‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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विवेकानंद जी का शिकागो संभाषण: भारत का वैश्विक परिचय

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विवेकानंद जी का शिकागो संभाषण: भारत का वैश्विक परिचय
प्रवीण गुगनानी :
               हमारें इस देश में देव स्वरुप जन्में स्वामी विवेकानंद एक ऐसे विद्वान्, संत, चिन्तक व अद्भुत पुरुष हुए हैं जिन्हें हर दृष्टि से केवल और केवल चमत्कारिक देव पुरुष ही कहा जा सकता है. इस महान विचारक का भारत में जन्मना और इस देव भूमि, हिन्दू भूमि के विचारों को अन्तराष्ट्रीय मंचों पर पुनर्स्थापित करनें का प्रयास सचमुच ही एक ऐसा कार्य था जिसनें भारत के ललाट को गौरव लालिमा से प्रकाशित कर दिया था. १८९३ की शिकागो में आयोजित धर्मसभा में जब यह तेजस्वी विचारक बोलनें उठा तो वहां उपस्थित विश्व भर का प्रबुद्ध और संत समुदाय उनकें एक एक शब्द को सुनकर जैसे जड़वत होता चला गया और उन्हें श्रद्धाभाव और भक्तिभाव से सुनते रहनें के लिए मजबूर हो गया था. यह एक सर्व विदित गौरव गाथा है जो प्रत्येक भारतीय सगर्व बोलता सुनता है. इस गौरव गाथा के साथ आज के हमारें समाज को इस चिन्तक के विचारों में छुपे कुछ नयें किन्तु गूढ़ आयामों को भी समझने और आत्मसात करनें के गंभीर प्रयास प्रारम्भ करना होंगे.

भारतीय प्रबुद्ध वर्ग को समझना होगा कि आज जब भारतीय संस्कृति,सनातनी संस्कार और हिन्दू जीवन शैली के सन्दर्भों में तथाकथित समाज के अगड़े औरप्रगतिशील बंधू विचित्र परिभाषाएं गढ़नें लगें हैं और सबसे बढ़कर जब राजनीति में धर्म निरपेक्षता जैसे शब्दों के मुक्त रूप से विरूप और कुरूप शब्दार्थ खोजें जा रहें हो तब स्वामी विवेकानंद के विचारों का आलोक ही हमें इस घनघोर वैचारिक अन्धकार से मुक्ति दिला सकता है.
आज कल बहुधा नहीं बल्कि सदैव ही यह कहा जानें लगा है कि शासन और प्रशासन को धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के सन्दर्भों में धर्म निरपेक्ष होकर विचार और निर्णय करनें चाहिए. यहाँ पर यह प्रश्न बड़ा यक्ष प्रश्न बन कर उभरता है कि धर्म निरपेक्षता आखिर है किस चिड़िया का नाम? आज हमारें देश के तथा कथित बुद्धिजीवी और प्रगतिशील कहलानें वाला वर्ग धर्म निरपेक्षता के जो मायनें निकाल रहा है क्या वह सही है? क्या धर्म निरपेक्षता शब्द के जो अर्थ चलन में उतार दिए गएँ हैं वे रत्ती मात्र भी प्रासंगिक और उचित हैं?? इस वैचारिक सन्दर्भ में भारत में जो अर्थशास्त्र का बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा सिद्धांत लागू है वह संभवतः दुर्योग से विश्व में एक हमारें यहाँ ही सांस्कृतिक जीवन में भी लागू हो रहा है!! अर्थशास्त्र में मुद्रा सिद्धांत है कि "बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है." यह सिद्धांत भारत की वैचारिक परिधि में लागू हो गया लगता है!!! आज हमें देखनें में आ रहा है कि जहाँ पाश्चात्य विश्व के बुरे- खारिज कर दिए विचार, फैशन शैली,परम्पराएं और पद्दतियां जो हमारी पीढ़ी को अच्छी लग रहीं हैं वहीँ भारतीय -हिन्दू जीवन शैली को पश्चिमी देश बेधड़क और तेजी अपनाते चले जा रहें हैं. इस वर्ष विवेकानद जी के डेढ़ सौवीं जयंती वर्ष में हमें इस पीड़ादायक तथ्य को स्वीकार करना होगा कि भारत की वैचारिक दुनिया में जिस प्रकार बुरे विचारों ने अच्छे विचारों को प्रचलन से बाहर कर दिया है या करते जा रहा है तब स्वामी जी के विचारों का