क्या धार्मिक स्थलों पर बढ़ता बंदर–मानव संघर्ष प्रकृति की देन है, या मानव की बनाई हुई समस्या?
लेखक : कृष्णा बारस्कर (अधिवक्ता)
सुबह का समय है। मंदिर की घंटियाँ बज रही हैं। श्रद्धालु हाथ में प्रसाद लेकर दर्शन के लिए आगे बढ़ रहे हैं। तभी अचानक एक बंदर आता है, किसी के हाथ से प्रसाद छीन लेता है, किसी का चश्मा उतारकर मंदिर की छत पर जा बैठता है, तो किसी का मोबाइल लेकर पेड़ पर चढ़ जाता है। कुछ लोग हँसते हैं, कुछ वीडियो बनाने लगते हैं और कुछ सलाह देते हैं—"केला दे दो, सामान वापस मिल जाएगा।" यह दृश्य आज भारत के अनेक धार्मिक स्थलों पर इतना सामान्य हो चुका है कि लोग इसे मंदिर की व्यवस्था का ही हिस्सा मानने लगे हैं। लेकिन क्या यह वास्तव में सामान्य है? क्या बंदर जन्म से ऐसे होते हैं, या हमने अपने व्यवहार से उन्हें ऐसा बना दिया है?
यह प्रश्न केवल वन्यजीवों का नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच, धार्मिक आस्था, पर्यावरणीय असंतुलन और आधुनिक जीवनशैली का भी है। यदि हम इस समस्या को केवल "बंदरों का आतंक" कहकर टाल देंगे, तो हम उसके वास्तविक कारणों को कभी नहीं समझ पाएँगे।
भारत सदियों से प्रकृति और जीव-जंतुओं का सम्मान करने वाला देश रहा है। बंदरों को भगवान श्रीहनुमान से जोड़कर देखने की परंपरा ने समाज में उनके प्रति करुणा और सम्मान की भावना विकसित की। पहले लोग उन्हें कभी-कभार फल या चना खिला देते थे, लेकिन वह व्यवहार अपवाद था, नियम नहीं। आज स्थिति बदल चुकी है। अनेक धार्मिक स्थलों पर प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पहुँचते हैं। प्रसाद, फल, मिठाइयाँ, पैकेटबंद खाद्य पदार्थ और खुले में पड़ा भोजन बंदरों के लिए नियमित भोजन का स्रोत बन चुका है। धीरे-धीरे उन्होंने यह सीख लिया कि मनुष्य केवल दर्शन करने नहीं आता, बल्कि भोजन भी साथ लाता है।
वन्यजीव वैज्ञानिक बताते हैं कि रीसस मकाक जैसी प्रजातियाँ अत्यंत बुद्धिमान और अनुकूलनशील होती हैं। वे अपने अनुभव से सीखती हैं और लाभदायक व्यवहार को बार-बार दोहराती हैं। यदि किसी बंदर को कई बार यह अनुभव हो जाए कि किसी व्यक्ति के हाथ से प्रसाद छीनने पर भोजन मिल जाता है, या किसी चश्मे अथवा बैग को पकड़कर बैठने पर लोग फल लेकर आते हैं, तो वह उस व्यवहार को दोहराने लगता है। धीरे-धीरे समूह के दूसरे बंदर भी उसी व्यवहार की नकल करने लगते हैं। यही कारण है कि कुछ धार्मिक स्थलों पर चश्मा, मोबाइल, पानी की बोतल और प्रसाद छीनने की घटनाएँ बार-बार दिखाई देती हैं। यह कोई रहस्यमय प्रवृत्ति नहीं, बल्कि सीखा हुआ व्यवहार है।
यदि हम कुछ दशक पीछे जाएँ तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। उस समय मंदिरों के आसपास बंदर अवश्य रहते थे, परंतु वे मनुष्यों से दूरी बनाए रखते थे। जंगलों में फल, पत्तियाँ और प्राकृतिक भोजन उनके लिए पर्याप्त था। धीरे-धीरे जंगलों का क्षेत्र सिकुड़ता गया, मानव बस्तियाँ वन क्षेत्रों तक पहुँचती गईं और धार्मिक स्थलों के आसपास होटल, दुकानें तथा भोजन के असंख्य स्रोत विकसित हो गए। परिणामस्वरूप बंदरों ने अपने व्यवहार को बदलना शुरू किया। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया, बल्कि वर्षों तक मानव द्वारा किए गए छोटे-छोटे व्यवहारों का परिणाम है।
