाने की काबिलियत नजर नहीं आती, हमें जो ‘‘डे’’ की सूचियां पकड़ा दी गई है, हम उसी पर अमल करने वाले है, हम अपना कोई ‘‘डे’’ नहीं बनाने वाले। हलाकि ऐसे ‘‘स्पेशल डे’’ प्रोडक्ट मोर्केटिंग कम्पनियों की उपज है और उन्हे यह सबसे ज्यादा मालूम है कि कौनसे दिन कौनसा ‘‘डे’’ है, इसे कैसे प्रोमोट करना है और इस दिन क्या सबसे ज्यादा बेचना है। ये लोग "१४ फ़रवरी" को प्यार नहीं बेचते, "कंडोम" और "गर्भनिरोधक गोलिया" बेचते है।  

और अंततः
         आज हम स्वतंत्र देश के नागरिक है और हम गर्व से 15 अगस्त 1947 को प्रत्येक साल इसी दिन याद करते है। ‘‘क्या हमारा देश उस दिन सिर्फ इसलिए आजाद हुआ चूंकि 15 अगस्त एक विशेष दिन था? या उस दिन हमारा देष आजाद हुआ इसलिए हमारे लिए वो विशेष दिन है?’’ ‘‘02 अक्टूबर विशेष दिन था इसलिए गांधीजी इस दिन पैदा हुए थे या इस दिन गांधी जी पैदा हुए इसलिए यह एक विशेष दिन है?’’ क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जिस दिन हमने अपनी जिन्दगी की बुराईयां छोड़ दी वही दिन हमारी जिन्दगी का सबसे विशेष दिन  (स्पेशल डे) बन जाये? अगर ये ‘‘स्पेशल डे’’ नहीं होते तो क्या हममें कोई बदलाव हीं नही आते? हम बुराई नहीं छोड़ पाते, हम कुछ अच्छी आदते शुरू नहीं कर पाते? एक यादगार पल के लिए किसी "विशेष दिन"  का इंतजार करने की बजाय उस दिन को यादगार बनायें जिस दिन आपने यादगार पल जिया है। यदि किसी विशेष दिन का हमपर प्रभाव पड़ता तो हमें प्रत्येक वर्ष 31 दिसम्बर और 01 जनवरी के लिए सूचियां बनानी नहीं पड़ती। हमें एक बार पुनः दसहरे के दिन अपनी बुराईयों के प्रतिक ‘‘रावन’’ ‘‘कुम्भकरण’’ ‘‘मेघनाद’’ की पुतले जलाने नहीं पड़ते। 
"इतिहास बनाने के लिए किसी विशेष, तारीख या दिन की जरूरत नहीं होती।
वो तारीख, वो दिन विशेष बन जाता है, जिस दिन इतिहास रचा जाता है।।"

नए केलेंडर में  नए वर्ष के आगमन पर शुभकामनाये। 
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गरीबो के नाम अमीरो का रथ, नाम ''गरीब-रथ"

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‘‘गरीब-रथ’’ कर रहा ‘‘गरीबी’’ का उपहास!

पूर्व रेलवे मंत्री लालू प्रसाद यादव जिन्हे मीडिया ने एक समय काफी सफल रेल मंत्री का तमगा दिया था। अपने कार्यकाल में कई लोकलुभावन घोषणाएं कर चुके है। पूरे देशभर में उनकी घोषणा की हुई कई नामों से नई-नई गाडिय़ा दौड़ रही है। उन्हीमें से एक रेल है ’’गरीब रथ’’ सीरीज की रेल श्रंखला जो उन्होने २००५ के रेल बजट में घोषणा की थी। 