प्रकाश ही हमें इस षड्यंत्र पूर्वक बना दिए गए कुचक्र से बाहर निकाल सकता है. स्वामी जी ने जब शुकागो में अपनें विचारों को व्यक्त करते हुए कहा था कि " राष्ट्र वाद का मूल धर्म व संस्कृति के विचारों में ही बसता है” तब सम्पूर्ण पाश्चात्य विश्व ने उनकें इस विचार से सहमति व्यक्त की थी और भारत के इस युग पुरुष के इस विचार को अपनें अपनें देशों में जाकर प्रचारित और प्रसारित किया था और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान प्रकट किया था. पिछली क्रिसमस के अवसर पर जब ब्रिटिश प्रधानमन्त्री ने कहा कि "ब्रिटेन एक इसाई राष्ट्र है और इसे कहनें में किसी को कोई भय या संकोच नहीं होना चाहिए" तब निश्चित ही उनकी इस घोषणा की पृष्ठ भूमि में विवेकानंद जी का यह विचार ही था. कितने आश्चर्य का विषय है कि आज जब समूचा विश्व धर्म निरपेक्षता के शब्दार्थों को विवेकानंद जी के विचारों में खोज और पा रहा है हम उनकें एतिहासिक शिकागो संभाषण को और उनकें समूचे जीवन वृत्त को याद ही नहीं कर रहें हैं!! इस संभाषण में उन्होंने गौरव पूर्वक कहा था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और हिन्दू जीवन शैली के साथ जीवन यापन करना ही इस आर्यावर्त का एक मात्र विकास मार्ग रहा है और भविष्य में विकास करनें की और एक आत्म निष्ठ समाज के रूप में अस्तित्व बनाएं रखनें में यही एक मात्र मन्त्र ही सिद्ध और सफल रहेगा. स्वामी जी ने अपनें एतिहासिक व्याख्यान में कहा था कि भारत के विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित होनें का एक मात्र कारण यहाँ के वेद, उपनिषद, ग्रन्थ और लिखित अलिखित करोड़ों आख्यान और गाथाएँ ही रहीं हैं. अपनी बात को विस्तार देतें हुए उन्होंने कहा था कि जिस भारत को विश्व सोने की चिड़ियाँ के रूप में पहचानता है उसकी समृद्धि और ऐश्वर्य का आधार हिन्दू आध्यामिकता में निहित है. आज यदि हम इस तथ्य को प्रामाणिकता की कसौटी पर परखें तो हमें निश्चित ही यह भान होगा कि भारत के प्राचीन विचार में निहित गुरुकुल, विज्ञानं निष्ठ त्यौहार, आयुर्वेद, आयुर्विज्ञान,अन्तिरिक्ष विज्ञान, काल गणना, अणु विज्ञानं, अर्थशास्त्र, नीति शास्त्र आदि के सहारे यदि हमारा समाज चलता रहता तो आज हमारी विकास गति और विश्व में हमारा स्थान कुछ और ही होता. चरक, आर्यभट्ट, चाणक्य, धन्वन्तरी आदि न जानें कितनें सौ ऐसे भारतीय वैज्ञानिकों,चिंतकों, विचारकों, अविष्कारकों के नाम गिनाएं जा सकतें हैं जिनका ध्यान स्वामी विवेकानंद के मानस में "हिन्दू भारत" या "हिन्दू जीवन शैली" कहते हुए रहता होगा. शिकागो संभाषण के समय स्वामी जी के मष्तिष्क में यह भी रहा ही होगा कि स्वामी भारत पर विदेशी आक्रमणों का इतिहास जितना पुराना और व्यापक है उतना विश्व में अन्यत्र दूसरा कोई उदाहरण नहीं है. इन में कुछ अत्यंत बर्बर खूरेंजी शकों, हूणों, चंगेजों, मंगोलों, अरबों, तोर्मानो,यवनों, तुर्कों, अफगानों, पठानों, मुगलों, यूरोपियनों और खासकर अंग्रेज संगठित सैन्य आक्रान्ताओं ने यहाँ के तत्कालीन बेहतरीन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, कृषि,भोजन, शिक्षा और प्रशासनिक ताने-बाने को ध्वस्त कर उनके अपने अनुरूप सामाजिक,शैक्षणिक, आर्थिक, राजनैतिक और व्यापारिक मूल्य स्थापित किये जो उनके लिये वरदान थे और भारत के लिये अभी तक अभिशाप हैं बनें हुए हैं. ये ही वे विघटनकारी तत्व या घटनाएं थी जिन्सें इस देव भूमि-भारत भूखंड की जीवन शैली प्रभावित और अतिक्रमित हुई थी.

