‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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संघ पारिभाषिक शब्दावली

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सरसंघचालक - संघ के मार्गदर्शक
सरकार्यवाह - संघ के निर्वाचित सर्वोच्च पदाधिकारी
संघ चालक - स्थानीय कार्य व कार्यकर्ताओं के पालक
मुख्य शिक्षक - नित्य चलने वाली शाखा के कार्यक्रमों को संचालित करने वाला।
कार्यवाह - शाखा क्षेत्र का प्रमुख।
गटनायक - शाखा क्षेत्र के एक छोटे भौगोलिक भाग का प्रमुख।
प्रचारक - संघ कार्य हेतु पूर्णतः समर्पित जीवनदानी कार्यकर्ता।
शाखा - संस्कार निर्माण हेतु नित्य प्रति का एकत्रीकरण।
उपशाखा - एक स्थान पर चलने वाली विभिन्न शाखाएँ।
बैठक - विचार मंथन व सामूहिक निर्णय प्रक्रिया हेतु एकत्र बैठने की प्रक्रिया।
बौद्धिक - वैचारिक प्रबोधन का कार्यक्रम/भाषण।
समता - अनुशासन के प्रशिक्षण हेतु शारीरिक कार्यक्रम।
सम्पत - कार्यक्रम प्रारम्भ करने हेतु स्वयंसेवकों को निश्चित् रचना में खड़ा करने की आज्ञा।
विकिर - शाखा कार्यक्रम के समाप्ति की अंतिम आज्ञा।
दण्ड - लाठी
चंदन - एकसाथ मिल बैठकर जलपान करना।
सहभोज - अपने.अपने घर से लाये भोजन को एकसाथ मिल बैठकर खाना।
शिविर - केम्प
संघशिक्षा वर्ग - संघ की कार्यपद्धति सिखानें हेतु क्रमबद्ध त्रिवर्षीय प्रशिक्षण योजना।
सार्वजनिक समारोप - शिविर तथा वर्ग का अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम।
रवानगी समारोप - समारोप वर्ग का केवल शिक्षार्थियों के लिए दीक्षांत कार्यक्रम।
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सुविचार- ’’श्रीगुरूजी’’

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‘‘यह अनिवार्य है कि मानव जाति को अपना अद्वितीय ज्ञान प्रदान करने की योग्यता के संपादन के लिये तथा संसार की एकता और कल्याण के हेतु जीवित रहने एवं उपयोग करने के लिये हमें संसार के समक्ष आत्मविश्वासी पुनरूत्थान शील और सामर्थशील राष्ट्र के रूप में खड़ा होना पड़ेगा।’’

’’श्रीगुरूजी’’

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अनेकता में एकता

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‘‘अनेकता में एकता का हमारा वैशिष्टम हमारे सामाजिक जीवन का भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में व्यक्त हुआ है। वह उस एक दिव्य दीपक में समान है जो चारों ओर विविध रंगों के शीशों से ढका हुआ हों। उसके भीतर का प्रकाश दर्शक के दृष्टिकोण के अनुसार भांति भांति के वर्णों एवं छायाओं में प्रकट होता है।’’

’’श्रीगुरूजी’’
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संतो द्वारा समरसता के प्रयास

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आद्य संकराचार्य

देश की एकता, अखण्डता एवं समरसता निर्माण में अपने यहाँ संतो का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

संतो की लम्बी श्रंृखला में से कुछ प्रमुख संत-

1. आद्य शंकराचार्य- एकात्म भाव निर्माण के लिए पंचायतन पूजा अर्थात पंचदेवताओं की पूजा एवं चार मठों की स्थापना। (हजारों वर्षो तक एकता बनाये रखने के लिए है।)


गुरुनानक देव जी

2. श्री गुरुनानक देव ने सामुहिक भजन, भोजन एवं पूजन की बात कही। (संगत, पंगत एवं गुरु द्वारा)


3. संत तुलसीदास ने लोक भाषा में रामायण लिखकर लोक जागरण का कार्य किया। समाज में आत्मविश्वास का भाव एवं मुगलों से प्रतिकार करने का भाव जगाया। सम्पूर्ण देश में हनुमान मंदिरों और व्यायाम शालाओं का निर्माण करके शक्ति जागरण का कार्य किया।

संत तुलसीदास जी

4. आचार्य शंकरदेव ने आसाम क्षेत्र में कर्मकाण्ड का विरोध किया एवं प्रभुनाम का स्मरण करने के लिए प्रेरणा दी। नाटकों का मंचन प्रारम्भ कर समाज जागरण का कार्य किया। गीता, भागवत, उपनिषदों का असमियाँ में अनुवाद कराया।

समर्थ रामदास

5. नायनमार-अलवार ने दक्षिण क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण बनाया तथा पूजा पद्धति में आये दोषों को दूर किया।

6. समर्थ रामदास जी ने

सामाजिक समरसता के भाव का निर्माण किया। अछूत वर्गो को भोजन कराने का उदाहरण सर्वविदित है। हनुमान मंदिर एवं 1100 व्यायाम शालाओं की स्थापना एवं उनके महंत तय किये। एक हजार सूर्य नमस्कार उनके शिष्यों द्वारा करने का