गरीब रथ, जैसा नाम है वैसा ही इसका काम भी है। इसके पहले शब्द ‘गरीब’ से तात्पर्य है कि इसके किराये को गरीबो की पहुच हो इतना कम रखने की कोशीष की जाए। ट्रेन का किराया बाकी ट्रेनो के मुकाबले २५ फिसदी कम रखा गया। इसमें दूसरा शब्द ‘रथ’ से भान होता है कि यह ट्रेन पूर्ण रूप रथ की तरह सुसज्जित होगी, है भी वातानुकूलित एवं उच्च श्रेणी की यातायात बोगियो ये सजी-धजी टेªन। इसका प्रत्येक भाग ‘रथ’ शब्द का मान रखती है। टेªन में खान-पान, सभी सुविधाएं मानों राजधानी और सताब्दी जैसी है। 

सामान्यतः ट्रेन से किसी को कोई खास सिकायत तो नहीं है। पर मेरे मन में सिर्फ एक टीस हमेशा बनी रहती है कि मैं गरीब होते हुए भी आज तक गरीबो के लिए बनी इस ट्रेन में सफर नहीं कर पाया। क्यों नहीं कर पाया यही मेरे इस लेखन में जानने करने की काशीष कर रहा हूं।
गरीब रथ टेªन को लगभग ६-७ साल हो गये शुरू हुए, लगभग पूरे देश में कई गरीब रथ धड़ाधड़ दौड़कर गरीबो का बोझा ढो रहे है। लालू जी ने ट्रेन तो गरीबो के लिए ही चलाई है। बस वे जाते-जाते यह बताना भूल गये कि इसमें कौनसे वाले गरीब बैठेंगे? जो श्वास्तविक गरीब है वो? या जो गरीब जैसे दिखते है वो वाले? दूसरी यह भी नहीं बताया कि कि यह किन-किन शहरों में रूकेगी, वास्तव में जिन शहरो में गरीब रहते हैं उनमें? या जो शहर गरीब जैसे दिखते है उनमें?

एक बहुत गम्भीर प्रश्न मेरे दिमाग में कौंध रहा है गरीबो के नाम पर यात्रि किराये में इतनी बड़ी छूट देकर चलाये जा रहे गरीब रथ में क्या आज तक एक भी वास्तविक गरीब बैठा है? जहां पूरा देश आरक्षण प्रणाली को ढो रहा है वही क्या इसमें ऐसी कोई आरक्षण प्रणाली नहीं है, जिसके माध्यम से यात्रा के पात्र-अपात्रों को अलग-अलग किया जा सके? और वास्तविक जरूरतमंद गरीबो को किफायती यात्रा कराई जा सके? देश में चल रही दर्जनो ‘‘गरीब रथो’’ में एक भी गरीब रथ नहीं है जो किसी वास्तविक ‘गरीबों’ के शहर या किसानों वाले किसी गांव में २ मिनिट रूकती हो। 

वास्तव में ‘‘गरीब रथ’’ सीरीज की इन ट्रेनों के खाने के दांत अलग और दिखाने के अलग है। ये गाडिय़ा अपने जन्म से ही दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता जैसे सक्षम एवं समर्थ व्यापारिक शहरों के बीच चल रही हैं। अन्य ट्रेनों में दलाल आम नागरिक के पहुंच से पहले ही ट्रेन की सीटे बुक कर लेते है और फिर चलता है टिकटों की दलाली का गोरख धंधा। ऐसा ही हाल इनका भी लगता है, चुंकि इसमें मुझे आज तक कभी कोई सीट खाली नहीं मिली। कुलमिलाकर सिर्फ नाम ही गरीब रथ है वास्तव में इसमें गरीबो वाली कोई बात नहीं है।

गरीबों के नाम पर चल रहीं इन रियायती ट्रेनों के रियायत के मजे भी वही गरीब दिखने वाले रहीस लूट रहे है, जो शताब्दी और राजधानी जैसी आलीशॉन गाडिय़ों की शॉन है। कार्पाेरेट घरानों के दिखने वाले ‘गरीब’ और हमारे देश के स्वघोषित ‘बीपीएल टाईप के गरीब’ याने की नेतागण। इन्हे ज्यादा या कम किराये से कोई फर्क नहीं पड़ता पर जब सरकार उनके लिए इतनी रियायती ट्रेन चला ही रही है तो मजे लूटने में क्या बुराई है। कुल मिलाकर गरीबो के नाम पर रियायत का फायदा उठाकर रेलवे को सालभर में करोड़ो रूपये के राजस्व का चूना लगा रहे है, ये दिखने वाले गरीब।