आज यदि भारत के नीति नियंताओं, राजनेताओं,प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षाविदों में और उनकी मनसा, वाचा, कर्मणा में कहीं भी स्वामी विवेकानंद के विचारों से अंश मात्र भी साम्य दिखाई नहीं पड़ता है. स्वामी जी के विचारों से प्रभावित होकर जब पाश्चात्य देशों का नेतृत्व उनकें यहाँ कोई नीति बनाता है तब हम बड़े गौरान्वित होतें हैं किन्तु आज यह समीक्षा होनी चाहिए कि यदि आज इस देश में कोई स्वामी जी के विचारों को लागू करनें का प्रयास करें तो उसका क्या हश्र होगा?? इस देश का आम नागरिक चाहता है इस कि भूमि के मूल सांस्कृतिक विचारों का यहाँ प्रभाव व प्रभुत्व हो किन्तु इस देश की समकालीन परिस्थितियाँ इतनी भयावह और गंभीर है कि ऐसा सोचना भी यहाँ एक बड़े बवंडर को जन्म दे सकता है. सम्पूर्ण विश्व में भारत ही एक मात्र ऐसा राष्ट्र है जहां बहुसंख्यक समाज को अपने विचारों, मान्यताओं और परम्पराओं के पालन और रक्षण के लिए भी उन्हें धर्म निरपेक्ष न होनें का ताना सुनना पड़ता है और उन्हें वैचारिक पिछड़ा कहनें वाले लोग तथाकथित रूप से इस देश के नेतृत्व में या नेत्रत्व को प्रभावित करनें वाली बैठकों में बैठे नजर आतें हैं. विवेकानंद जी के विचारों का प्रवाह और उनकी निरंतर सतत समीक्षा वह कक्षा है जहां से इस राष्ट्र को समग्र विकास और सांस्कृतिक अक्षय के साथ सोने की चिड़िया और विश्व गुरु बनानें वालें स्नातक निकल सकतें हैं; हमें इस सर्वकालीन तथ्य और ब्रह्म सत्य को पहचानना होगा
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सर्वदलीय निंदा, लानत हो और बर्खास्त हो “वन्दे-मातरम्” का अपमान कर्ता सांसद

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सर्वदलीय निंदा, लानत हो और बर्खास्त हो “वन्दे-मातरम्” का अपमान कर्ता सांसद महान कवि और लेखक बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा रविवार, कार्तिक सुदी नवमी, शके १७९७ (७ नवम्बर १८७५) को पूर्ण किये गए अप्रतिम, भावपूर्ण और सुन्दर गीत वन्देमातरम के विषय में कौन सच्चा भारतीय गौरव भान और आदर भाव नहीं रखना चाहेगा यह अविश्वसनीय सवाल है!! 
