‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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मुहब्बत सच और झूठ में नहीं

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मुहब्बत सच और झूठ में नहीं फसती वो तो दिल से मन के बीच चलती है।
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कब तक यू ही दूर भागोगे? कभी तो मुड़कर हमसे नजरे मिलावोगे॥
नजर मिलेगी तो बात भी होगी ॥ ऐसा तो नहीं कि मुह बंद कर मुह चिढावोगे ?
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मै कैसे कहू कि कब तक साथ दूंगा तेरा?
मै तो साया हू जब दिल करे पीछे मुड़कर देख लेना
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अब बस यही दुआ है कि तुम थोडा आराम करो तो मुझे कुछ चैन मिले
साया हू न कभी -कभी थक जाता हू
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बीते हुए लम्हे हमेशा दर्द भरे होते है ॥
इसलिए उन्हें अपने अरमानो के साथ ही जला देता हूँ मै
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कोई सास लेना भी कभी भूल सकता है भला?
वो तो ज़िंदा है मेरे दिल में धड़कने बनकर

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सागर....
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नन्ही सी एक कली निर्जन वन में

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देखी एक नन्ही कली माली ने,
थाम ली जिसने अंगुलि निर्जन वन में,
कहने लगी चल चले भीड़-भरी तन्हायी से
कोमल-कोमल, गुमसुम-गुमसुम, चुप-चुप,
क्या करूँ, क्या ना करूँ सोचती,
वन की नन्हि सी कली थी वो..
इंतजार था उसे, पर किसका?
कैसी तड़प ये तन-मन में?
सायद अधूरे ख्वाब थे उसके
कुछ बनने के चाह थी मन में
पर,, कैसे करूं क्या करू?
माली ने कुछ विचार किया,
क्यू ना ले चलु इसे सुंदरवन में.
उसने कली संग पौधे को लेकर
कर लिया शामिल बगिया आँगन.
हो गई पूरी मन की उलझन
वही बगिया, वही साथी, वही मंजिल
ये ख्वाब पूरा हुआ, या ख्वाबों में थे वो?
आज खिलि वो, फूल बनी वो..
भटक रही थी निर्जन वन में
देखो, सुंदरता का ताज बनी वो..
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एक अनाथ बच्चे कि नयी माँ

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(एक कहानी है एक बेटे माँ की और कुछ नहीं)
एक थी मॉ

जब उसके बेटे ने अपने अनाथ सहपाठी को
खेलते-खेलते एक चांटा जड़ दिया,
मामला मॉ के दरबार तक आ पहूंचा,
कचहरी में मामले की सुनवाई हुई
फैसले में मॉ ने सहपाठी बच्चे को समझाते हुए कहा
बेटा तू भी तो अपना ही है
क्या हुआ भाई ने अपने ही भाई को चांटा मार दिया?
थोड़ी बहुत नोकझोंक से तो प्यार बढ़ता है।
वो बच्चा ये सोचकर खुश होकर गया कि
वाह आज एक चांटा खाया, तो मुझ अनाथ को माँ मिल गयी ,
अगले दिन उसे तरकीब सूजी की परिवार बढ़ाया जाय,
माँ तो मिल गयी पापा का भी जुगाड़ किया जाए ,

वो गया और पिछले दिन जिसने उसे चांटा मारा था
उसे एक चांटा जड़ दिया,
इस उम्मीद में कि, मैने खाया तो मॉ (फिमेल) मिली
अब मई मारूंगा तो शायद पिताजी (मेल) मिल जाए ?

मामला फिर उसी दरबार पहूंचा।
कचहरी में मामले की सुनवाई हुई
फैसले में मॉ ने................

(अब आगे मां का रिएक्शन क्या होगा? आप लोगो की लेखनी से इस कहानी का आगे का भाग सुनना चाहूंगा। खासकर आज कि मांओ से, देखे किसका कमेंट मेरी आगे की कहानी से मैच करता है।)
**********सागर
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मेरी प्यारी सखी तेरे विरह कि पाती

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मेरी प्यारी सखीः-
चाहे लाख बहारे आये और चली जाए
नई ऋतुए आये, मौसम बदल जाए।
ये मेरी अमर प्रेम की बगिया,
सदा जिंदा और आबाद रहेगी।
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चाहे नये दौर का जमाना हो नया,
कोई तूफां आये और दुनिया सिमट जाए।
इस बसेरे की नीव, ईटे मुहब्बत से बनी है
आधार मजबूत और, बेदाग रहेगी।
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चाहे जीवन में आये या कोई छोड़कर चला जाए,
कोई अपना बनाकर नये सपने दिखाए।
ये दिल हमेशा तुम्हारा रहा,
जो सदा तुम्हारे लिए धड़का, और धड़कता रहेगा।
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बेगानी दुनिया में कोई किसी का पूरे जीवन-साथ नहीं देता,
कोई कुछ पल साथ चलता है, तो कोई हाथ भी नहीं देता।
मेरे मन की डोर तुम्हारे आत्मा से बंधी है,
इसे सदा तुम्हारा इन्तेजार रहा है, और मौत के बाद भी रहेगा।
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ये दुनिया बड़ी संग्दिल है बड़ी जल्दी भूल जाती है।
चाहे कोई दिल में घर करे या मन में समाये।
जैसे धड़कनो को धड़काने की जरूरत नहीं होती
मेरी प्यारी सखीः-
तेरी विरह मुझे रूलाती रही है,
और ताउम्र मुझे तेरी याद दिलाती रहेगी।
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ये ठोकर मेरी गलती कि सजा थी

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इसमें तेरी खता नहीं कि,
ये ठोकर मेरी गलती कि सजा थी,
चलने से पहले ही, निगाह की होती तो,
मखमल में दबे कंकड़ निगाह में होते॥
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आह पे आह लेते है तेरी आने कि आहट पे॥
दिल को यकीन क्यों नहीं होता कि तेरी आहट
सिर्फ मेरी निगाह में है॥
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वो हर बार गुनाह पे गुनाह का इल्जाम लगाते गए॥
और मै शर्मिंदा होता गया ..
सुकर है उनकी बेवफाई का ..
मुझे पता तो चला कि मै बेगुनाह था॥
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इतनी अनमोल धरोहर तुझपे लुटा बैठे॥
कुछ पल के विश्वास पे जिंदगी दे बैठे॥
पता न थे खुले जो तेरे राज मेरे जाने के बाद, वरना
सजी थी सूली खुद कि जगह तुझे सुला देते ॥
******************************@ सागर


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