गरीब की परिभाषा सरकार ने ही दी है वह यह कि 28 रूपये में जिसका घर चलता हो। पूरी छूट मिलाकर भी इस ट्रेन का किराया सामान्य श्रेणी के किराये से 4 गुना अधीक बैठता है जो एक आम वास्तविक गरीब के लिए देना सम्भव नहीं होता। गरीब तो आज भी एक ऑर्डनरी क्लॉस पेसेंजर ट्रेन की 10 रूपये की टिकिट खरीदने से पहले भी १० के नोट को 10 बार गिनता है, कही दो नोट एक साथ चिपके तो नहीं है!
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अरविन्द कौन?

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व्यंग्य 
स्वामी रामदेव कौन?
प्रसिद्द योगगुरु और सामाजिक कार्यकर्ता..
अन्ना है कौन?
स्वामी रामदेव के द्वारा देहली लाये गए 
महारास्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता,,
अरविन्द है कौन?
एक सेवानिवृत सरकारी अधिकारी,
एक एनजीओ संचालक..
---
लोकपाल जनआन्दोलन के बाद .
अन्ना कौन?
प्रसिद्द सामाजिक कार्यकर्ता,
अरविन्द है कौन?
अन्ना टीम के मुख्या सदश्य.
लोकपाल जनआन्दोलन,
अरविन्द कौन?
अरविन्द अन्ना के सारथी
अरविन्द मशहूर समाजसेवी
अरविन्द अन्ना के हनुमान
अन्ना ने ये कहा, 
अन्ना ने वो कहा, 
अन्ना और अरविन्द ने ऐसा-वैसा कहा..
----------
अन्ना और अरविन्द की राहे जुदा 
निष्कर्ष 
स्वामी रामदेव कौन?
प्रसिद्द योगगुरु और सामाजिक कार्यकर्ता..
अन्ना कौन?
प्रसिद्द सामाजिक कार्यकर्ता,
अरविन्द कौन?
एक मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता, 
इंडिया अगेंस्ट करप्सन के डाइरेक्टर
अन्ना के उत्तराधिकारी 
अन्ना और स्वामी रामदेव जी के आन्दोलन से 
तपकर निकली एक ईमानदार
राजनैतिक पार्टी के मुखिया 
एक भावी प्रधानमन्त्री पद के
सुयोग्य उम्मीदवार!!
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confidence

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एक बार एक गावं ने सोचा क्यों ना हम बारिश के लिए
भगवान से प्रार्थना करे ! स्थान तय हुआ !! सारा गावं
वहा पंहुचा पर एक बच्चा छतरी ले के पंहुचा ! इसको
कहते हैं confidance ?



एक साल के बच्चे को हवा मैं उछाला और वो हंस रहा था
क्यों की उसको विश्वास हैं की कोइ उसे पकड़ भी लेगा
इसको कहते हैं trust.


हम रोज रात को बिस्तर पे सोने जाते हैं !! हमे पता भी
नहीं की कल् हमारी आँख खुलेगी भी या नहीं पर
फिर भी हम अगले दिन की रूप रेखा बना के सोते हैं
इसको कहते हैं hope


So never lose CONFIDENCE ,TRUST & HOPE 

Pawan


09416074595
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बढ़ी मानव तस्करी ;छत्तीसगढ़ बना एक बड़ा बाजार