                      भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण, जीवट भूमिका निभानें वाले और अबाल वृद्ध देश भक्त भारतीयों में देश प्रेम और मातृभुमि के प्रति आस्था जागृत करनें वाला यह गीत स्वातंत्र्य संघर्ष काल में सम्पूर्ण भारत में एक बड़ा सम्बल और देश प्रेमियों के परस्पर दिलों को एक दुसरें से जोडनें वाला सिद्ध हुआ था. आज इस गीत को लिखें जानें के लगभग एक सौ चालीस वर्षों के बाद हम भारतीयों के ह्रदय में राष्ट्रवाद, राष्ट्र-रक्षा और राष्ट्र निष्ठा का अप्रतिम भाव जागृत कर देता है. आज भी जब विद्यार्थी, नेता, अधिकारी और सामान्य नागरिक इस गीत को गातें हैं तो अपनें दिलों में भारत माता को साक्षात बसा हुआ देख पातें हैं. इस देश में पृथकता वादियों और भारतीयता के प्रति असम्मान की भावना से भरे हुए विघ्न संतोषियों द्वारा समय समय वन्दे मातरम् के प्रति प्रकट किया जानें वाला असम्मान कोई नई बात नहीं है. जो नया हुआ है वह संभवतः देश प्रथम बार भारत की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था और लोकतंत्र के मंदिर में वन्देमातरम का घोर अपमान है. बहुजन समाज पार्टी के दलबदलू और मानसिक दिवालिया सांसद जो कि पूर्व में मुलायम सिंग के साथी रहें हैं द्वारा संसद में राष्ट्र गीत गायन की समृद्ध परम्परा के दौरान संसद से बाहर चलें जाना देश की संसद, सवा सौ करोड़ नागरिकों और हमारें उन शहीदों का अपमान है जो कि वन्देमातरम का उच्चारण कर कर के फांसी के फंदों पर झूल गए थे. इस दुष्ट, भ्रष्ट बुद्धि, देश द्रोही बसपा सांसद शफी कुर्ररहमान वर्क को मान. लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने तुरंत संज्ञान लेते हुए कड़ी चेतावनी दी और इसका कारण जानना चाहा तब भी इस व्यक्ति ने कोई भूल सुधार नहीं की. इस देश द्रोही ने समाचार पत्रों को उत्तर देते हुए कहा कि वन्दे मातरम इस्लाम विरोधी है, इस्लाम इसके गान की इजाजत नहीं देता इसलिए वे लोकसभा से बाहर चले गए थे और भविष्य में भी ऐसा ही करेंगे इस कुत्सित मानसिकता वाले व्यक्ति ने यह कह कर भी चौकाया कि १९९७ में आजादी की स्वर्ण जयंती समारोह में भी इसनें ऐसा ही किया था. सम्पूर्ण राष्ट्र में इस शफी कुर्ररहमान के इस दुष्कृत्य पर दुःख और गुस्सा प्रकट होना स्वाभाविक ही है किन्तु आज देश में गुस्सा और दुःख इस बात का भी है कि संसद के अन्दर और बाहर बैठे नेता और राजनैतिक दलों के नेताओं और प्रवक्ताओं की जिव्हा को क्यों लकवा हो गया है? वैचारिक पक्षाघात की शिकार और तुष्टिकरण और वोट जुगाडू व्यवसाय हो गई राजनीति में विषबेल उगातें हमारें राजनैतिक दलों को इस घटना की आलोचना और इस सांसद का बहिष्कार करनें में भी आगामी संसद और प्रधानमन्त्री की कुर्सी पाने खोनें का अंकगणित दिख रहा है. लगभग सभी राजनैतिक दल मुस्लिम वोटों की जुगाड़ में इस दुखद घटनाक्रम की प्रखर आलोचना करते नहीं दिखाई पड़ रहे है. बसपा जो कि सम्पूर्ण राजनीति हमारें सविंधान निर्माता बाबासाहब अम्बेडकर के विचारों की दुहाई दे दे कर करती है उसे यह स्मरण नहीं आता है कि इस महान मन्त्र “वन्दे-मातरम्” को उनके नेता और हमारें