इस समस्या का एक नया और गंभीर पक्ष सोशल मीडिया है। आज अनेक लोग केवल कुछ सेकंड की वायरल रील बनाने के लिए बंदरों को चॉकलेट, चिप्स, कोल्ड ड्रिंक, बिस्कुट और अन्य पैकेटबंद खाद्य पदार्थ खिलाते दिखाई देते हैं। कई लोग उन्हें जानबूझकर बुलाते हैं, हाथ पर बैठाते हैं, सेल्फी लेते हैं या उनकी प्रतिक्रियाएँ रिकॉर्ड करते हैं। ऐसे वीडियो लाखों लोगों तक पहुँचते हैं और अनजाने में यह संदेश देते हैं कि वन्यजीव मनोरंजन का साधन हैं। वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। जिस बंदर को आज मनोरंजन के लिए भोजन दिया जाता है, वही कल हर श्रद्धालु से उसी व्यवहार की अपेक्षा करने लगता है। इस प्रकार एक वायरल वीडियो केवल डिजिटल मनोरंजन नहीं रहता, बल्कि वन्यजीवों के व्यवहार में हस्तक्षेप का माध्यम बन जाता है।
धार्मिक स्थलों के आसपास दुकानों की बढ़ती संख्या और खुले में पड़ा कचरा भी इस समस्या को बढ़ाता है। प्रसाद की दुकानें, फलों के ठेले, खुले कूड़ेदान और भोजन के अवशेष बंदरों के लिए स्थायी आकर्षण बन जाते हैं। जब किसी जीव को बिना परिश्रम भोजन मिलने लगे, तो उसका प्राकृतिक व्यवहार बदलना स्वाभाविक है। वह जंगल में भोजन खोजने की अपेक्षा उसी स्थान पर रहना पसंद करेगा जहाँ भोजन आसानी से उपलब्ध हो। यही कारण है कि अनेक मंदिरों, घाटों और तीर्थस्थलों पर बंदरों की उपस्थिति पहले की तुलना में अधिक दिखाई देती है।
अक्सर यह प्रश्न भी उठता है कि क्या बंदरों की संख्या वास्तव में बहुत बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि कई स्थानों पर संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन उनके वितरण और व्यवहार में आया है। पहले जो बंदर जंगलों तक सीमित थे, वे अब मानव बस्तियों और धार्मिक स्थलों के आसपास अधिक दिखाई देते हैं। इसलिए लोगों को लगता है कि उनकी संख्या अचानक बढ़ गई है, जबकि वास्तविकता अधिक जटिल है।
देश के अनेक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। वृंदावन और मथुरा में चश्मा तथा मोबाइल छीनने की घटनाएँ लंबे समय से चर्चा का विषय रही हैं। शिमला के जाखू मंदिर में वर्षों से श्रद्धालुओं को अपने चश्मे और खाने-पीने का सामान सुरक्षित रखने की सलाह दी जाती है। हरिद्वार, ऋषिकेश और तिरुमला जैसे तीर्थस्थलों पर भी यात्रियों को बंदरों को भोजन न देने और सावधानी बरतने की चेतावनी दी जाती है। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि यह किसी एक शहर या एक मंदिर की समस्या नहीं, बल्कि देश के अनेक धार्मिक स्थलों के सामने उपस्थित एक साझा चुनौती है।
वन्यजीव चिकित्सकों के अनुसार बंदरों का प्राकृतिक आहार फल, पत्तियाँ, बीज और अन्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थ हैं, जबकि बिस्कुट, नमकीन, चिप्स, मिठाइयाँ, ब्रेड, चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक और अन्य प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। ऐसे भोजन से उनमें मोटापा, पाचन संबंधी समस्याएँ, दाँतों की बीमारियाँ, कुपोषण और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। कई बार वे भोजन के साथ प्लास्टिक के रैपर भी निगल लेते हैं, जिससे गंभीर आंतरिक नुकसान का खतरा रहता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि नियमित रूप से मानव भोजन मिलने पर बंदरों का स्वाभाविक व्यवहार बदलने लगता है। वे मनुष्य को भोजन का स्थायी स्रोत मानकर प्रसाद, बैग, चश्मा और अन्य सामान छीनने लगते हैं तथा जंगल में भोजन खोजने की उनकी प्राकृतिक प्रवृत्ति कमजोर पड़ जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि वन्यजीवों के प्रति सच्ची संवेदना उन्हें मानव भोजन खिलाने में नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक भोजन और प्राकृतिक आवास की रक्षा करने में है।