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पत्रिका के रायपुर संस्करण ने अपने सोमवार 06 दिसम्बर 2010 के अंक में संजीत कुमार की चौंकाने वाली खबर प्रकाशित की है , यह खबर शर्मनाक और चिंताजनक भी है । पत्रिका बताता है कि महिलाओं की तस्करी करने वालों के लिए छत्तीसगढ़ एक बड़ा बाजार बन चुका है। प्रदेश की बालाओं को बहला-फुसलाकर देश के अन्य राज्यों में ले जाकर बेच देने की कई घटनाएं सामने आई हैं।
आंकड़ों पर गौर करने पर पता चलता है कि बीते तीन साल में करीब साढ़े छह हजार महिलाएं गायब हो चुकी हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें लगभग आधी संख्या नाबालिग लड़कियों की है। पुलिस गुमशुदगी का मामला दर्ज कर अपना कर्तव्य पूरा कर रही है। इन लड़कियों का आंकड़ा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।
राज्य में मानव तस्करी की सबसे ज्यादा घटनाएं आदिवासी बहुल सरगुजा और बस्तर में सामने आ रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2007 से 2009 के बीच राज्य से करीब 18664 लोगों के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज की गई।
इनमें सबसे ज्यादा संख्या महिलाओं और बालिकाओं की है। इन तीन सालों में लगभग 4500 से अधिक नाबालिग लड़के भी गायब हुए हैं। पुलिस अफसरों के अनुसार पिछले कुछ सालों के दौरान राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में भी गुमशुदगी के मामले बढ़े हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर मामले थानों तक नहीं पहुंचते। इस वजह से वहां के सही आंकड़े नहीं मिल पाते।
-शिकायत ही नहीं पहुंचती
राज्य के आदिवासी क्षेत्रों से भी बड़े पैमाने पर महिलाओं और युवतियों के गुम होने की घटनाएं हो रही हैं। जानकारी का अभाव सहित अन्य कारणों से इनमें से ज्यादातर मामलों की शिकायत पुलिस तक नहीं पहुंच पाती।
-पकड़ी जा चुकी है मानव तस्करी
करीब दो साल पहले रायपुर पुलिस ने एक कंटेनर पकड़ा था। उसमें 50 से अधिक लोगों को चोरी-छिपे दूसरे राज्य ले जाया जा रहा था। जम्मू व उत्तरप्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में यहां के लोगों को बंधक बनाए जाने की भी लगातार सूचनाएं आती रहती हैं।
सरकार स्वीकार चुकी है मानव तस्करी
पूर्व गृहमंत्री नंदकुमार पटेल के अनुसार राज्य की बालिकाओं और मासूम बच्चियों की तस्करी की जा रही है। उन्हें दूसरे राज्यों में ले जाकर बेचा जा रहा है। वर्तमान सरकार भी इस बात को विधानसभा में स्वीकार कर चुकी है। इसके बावजूद इसे रोकने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है।
-महानगरों में सप्लाई
करीब ढाई साल पहले बस्तर की एक लड़की को दिल्ली पुलिस ने कुछ लोगों की चंगुल से मुक्त कराया था। युवती को अच्छा काम दिलाने के बहाने दिल्ली ले जाकर बेच दिया गया था। पुलिस अफसरों के अनुसार सरगुजा क्षेत्र की कई लड़कियों को दिल्ली, मुम्बई व पुणे आदि शहरों से मुक्त करा कर लाया गया है।
-नहीं देते सूचना
पुलिस अफसरों के अनुसार कई बार गुम इंसान कुछ समय बाद लौट आता है, लेकिन परिवार के लोग इसकी सूचना थाने में नहीं देते। इस वजह से भी आंकड़े बढ़ जाते हैं।
गुम इंसानों की तलाश के लिए हरसंभव प्रयास करने के निर्देश सभी थानों को दिए गए हैं। इसके तहत समय-समय पर थाना स्तर पर गुम इंसानों का पॉम्पलेट और पोस्टर भी चस्पा किया जाता है। दूसरे थानों, जिलों और प्रदेशों को भी सूचना दी जाती है। इसकी मॉनिटरिंग के लिए पुलिस मुख्यालय में सीआईडी शाखा के अधीन राज्यस्तरीय एक सेल भी बनाया गया है।
-राजेश मिश्रा, प्रवक्ता, छत्तीसगढ़ पुलिस
साभार : पत्रिका रायपुर , संजीत कुमार

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Where to SMS? (किस्सा लोकल SMS और VIP Calls का )