सविंधान शिल्पी बाबा साहब ने ही राष्ट्र गीत की मान्यता दी थी. यदि बसपा की हमारें राष्ट्र नायक भीमराव अम्बेडकर में तनिक भी आस्था है तो सर्वप्रथम उसे इस वर्क को बसपा से निष्कासित कर देना चाहिए. होना तो यह भी चाहिए कि सम्पूर्ण संसद इस अवसर पर एकमत और एक भाष्य होकर राष्ट्रपति से इस सांसद की सदस्यता समाप्त कर इस व्यक्ति पर राष्ट्र गीत के अपमान का मुकदमा चलानें की मांग करें. यही वह अवसर है जब देश के सभी राष्ट्रवादी मिलकर इस गीत “वन्दे-मातरम्” और अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों, मान चिन्हों और राष्ट्रीय भावनाओं का अनादर करनें वालों के विरुद्ध संकल्प ले और इन्हें दण्डित करनें हेतु कटिबद्ध और प्रणबद्ध हो जाएँ. बंकिम चन्द्र चटर्जी की महान कृति आनन्दमठ के अंश “वन्दे-मातरम्” के विषय में मुस्लिमों को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योकि मादरे वतन यानि जन्मभूमि के आदर और आराधना को तो इस्लाम भी मान्यता देता है. कुरआन की कितनी ही आयतों में मादरे वतन के एहतराम को हराम हरकत माना गया है फिर मातृभुमि की आराधना के इस सुन्दर गीत को गा लेनें भला इस कट्टर पंथियों का क्या बिगड़ जाएगा यह समझ से परे है. 
                      इस देश के सौ करोड़ मूल निवासियों की भावनाओं से मीजान और मिलान बैठानें का प्रयास कर यदि मुस्लिम समाज कुछ छोटे छोटे त्याग कर लेगा तो सच्चा मुसलमान ही कहलायेगा. यदि मुस्लिम कभी हिन्दुओं की भावनाओं के अनुरूप गौमांस का त्याग कर लेगा या “वन्देमातरम” गा लेगा तो वह इस देश की मुख्य धारा में और अधिक स्नेह और माधुर्य से स्वीकार्य ही होगा!! ऐसे बहुत से छोटे छोटे भावना प्रधान तथ्य है जिन्हें यदि मुस्लिमों के चंद कट्टर पंथी नेता, मुल्ला, मौलवी समझ ले तो निश्चित ही इस देश के अधिसंख्य नरमपंथी मुस्लिमों को भी कोई आपत्ति नहीं होगी और इस देश में गंगा जमुनी संस्कृति में चार चाँद लगा कर हम सम्पूर्ण विश्व को एक उदाहरण दे पायेंगे. निश्चित ही आज हमारें देश में इस प्रकार के भावनापूर्ण आग्रहों, आव्हानों का अपना स्थान और महत्त्व है और किये जाते रहनें चाहिए किन्तु आज जिस कार्य की सबसे अधिक तत्काल आवश्यकता और अनिवार्यता है वह यह है कि संसद में राष्ट्र गीत के अपमान करनें वाले सांसद को दंड देनें की. इस देश का सविंधान, नीति नियंता, नेता, प्रशासन और न्यायपालिका इस देश के सामान्य नागरिकों से राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की आशा रखतें है और उनकी इस आशा को सच्चे भारतीयों और राष्ट्रवादी नागरिकों द्वारा पूर्ण किया भी जाता है तब इस सांसद को क्यों रियायत दी जाए? शफी कुर्ररहमान तो भारतीय सविंधान की शपथ लेकर संसद में आये हैं इसी सविंधान में “वन्दे-मातरम्” के अनिवार्य आदर का भी उल्लेख है अतः इस बकरा -बुद्धि नेता को ऐसा सबक सिखाया जाना आवश्यक है जिससे सम्पूर्ण देश में एक सन्देश और संकल्प शक्ति का प्रवाह हो. इस अपराधी वर्क को दंड देनें का पुण्य कार्य स्वयं संसद करे तो ठीक अन्यथा महामहिम राष्ट्रपति इस शुभ कार्य को अपनी प्रज्ञा संज्ञा से करें तो बड़ी कृपा होगी.
