‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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परमपूज्यनीय सर संघचालक, संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मतलब है- राष्ट्र की सेवा करने के लिए स्वयं की प्रेरणा से आगे बढ़चढ़कर राष्ट्र कार्य करने हेतु समर्पित लोगों द्वारा स्थापित संघ। हमारा यह प्यारा हिन्दुस्तान, पवित्र हिन्दू राष्ट्र हमारी कर्तव्य भूमि होने के कारण हम लोगों ने अपने राष्ट्रीय हित की रक्षा के लिए इस संघ को इस देश में स्थापित किया है। हम संघ परिवार के द्वारा राष्ट्र की हर दृष्टि से, हर प्रकार से सेवा करना चाहते है। अपने राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति होते हुए देखना चाहते है।
हमें सर्वप्रथम चिंतन करना चाहिए कि राष्ट्र का अर्थ क्या होता है? किसी घने जंगल को, जलहीन मरुस्थल को या निर्जन भू.भाग को राष्ट्र नहीं कहते। जिस भू.भाग पर एक जाति के, विशेष धर्म के, परम्परा वाले, विशेष विचारधारा वाले और विशिष्ट गौरवशाली इतिहास वाले लोग एकत्रित रहते हैं; वह भू.भाग राष्ट्र माना जाता है।
संघ को नया झण्डा खड़ा नहीं करना है। भगवा ध्वज का निर्माण संघ ने नहीं किया। संघ ने तो उसी परम.पवित्र भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज के रूप मंे स्वीकार किया है जो कि हजारों वर्षाें से राष्ट्र और धर्म का ध्वज था। भगवा ध्वज के पीछे इतिहास है। परम्परा है। वह हिन्दू संस्कृति का द्योतक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की रक्षा के निमित्त हुआ है। जो जो वस्तुएँ इस संस्कृति की प्रतीक है, उसकी संघ रक्षा करेगा। भगवा ध्वज हिन्दू धर्म और हिन्दू राष्ट्र का प्रतीक होने के कारण उसे राष्ट्र ध्वज मानना संघ का परम् कर्तव्य है।
हिन्दू समाज में पैदा होने के कारण इस संगठन के कार्य का दायित्व हमारा है। जिसे हमें पूरी तरह से निभाना होगा। यह जिम्मेदारी दिन.प्रतिदिन अधिकाधिक बढ़ती ही चली जा रही है। हमारा कार्यक्षेत्र अत्यधिक विशाल है। हमारा दृष्टिकोण भी विशाल होना चाहिए। हमें ऐसा लगना चाहिए कि समूचा भारतवर्ष हमारा है। संघ का कार्य है, हिन्दू समाज को सर्वसमर्थ बनाना। हिन्दू समाज के कल्याण का अर्थ है, उसका स्वसंरक्षणमय होना। हमारे पूर्वजो ने, बुजुर्गो ने, जिस प्रकार समाज और संस्कृति की सेवा की, जो उच्च ध्येय हमारे सामने रखे और उनकी प्राप्ति के लिए दिन.रात प्रयत्न किये, उन्ही ध्येयों को उसी भांति हमें भी सिद्ध करना है। उनके अधूरे कार्यों को हमें दृढ़ता पूर्वक पूरे करने है। संघ का संस्कारों पर अत्यंत विश्वास है, जैसे संस्कार वैसी ही वृत्ति बनती है और एक ही वृत्ति के अनेको लोगो के एकत्रित होने से संगठन के लिए पोषक वातावरण निर्मित होता है। संघ का कार्य एवं संघ की विचारधारा. हमारा कोई नया आविष्कार नहीं है। संघ ने तो अपने परमपवित्र सनातन हिन्दू धर्म, अपनी पुरातन संस्कृति, अपने स्वयंसिद्ध हिन्दू राष्ट्र और अनादिकाल से प्रचलित परमपवित्र भगवा ध्वज को यथावत् आप लोगो के सामने रखा है। संघ ने किसी व्यक्ति विशेष को अपने गुरु स्थान पर न रखकर परम्पवित्र भगवा ध्वज को ही गुरु माना है। जिसमें हमारा इतिहास, परम्परा, राष्ट्र के स्वार्थ.त्याग इतना ही राष्ट्रीयत्व के सभी मूल तत्वों का समन्वय हुआ है। इस अटल और उदात्त ध्वज से हमें जो स्फूर्ति प्राप्त होती है, वह अन्य किसी भी मानवीय विभूति से प्राप्त होने वाली स्फूर्ति की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ है। आज हिन्दू समाज दुर्बल है और हिंसक वृत्ति के लोग कमजोर समाज की कौड़ीभर भी परवाह नहीं करते। इसलिए यदि हम अहिंसा मंत्र का घूँट हिंसात्मक वृत्ति के लोगांे के गले उतारना चाहते हैं तो हमें इतना सामर्थशाली बनना चाहिए कि जिससे उन लोगों पर हमारे उपदेश का परिणाम हो और यदि हमारी यह इच्छा है कि हिन्दुस्तान में अहिंसा का सामाज्य फैले तो हिन्दू समाज की दुर्बलताओं को नष्ट कर उसे बलशाली बनाना नितांत आवश्यक है। हम सभी भाई संघ के भिन्न-भिन्न घटक है। संघ पूर्णरूप से हम सबका है। जो सम्बंध अपने शरीर और उसके अंगो के बीच है, वही सम्बंध संघ में और हममें है। शरीर के सारे घटकों का विकास एक सा और एक ही समय होता जाये तभी शरीर समर्थ बनकर सुघड़ प्रतीत होने लगता है। वास्तविक एकता उन्हीं लोगो की हो सकती है जो की समान आचार.विचार वाले, समान परम्परा वाले, समान संस्कृति वाले तथा समान ध्येययुक्त होते हैं। हम लोगों में चाहे जितने ऊपरी मतभेद दिखाई दें, परन्तु सारे हिन्दू तत्वतः एक राष्ट्र है। हमारी धमनियों में एक सा लहू बह रहा है। जो नवीन स्वयंसेवक आवें, उनमें ध्येय निष्ठा उत्पन्न करनी चाहिए और पुरानों की ध्येय निष्ठा को और पॉलिस देकर अधिकतम निर्मल बनाते जाना चाहिए। यह प्रत्येक स्वयंसेवक का परम् कर्तव्य है। प्रशंसा से फूलकर कुप्पा न होते हुए और अधिक लगन से कार्य में संलग्न हो जाना चाहिए। संघ का स्वयंसेवक चाहे जहां रहे उसे सदा संघ कार्य के लिए प्राणपण से चेष्टा जारी रखनी चाहिए। संघ के तत्व का प्रचार करके संघ की मजबूती का प्रयत्न सदैव ही करते रहना चाहिए। जिसे अपने एवं अपने देशबंधुओं के सिवाय और किसी का मोह नहीं, अपने धर्म और धर्मकार्य के अतिरिक्त कोई व्यवसाय नहीं, अपने हिन्दू धर्म की अभिवृद्धि होकर हिन्दू राष्ट्र के प्रताप सूर्य को तेजस्वी रखने के अतिरिक्त अन्य कोई स्वार्थ.लालसा नहीं, उसके हृदय में भय, चिन्ता या निरुत्साह पैदा करने का सामर्थ संसार भर में तो हो ही नहीं सकता।
संकलित- 1. राष्ट्रीयत्व, २. शाखा स्थापना
 
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