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    आज दोपहर में मेरे मोबाईल पर एक कॉल आया, रिंग बजी मैने उठाया एक लड़की ने कहा कि आपने मुझे मेसेज क्यों भेजा? मैने कहा कि मेडम मैंने तो आपको कोई मेसेज नहीं भेजा, वो बोली आपने भेजा है, मैने कहा सच्ची नहीं भेजा, वो बोली मेरे मोबाईल में है मेसेज मैने कहां मेरे मोबाईल में तो आपका नम्बर ही नहीं है, पर वो थी की बहस पर बहस किये जा रही थी और कह रही थी की मेरे मोंबाईल में आपके द्वारा भेजे गये मेसेज है। मैंने सोचा मेरी कोई दोस्त होगी जो मजाक कर रही है। फिर थोड़ी देर में एक लड़के का कॉल आया उससे भी वैसी ही बहस हुई जैसी उस लड़की के साथ हुई थी। उसके बाद एक और लेडीज का कॉल आया उन्हे तो मैने पोलिस में जाने की धमकी भी दे दी, जवाब में उन्होने ने भी मुझे वैसी ही धमकी दी। अभी तक मेरे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर माजरा क्या है? क्यों लोग मेरे कभी कभार बजने वाले बेचारे गुपचुप मोबाईल को बजा बजाकर तंग कर रहे है। कहीं मेरे दोस्तो का कोई प्लान तो नहीं है? क्योंकि मैं बिना जाने पहचाने नम्बर्स के कॉल उठाता नहीं और मोबाईल से बात करना भी ज्यादा पसंद नहीं है, तो हो सकता है इसीलिए प्लान बनाया गया हो की आज इसे परेशान किया जाए?
    पर मेरा दिमाग तब ठनका जब देश के कुछ वीवीआईपी लोगो के कॉल भी मेरे मोबाईल पर आने लगे। अब तक तो मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे क्योंकि मेरे समझ आ चुका था कि आखिर माजरा क्या है। एक्चुअली आज सुबह-सुबह बॉस का फरमान आया की कोई ऐसा सॉफ्टवेयर या वेबसाईट ढूंण्डो जो फ्री में बल्क एसएमएस करता हो ताकि दीपावली की बधाई भेजी जा सके। मैने गूगल पे दे मारा सर्च अब दुनिया भर की वेबसाईटस और सॉफ्टवेयर्स पेज पर आ गये। अब मैं लगा सबको ट्राय करने। मेरी जानी पहचानी दो साईट्स sms-Gupshup गपसप और way2sms मुझे जंच गई क्योंकि इनका मैं पहले से ही मेंम्बर भी हूं। फिर मैं way2sms में ग्रूप एसएमएस ट्राय करने लगा। ये जांचने के लिए की एक साथ बहुत सारे एसएमएस जाते है की नही? मैने बॉस का मोबाईल लिया और सारे कांटेक्ट्स को सीएसवी फाईल फारमेट में बदलकर सीधे ही मेरी way2sms प्रोफाईल जो की मेरे मोबाईल नम्बर से रजिस्टर्ड थी में अपलोड कर दिया। उन कॉक्टेक्ट्स में पूरे देश विदेश के नेताओं, वीवीआईपी, वीआईपी, लोकल सारे के सारे नम्बर अपडेट हो गये।
    कांटेक्स अपलोडिंग के 5 मिनट में ही मेरी मुसिबत शुरू हो गई। सायद way2sms वेबसाईट से मेरे द्वारा जिन मोबाईल नम्बरो को मेरी प्रोफाईल में डाला गया उन्हे सूचना मेसेज गया होगा की उनका मोबाईल मेरी प्रोफाईल में एड किया गया है। उस मेसेज में मेरा नम्बर भी गया होगा। जिससे उन नम्बर वालो द्वारा मुझे वापस कॉल किया जा रहा था। चलों वैसे तो ये नेता और वीआईपी लोग सिर्फ भाषणों और फंक्सनों में ही सुने जाते है पर इसी बहाने मेरे मोबाईल ने भी इनकी आवाज सुनली।

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