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सन्दर्भ: हमारें विदेश मंत्री की ९ मई से प्रारम्भ हो रही चीन यात्रा

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याद रखें, चीनी कब्जा सीमित और स्थानीय समस्या नहीं है!! 

प्रवीण गुगनानी,
Photo: ibnlive.in.com
guni.pra@gmail.com 
                     चीनी सेना द्वारा धृष्टता और दुष्टता पूर्वक भारतीय भूभाग पर19 किमी तक घुस कर कब्जा कर लेनें हमारें प्रधानमन्त्री मन मोहन सिंह द्वारा इस कब्जे को सीमित और स्थानीय समस्या का विशिष्ट दर्जा देनें के बाद उल्लेखनीय तथ्य है कि हमारें विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद 9 मई को चीन यात्रा पर जा रहें हैं. “कहनें में कोई संकोच नहीं हो रहा कि प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने इस समस्या के सम्बन्ध में जो हास्यास्पद बयान दिया है वह वैदेशिक या राजनयिक प्रकार का नहीं बल्कि किसी वार्ड पार्षद द्वारा वार्ड की समस्या के सम्बन्ध में दिया गया प्रतीत होता है”. हमारें विदेश मंत्री की चीन यात्रा और इसके बाद होनें वाली चीन के नवनियुक्त प्रधानमन्त्री सी केकियांग की भारत यात्रा का अधिकृत कार्यक्रम लगभग दो माह पहले से घोषित हो चुका था और यह दौलत बेग ओल्डी में कब्जे का घटना क्रम इन दोनों यात्राओं के सन्दर्भ में चीन के प्रिय कूटनीतिक खेल हाइड एंड सीक की अगली कड़ी है. यद्दपि हमारें प्रधानमन्त्री कम बोलते हैं और इसे उनकी गरिमा का नाम देकर महिमा मंडित किया जाता रहा है तथापि प्रश्न तो है ही कि प्रधानमन्त्री इस विषय में इतना भावनाशुन्य, संभावना रहित और भविष्य से खिलवाड़ करनें वाला व्यक्तव्य देनें की अपेक्षा चुप्पी ही रखते तो अधिक अच्छा होता. एक लोकतांत्रिक देश के प्रधान मंत्री को वैसा ही और उतना ही बोलना चाहिए जितने में उस देश के हितों का सरंक्षण हो जाए और जन भावनाओं का यथोचित प्रकटीकरण हो जाए. प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह ने जब यह बेशर्मी भरा बयान दिया होगा तब इस देश के सवा सौ करोड़ नागरिक छोडिये उनकें स्वयं के मंत्रिमंडल के अधिकाँश सदस्य भी उनकी इस बात से ह्रदय से सहमत नहीं होंगे. कोई सहमत हो या न हो यह विषय नहीं है– तथ्यगत विषय यह है कि चीनी फौज पिछली १५ अप्रेल से दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में तम्बू गाड़ कर बैठी है और फ्लैग मीटिंग्स में भारतीय तथ्यों को बेतरह झुठला कर चीनी पक्ष हमारी विदेश नीति और रक्षा नीति पर हावी हो चुका है. चीनी सेना के सन्दर्भ में हमें यह तथ्य समझ लेना चाहिए कि वहां कि सेना न तो पाकिस्तान की तरह राजनैतिक तंत्र पर हावी होकर रहती है और न ही भारत की तरह राजनैतिक निर्णयों और वातावरण के आधिपत्य में रहती है. वहां की सेना विदेश नीति के नीतिगत मामलों में निर्णायक हस्तक्षेप रखती है और राजनयिक स्तर पर हावी रहती है. भारतीय विदेश मंत्री के चीन प्रवास और चीनी प्रधानमन्त्री के भारतीय दौरे के तिथि भर घोषित होनें के ठीक पहले इस घटना क्रम को व्यवस्थित और राजनयिक चश्मे से देख लिया जाना चाहिए. 

