‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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प्यार जताने के वो तरीके.....!

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प्रतीकात्मक फोटो : commons.wikimedia.org से ली गयी..
                 चौक चौराहो, पानठेलो पर स्कूल के सामने, ट्यूषन की राहो में खड़े लड़के गर्ल-फ्रेण्ड के इंतजार में घण्टों बिता देते थे, सिर्फ एक नजर दिख जाये इसके लिए 10-20 चक्कर उसके घर के मार देते थे। प्रेम-पत्र लिखकर उसकी सहेली के माध्यम से पहुचाना, फिर कई दिनों तक जवाब का इंतजार करना। एक लड़की को पटाने में 6 महीने से 2-3 साल तो लग ही जाते थे। लड़की को पटाना, फिर शादी के लिए मनाना, फिर इस प्यार को बालिग होते तक निभाना, फिर मम्मी पापा को शादी के लिए पटाना। ज्यादातर लड़कों की यही दिनचर्या हुआ करती थी। दोस्ती और प्यार का बहुत अच्छा माहौल था, लोग एक दूसरे के लिए जीने मरने को तैयार रहते थे। ये मेरे बचपन में प्यार-मुहब्बत और दोस्तो से जुड़ी यादें है।
मेरी हेण्डराईटिंग ठीक-ठाक थी, और शेर-सायरी का शौकीन था। पढ़ाई लिखाई में ठीक-ठाक और हिन्दी पर पकड़ भी ठीक ही थी। उपर से मोहल्ले में परीवारो में अच्छी खासी पैठ थी। किसी भी घर में बे-रोक-टोक आ-जा सकता, किसी से भी मिल बोल सकता था। इसलिए मैं मोहल्ले में मित्रों के बीच ‘‘मोस्ट वांटेड’’ और ‘‘क्लोज फ्रेण्ड’’ था। ज्यादातर मित्र मुझसे दोस्ती बनाये रखना चाहते थे।
मेरे मित्र मेरी खूबियों का इस्तेमाल मुझे पोस्टमेन के रूप में इस्तेमाल में, ‘‘प्रेम-पत्र’’ लिखवाने और उन्हे पहुंचाने के लिए करते थे। मेरा अनुभव ऐसा था कि खूब लम्बे-लम्बे प्रेमपत्र लिखने में माहिर हो गया था। 9वी 10वी की युवतियों को पत्र लिखवाया जाता तो 11वी, 12 वी की हिन्दी की पुस्तकों से कविताओं के अंष चुराकर, पुराने गाने, सायरों की शेर-सायरी से लेटर का डेकोरेषन करता था ताकि लेटर को अधिक विष्वसनीय, साहित्यिक एवं गम्भीर बनाया जा सके। 
किसी की गर्ल-फ्रेण्ड रूठ जाये, मिलने से मना कर दे, ब्रेकअप हो जाये, हर हर मर्ज की दवा थी मेरे पास! कई दोस्तो के लिए इतने लम्बे-लम्बे लव-लेटर लिखे कि उन्हे पढ़ने में ही उनकी गर्ल-फ्रेण्ड्स को 2-3 घंटे लग जाते। अब ये मुझे नहीं पता कि उनके समझ आता था या सिर्फ निबंध की लम्बाई चौड़ाई गिनकर ही मेरा काम हो जाता! वैसे स्कूल में परीक्षा की कॉपी जॉचने वाला टीचर तो अक्सर निबंध के शब्द गिनकर ही नम्बर दे देता है। खैर जो भी हो पर मेरा काम तो हो ही जाता था। 
मेरे एरिया की ज्यादातर युवतियों से बोलचाल थी उनके आसपास रहने के कारण उनकी हर नब्ज से वाकिफ हो गया था, उनकी भावनाओं का फायदा उठाना मैं सीख गया था। इसलिए मेरा हर पैतरा काम कर जाता था। हालांकि मेरे खुद के मामले में मैं सफल नहीं हो पाया। 
खैर मेरी बात छोड़कर फिर से वापस मुद्दे पर आते है। समय बदला, स्कूल पढ़ते-पढ़ते मेरी आर्थिक स्थिति के कारण मैं काम धंधे से लगा और मुझे प्राईवेट पढ़ाई करनी पड़ी। इसके बाद का 12 साल का समय कम्प्यूटर एवं तकनीकि को समझने और रोजी-रोटी कमाने में बीत गया। स्कूल की जिंदगी ओ दोस्त वो मोहल्ला सब पीछे छूट गया। 
आज जब मैं उन दिनों की ओर लौटकर देखता हूं तो लगता है जैसे दुनिया एकदम बदल गई है। आजकल कोई लड़का अपने किसी दोस्त से इतनी मेहनत नहीं करवाता। कोई लड़का किसी लड़की के इंतजार में उसके स्कूल के पास, पानठेलो पर, चौक चौराहो पर दिनभर खड़ा नहीं रहता। बस एक मिषकॉल आती है लड़का बाईक लेकर आता है और दोनो दिनभर के लिए फुररररर.......।
अब तो मोबाईल मिसकॉल, मेसेज, फेसबुक, गूगल प्लस का जमाना है। एक साथ 50-100 लड़कियों को किसी और का भेजा एक जैसा ही मेसेज फारवर्ड किये जाते है। उनमें से कुछ का तो पॉजिटिव रिस्पॉस आ ही जाता है। आज शादी ब्याह के बारे में न तो लड़की सोचती है और न ही लड़का। मेरी टच में रहने वाले बहुत से लड़के बताते है कि हमारी गर्ल-फ्रेण्ड ही कहती है कि सिर्फ लाईफ एंजॉय करनी है शादी नहीं करनी। अब ये तो मुझे नहीं पता की लाईफ एंजॉय कैसे करते है। पर महीने-दो महीने में ही उनके साथ कोई दूसरी गर्ल-फ्रेण्ड नजर आने लगती है।
ब्रेकअप का भी अलग ही तरीका निकल गया है। मोबाईल की सिम बदल लो। फेसबुक की आईडी डिलेट करके नयी बना लो बस। पुराने रिस्ते खतम और नई आईडी से पुनः नई शुरूवात........................।

10 Responses so far.

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "पाकिस्तान पर कूटनीतिक और सामरिक सफलता “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

  2. तब को ज़माना बदल गया

 
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