दृष्टांत ध्यान देने योग्य है। शिवाजी को ‘‘छत्रपति शिवाजी‘‘ बनाने में समर्थ रामदास एवं उनके शिष्यों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

7. संत एकनाथ जी ने मुगल शासनकाल में अपने व्यक्तिगत और व्यक्तित्व से अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये। पिता के श्राद्ध में झूंडो को भोजन कराना हो अथवा, गधें को गंगाजल पिलाने की बात हो।

8. संत तुकाराम ने अभंगो की रचना कर समाज को दिशा प्रदान की हिन्दु जीवन दर्शन की बाते बताई।

9. विद्यारण्य स्वामी- ने दक्षिण भारत में हिन्दू साम्राज्य का बहुत बड़ा केन्द्र विजय नगर साम्राज्य की स्थापना की। घर वापसी का काम उन्होने प्रारम्भ किया हरिहर एवं बुक्का को हिन्दू बनाया।

10. भक्त पीपाजी गांगरोन के महाराजा थें वे अवतारी पुरूष थे। गुरुगं्रथ साहिब में उनकी वाणी का उल्लेख है।

धन्ना भगत

11. संत धन्ना भगत ढोंढ के पास धुँआ गॉव के थे। सद्गुण उपासक थे, ऐसा कहा जाता है कि स्वयं श्रीकृष्ण उनकी खेती करते थे।

12. बाबा रामदेव एक जागीरदार थे, फिर वे संत हो गये। समाज में ऊंच-नीच का भाव समाप्त करने के लिए कार्य किया। आज भी समाज उनमें श्रद्धा रखता है।

बाबा रामदेव
मीरा बाई

13. संत जम्बनाथ जी ने बीस और नौ अर्थात 29 नियम बनाकर समाज को अहिंसा की प्रेरणा दी। जीव सुरक्षा एवं जीव दया का भाव निर्माण किया। जोधपुर के पास खेजडली गाँव में 363 विस्नोई समाज के महिला पुरूषों ने वृक्ष बचाने केलिए अपना बलिदान दे दिया।

14. भक्त मीरा के सत्संग में जातिपाति का भेद नहीं था। मेड़ता के कृष्ण मंदिर में प्रथम प्रसाद चर्मकार परिवार से चढ़ाने का विधान है।

15. राम स्नेही सम्प्रदाय ने जातिपाति के बन्धनों को मिटाया।

16. नाथ सम्प्रदाय, मारवाड़ एवं शेखावटी के हिन्दुओं को हिन्दू बनाये रखने में नाथ सम्प्रदाय, का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

संत तुकाराम

17. गोविन्द गुरु ने वनवासी क्षेत्रो में माँसाहार, एवं चोरी नहीं करने की शिक्षा दी।

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राष्ट्र प्रगति की दसा और दिशा क्या हो?