                     अभी पिछले ही माह जब बर्मा में ब्रिक सम्मलेन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से हमारें प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह मिलें थे तब भी हमारें नेतृत्व की बेचारगी और वैदेशिक मामलों में इस सप्रंग सरकार अक्षमता सामनें आ गई थी. मनमोहन सिंह ने तब भी यह बयान देकर चीनी नेतृत्व के हौसले बढ़ा दिए थे कि भारत अपनें सीमा विवाद को एकतरफ रखकर चीन के साथ नया भविष्य तलाशेगा. पिछले लगभग दस वर्षों में चौदह बार से अधिक चीनी नेतृत्व के साथ बैठकें करनें के अनुभव वाले भारतीय प्रधानमन्त्री ने तब अरुणाचल प्रदेश में घुसपैठ की समस्या, ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से भारतीय सीमा में हस्तक्षेप के चीनी प्रयास, कश्मीरियों को भारतीय दस्तावेजों के स्थान पर अन्य कागजों के आधार पर वीजा देनें, तिब्बत की स्वतन्त्रता के सम्बन्ध में हो रहे निरंतर आत्मदाहों की चर्चा न करके इन विषयों पर अपना श्वेत ध्वज लहराकर सुरक्षात्मक हुए तब ही चीन के आक्रामक होनें और हमारें नेतृत्व के रीढ़ झुका लेनें की स्थिति स्पष्ट हो गई थी. 

                     अब जबकि हमारें विदेश मंत्री दौलत बेग ओल्डी पर कब्जें की काली घटना के तुरंत बाद चीन जा रहें हैं तो उन्हें और हमारें राजनायिकों को यह स्पष्टतः याद रखना चाहिए कि हम पर यह स्थिति योजनाबद्ध तरीकें से लादी गई है. अब यदि विदेश मंत्री चीन जाकर केवल सौहाद्र राग अलापें (जिसकी प्रयाप्त संभावना है) तो निश्चित ही सीमा विवाद, तिब्बत विवाद और अरुणाचल प्रदेश के बड़े भूभाग पर पहले से चला आ रहा चीनी कब्जें आदि को चीनी दृष्टिकोण से देखनें की कुटेव हमें विकसित करनी पड़ेगी और वैश्विक समुदाय के सामनें हमारें तर्कों और पक्षों की स्थिति दुर्बल होगी. अब जबकि भारत-चीन के बीच के पुरानें विवादों के यथास्थिति में रहते हुए ही चीनी सैनिकों की पलटन ने नए सिरे से 15 अप्रैल को भारतीय क्षेत्र में घुस कर डीबीओ क्षेत्र के भुरथे इलाके में शिविर स्थापित कर लिए हैं और चीनी सेना ने लद्दाख क्षेत्र में भारतीय सीमा में 19 किमी भीतर अपना तंबू गाड़ दिया है. इन हालातों में यदि भारत की ओर से सीमा पर यथास्थिति बहाल करने की मांग को नजरअंदाज करते हुए चीन ने अपने पहले के रुख को कायम रखा और कहा कि उसके सैनिकों ने लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का उल्लंघन नहीं किया है तब क्या विदेश मंत्री का यह चीनी प्रवास भारतीय पक्ष की दृष्टि से सकारात्मक सिद्ध होगा? 

                     दुनिया की सबसे ऊंची हवाई पट्टी दौलत बेग ओल्डी जो कि पिछले कुछ सालों में तैयार की गई भारतीय वायुसेना की तीन एडवांस लैंडिंग ग्राउंडों में से एक है और जिसे वास्तिवक नियंत्रण रेखा के निकट 16200 फीट की उंचाई पर वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय हमारी जांबाज सेना ने बड़ी मेहनत और खून पसीनें की कुर्बानी देकर बनाया था. अब इस हवाई पट्टी के करीब चीनी सेना की मौजूदगी सैन्य और सामरिक दृष्टि से बड़ी चुनौती और ख़तरा हो गई है और यह स्थिति सदा के लिए हमारी सेनाओं के लिए स्थायी सिरदर्द बन जायेगी. 