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। इंडोनेशिया के बाली स्थित प्रसिद्ध मंकी फ़ॉरेस्ट, जापान के कुछ पर्वतीय क्षेत्रों और एशिया के अन्य पर्यटन स्थलों पर भी वन्यजीवों को भोजन कराने से उत्पन्न समस्याएँ सामने आई हैं। इसलिए अनेक देशों ने "Do Not Feed Wildlife" अर्थात् "वन्यजीवों को भोजन न दें" जैसी नीति अपनाई है। इसका उद्देश्य जानवरों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें मनुष्य पर निर्भर होने से रोकना है।
समस्या का समाधान केवल बंदरों को पकड़कर दूसरे स्थान पर छोड़ देने में नहीं है। यदि भोजन के स्रोत यथावत बने रहें, तो कुछ समय बाद दूसरे बंदर उसी स्थान पर आ जाएँगे। यही कारण है कि वन्यजीव विशेषज्ञ मानव–वन्यजीव संघर्ष के समाधान में मानव व्यवहार परिवर्तन को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। यदि श्रद्धालु बंदरों को भोजन देना बंद कर दें, यदि दुकानदार खाद्य पदार्थ सुरक्षित रखें, यदि कूड़ेदान बंद ढक्कन वाले हों और यदि सोशल मीडिया पर वन्यजीवों को उकसाने वाली सामग्री को प्रोत्साहन न मिले, तो कुछ वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखा जा सकता है।
धार्मिक संस्थाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि मंदिर प्रबंधन स्वयं श्रद्धालुओं से आग्रह करे कि बंदरों को भोजन न दें और यह समझाए कि किसी वन्यजीव को मनुष्य पर निर्भर बना देना उसके हित में नहीं है, तो इसका प्रभाव अत्यंत सकारात्मक हो सकता है। भारतीय संस्कृति का मूल संदेश करुणा है, परंतु करुणा का अर्थ किसी जीव के प्राकृतिक जीवन को बदल देना नहीं है। सच्ची सेवा वही है जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखे।
आज आवश्यकता बंदरों को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि स्वयं से प्रश्न पूछने की है। क्या हमने अपने मनोरंजन, सुविधा और दिखावे के लिए एक वन्यजीव की प्राकृतिक प्रवृत्ति को बदल नहीं दिया? क्या हमारी आस्था कहीं अनजाने में ऐसी आदत में परिवर्तित नहीं हो गई जिसने बंदरों को मनुष्य पर निर्भर बना दिया? यदि उत्तर 'हाँ' है, तो समाधान भी हमारे ही हाथ में है।
जिस दिन श्रद्धालु यह निर्णय लेगा कि वह बंदर को प्रसाद नहीं, बल्कि उसका प्राकृतिक अधिकार लौटाएगा; जिस दिन पर्यटक यह समझेगा कि हर रील समाज के लिए उपयोगी नहीं होती; जिस दिन दुकानदार और मंदिर प्रबंधन मिलकर स्वच्छ और अनुशासित व्यवस्था बनाएँगे; और जिस दिन हम वन्यजीवों को मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति की धरोहर मानेंगे, उसी दिन इस संघर्ष का वास्तविक समाधान प्रारम्भ होगा।
धार्मिक स्थलों की पवित्रता केवल मंदिरों, घंटियों और आरती से नहीं बनती। वह इस बात से भी बनती है कि वहाँ आने वाला प्रत्येक मनुष्य प्रकृति और उसके जीवों के प्रति कितना जिम्मेदार व्यवहार करता है। आस्था तभी पूर्ण होती है, जब उसके साथ विवेक, अनुशासन और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता भी जुड़ी हो। बंदरों का बढ़ता संघर्ष हमें यही संदेश देता है कि प्रकृति के साथ संतुलन बिगाड़ना आसान है, पर उसे पुनः स्थापित करने के लिए समाज, प्रशासन और प्रत्येक नागरिक को मिलकर प्रयास करना होगा।


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