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इक्सीसवी सदी के प्रथम दशक के अंतिम वर्ष की ओर हम बाद रहे हैं। फिर भी एक यक्ष प्रश्न हम सबके सामने हैं। विकास का पैमाना किसे माना जायें ? क्या हो विकास कि सही परिभाषा , जिसके आधार पर हम कह सकें कि हम कहॉं तक पहॅुंचे ? आगे हमें कहॉं जाना हैं ? विज्ञान की प्रगति के चरम शिखर के इस युग में मानव जाति के समग्र उत्कर्ष की परिभाषा तक तय नहीं कर पाये, तो आपको अजीब सा लगेगा। कि शायद इन्हें दिखाई नहीं देता। मॅंहगाई भले ही अभी नये आयाम पार कर उत्कर्ष तक छलांग लगा रही हैं। बड़े बड़े शहर फ्लाय ओवर सुपर स्टोर मेट्रो बड़ी बड़ी बिल्डिगों का भवन निर्माण क्या इन्हें दिखाई नहीं देता ? सड़कों पर दौड़ती आलीशान कारें नहीं दिखाई देती हैं ? हमें सब दिखाई देता हैं । पर क्या करें विकास की परिभाषा तय किये बिना हम कैसे कहें कि यही सच्चा विकास हैं। यदि यहीं विकास हैं। तो मानसिक रूप से अशांत होकर ढेरों व्यक्ति क्यों आत्महत्या कर रहे हैं। मनोविकारों एवं नये असाध्य रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों की संख्या क्यों बढ़ती जा रही हैं। बढ़ती समृद्धि के साथ परिवार क्यों टूट रहे हैं। पश्चिम में भौतिकवाद की ऑंधी थमती सी दिखाई दे रही हैं। वहीं लोग भारतीय संस्कृति योग, अध्यात्म एवं शांति का मार्ग पकड़ते दिखाई दे रहे हैं। पर क्या कारण हैं कि हम भारतवासी आत्मघाती भौतिकवाद, पाश्चात्यवादी क्षणिक सुख वाले उपभोक्तावाद में लिप्त होते जा रहे हैं ? क्या यही विकास का पैमाना बनेगा। कि नये डिस्को थीक कितने बने, कितने अंग्रेजी भाषा में पढ़ने वाले स्कूल कॉलेज बढ़े, डोनेशन पर आधारित अच्छी अच्छी युनीफार्म पहनने वाले छात्र छात्राओं से भरे मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेज मैनेजमंेट संस्थान अधिक बढ़ते चले जा रहे हैं, भ्रष्टाचार के साक्षात नमूने इन संस्थानों की संख्या कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ती जा रही हैं। क्या इसी को प्रगति का आधार माना जावें ? देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, कृषि योग्य सिंचित भूमि जो फसलों के रूप में सोना उगलती थी क्रमशः सिकुड़ती जा रही हैं। ये किसान अपनी भूमि बेचकर करोड़पति तो बन रहे हैं पर जीवन विद्या के अभाव में सब कुछ शीघ्र ही लुटाकर शराब में लिप्त हो जीवन बर्बाद करते हुए देखे जा रहे हैं गॉंव उजड़ रहे हैं। युवा प्रतिभावान वहॉं से पलायन कर रहे हैं, तथा शहरों की ओर जा रहे हैं। ऐसे ग्रामीण बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही हैं जो अब कस्बों शहरों में रहकर नकारा बन रहे हैं । हमारी गायों का कटना जारी हैं। हमारे धर्म में जिसे जन्मदात्री मॉं से भी बड़ा दर्जा दिया गया हैं जो सर्वकल्याणकारी, मंगलकारी हैं, उसका मॉंस विदेशों को निर्यात किया जा रहा हैं, फैशन हेतु सामान के निर्माण हेतु गाय के बछड़ों का वध किया जा रहा हैं। क्या इसे प्रगति कहा जायेगा ? आज हमारी सोच वह हैं या बन गई हैं जो हमें समाचार पत्र या इलेक्ट्रानिक मीडिया बताता हैं सभी चैनलोें को राजनीतिज्ञों को दिखाने सिनेमा के कलाकारों के मंनोरंजन एवं खेलों का प्रदर्शन करने से ही फुरसत नही तो क्या समझेंगे कि देश में क्या हो रहा हैं ? विकास के नाम पर हमारी सांस्कृतिक जड़ों को काटा जा रहा हैं। भले ही समृद्धि का तथा कथित हरा भरा वृक्ष कभी भी गिर जाय, सारे रास्ते अब शहरों की ओर जाते हैं महानगरों की ओर जाते हैं वहीं सुख हैं, वहीं सपने हैं, वही सब कुछ हैं और वहीं हम सबके आराध्य हैं इष्ट मित्र हैं । यही सोच हमारी आज बना दी गई हैं। हम भी नादान हैं आम भारतीय की सोच भी वहीं बन गई हैं, एवं यहीं कारण हैं कि हमें इस विकास के पीछे छिपा विनाश दिखाई दे रहा हैं। प्राकृतिक आपदा आई नहीं बल्कि हमने निमंत्रण देकर बुलाई हैं रेगिस्तान बने नहीं हमने बनाये हैं, नदियॉं सूखी नहीं, अपितु सुखाई गई हैं। जमीन की गहराई में भू गर्भ में छिपा जल तो हमारे प्राणों का स्त्रोत हुआ करता था, हमने खीच खीचकर समाप्त कर दिया हैं। अगला विश्व युद्ध पानी पर हो तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। आज ग्लोबल वार्मिग जलवायु परिवर्तन इन विषयों पर विश्व भर में चर्चा हैं। सारे वन प्रदेश वनों से रहित हो रहे हैं, वन्य प्राणी घोर संकट के दौर से गुजर रहे हैं। क्या यही प्रगति हैं ? तो क्या हम रोना ही रोते रहे ? हमें आज विकास की नई परिभाषा गढने की आवश्यकता हैं।
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राष्ट्र के सर्वांगिण विकास को समर्पित व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, विकास के जिसमें तत्व छिपे हों ऐसा पुरूषार्थ हो शिक्षा और विद्या को जो जोड़े एवं सुसंस्कारित व्यक्तित्व बनाये, वह विकास हमें चाहिए जो गौ माता का वध रोककर उनका वंश बढ़ाने की गौ आधारित कृषि एवं जीवन शैली विकसित करें वह विकास हमें चाहिये। योग को जो हमारे जीवन जीने कि विद्या के रूप में हर श्वास में स्थापित करें। वह विकास हमें चाहियें। जो हमारे परिवारों को तोडे नहीं जोड़े, हमारे वृद्धजनों, बुजुर्गों का सम्मान करना हमें सिखायें वह विकास हमें चाहिये। अब यह कैसे हो विकास तो इसके लिए नूतन परिभाषा को अपनी व्यवस्था को, जीवन शैली को बदलना होगा। क्या क्षणिक लाभ का आकर्षण छोड़ दूरगामी हित वाला विवेक धारण कर सकते हैं ? बहुत छलावे में जी चुके हैं, अस्थाई आराम देनेवाला जीवन जी चुकें। क्या बची जिन्दगी में कुछ क्रांतिकारी बदलाव ला सकते हैं ? यह प्रश्न हमें अपने आप से पूछना हैं और युगानुमूल समाधान की खोज के लिए तत्पर होना हैं।
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