                     मार्च और अप्रेल माह की तीन बड़ी घटनाओं के सन्दर्भों में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की चीन यात्रा को जिस चश्में से देखा और तराशा जाया जाना चाहिए उन्हें हमें समझना चाहिए और सावधानी के साथ ही ड्रेगन के सामनें जाना चाहिए. घटना नंबर एक. पिछलें माह मार्च में बर्मा में ब्रिक सम्मलेन के दौरान भारतीय प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह का चीनी राष्ट्रपति से मिलना और बिना पुरानी समस्याओं और सीमा विवाद पर चिंता या चर्चा के; लगभग बेवकूफ बनकर अच्छे और सौहाद्रपूर्ण संबंधो और सुन्दर भविष्य की ओर ताकना. घटना न.दो- चीनी सेना का भारतीय क्षेत्र में उन्नीस किमी तक अन्दर घुस आना, तम्बू गाड़ना, फ्लैग मीटिंगों में चीनी अधिकारियों द्वारा अतिक्रमण को सिरे से नकार कर कब्जा बनाएं रखना और भारतीय विदेश मंत्रालय के साथ रक्षा मंत्रालय की गहन निंद्रा या बेहोशी की स्थिति में रहना. घटना न.तीन भारतीय प्रधान मंत्री का इस घटना को सीमित और स्थानीय समस्या कहनें जैसा बेहद अल्पकालिक और वैसा बयान जो किसी वार्ड पार्षद को अपनें वार्ड की समस्या आनें पर देना होता है. घटना न.चार भारतीय पक्ष की ओर से एक बार भी यह नहीं कहा जाना कि नई परिस्थितियों में भारत अपनी विदेश मंत्री की यात्रा के होनें या न होनें के सम्बन्ध में समीक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाएगा. बल्कि हुआ यह कि भारतीय विदेश मंत्री ने इस घटना के तुरंत बाद ऐसा शुतुर्मुगी व्यवहार अपनाया कि कहीं चीनी प्रवास पर कोई दुष्प्रभाव न पड़ जाएँ. किन्तु हमारें देश में दिल्ली की गद्दी पर बैठे सप्रंग शासन को स्मरण रखना चाहिए कि बीजिंग के लाल कालीन पर कदम रखनें से पहले सलमान खुर्शीद को भारतीय सीमाओं में ताजे चीनी अतिक्रमण, अरुणाचल के बड़े भूभाग पर पूर्व से चले आ रहें चीनी कब्जें, को समझ लेना चाहिए और प्रधान मंत्री के उस सीमित और स्थानीय समस्या वाले ओछे बयान की प्रेत छाया से बाहर आकर आक्रामक होना चाहिए वरना ड्रेगन लील जाएगा और खुर्शीद समझ भी न पायेंगे!! 

                     चीन जा रहे हमारें विदेश मंत्री को ग्वादर बंदरगाह के अधिग्रहण और अन्य घोषित अघोषित गतिविधियों और षड्यंत्रों से दक्षिण एशिया में चीन की तेज आर्थिक और कूटनीतिक कोशिशों को भी समझना होगा. हिंद महासागर के आस पास चीन के बढ़ रहे प्रभाव, बीजिंग के श्रीलंका, बांग्लादेश, मालदीव और म्यांमार जैसे देशों से चीन के मजबूत होते सम्बन्ध, भारत के इन पड़ोसियों को चीन की आर्थिक मदद और वहां आधारभूत सरंचनाओं के निर्माण आदि से मनमोहन-खुर्शीद और सप्रंग की दिल्ली चिंतित हो या न हो किन्तु शेष राष्ट्र चिंतित और परेशान है यह बात नए कपडे सिलाकर और बालों में खिजाब लगाकर चीन जानें को बेहद उत्सुक खुर्शीद याद रखें “तो ही शुभ होगा”.


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