‘‘सच्चाई-निर्भिकता, प्रेम-विनम्रता, विरोध-दबंगता, खुशी-दिल
से और विचार-स्वतंत्र अभिव्यक्त होने पर ही प्रभावी होते है’’
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हिंदुओं की हिंदुस्तान में ही दुर्दशा: एक गहन विश्लेषण

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"भारत, जिसे हिंदुस्तान के नाम से भी जाना जाता है, विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और विविधता में एकता का प्रतीक है। यहाँ विभिन्न धर्मों, जातियों, और संस्कृतियों का सहअस्तित्व देखने को मिलता है। भारत का इतिहास बताता है कि यह देश सदियों से विभिन्न धार्मिक समूहों का घर रहा है। हिंदू धर्म, जो भारत की आत्मा और प्राचीन सभ्यता का प्रतीक है, का इस भूमि पर गहरा प्रभाव
रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में, हिंदुओं के प्रति असहिष्णुता और उनके हितों की अनदेखी का मुद्दा उठाया जा रहा है। कई लोग मानते हैं कि अपने ही देश में हिंदुओं की दुर्दशा हो रही है। इस लेख में हम इस विषय पर विस्तार से चर्चा करेंगे।"

हिंदुओं की दुर्दशा के प्रमुख कारण:

1. राजनीतिक असंतुलन और तुष्टीकरण की राजनीति:

  • भारत में धार्मिक तुष्टीकरण की राजनीति एक बड़ी चुनौती रही है। कुछ राजनीतिक दल अल्पसंख्यक वोट बैंक के लिए नीतियां बनाते हैं, जिससे हिंदुओं में असुरक्षा की भावना पैदा होती है। इसका उदाहरण कई बार देखा गया है जब सरकारें अल्पसंख्यक समुदायों के हितों के लिए विशेष योजनाएँ और सुविधाएँ लाती हैं, लेकिन हिंदू समुदाय के लिए ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जाता।
  • इस प्रकार की राजनीति ने हिंदुओं के बीच यह भावना पैदा कर दी है कि उनकी समस्याओं और मुद्दों की अनदेखी हो रही है। इसने समाज में धार्मिक विभाजन को और गहरा किया है।

2. धार्मिक स्थलों पर हमले और हिंसा:

  • हिंदू मंदिरों पर हमले, तोड़फोड़ और उपद्रव की घटनाएँ अक्सर सामने आती हैं। यह न केवल हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करता है बल्कि उनके मन में असुरक्षा की भावना भी पैदा करता है।
  • मंदिरों के प्रबंधन और संपत्ति को लेकर भी कई विवाद सामने आए हैं। जबकि कई धार्मिक स्थलों का नियंत्रण सरकारी हस्तक्षेप के तहत होता है, इससे यह भावना पैदा होती है कि उनके धार्मिक अधिकारों का सम्मान नहीं किया जा रहा है।

3. धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल:

  • भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार संविधान द्वारा प्रदान किया गया है, लेकिन हिंदुओं को इस स्वतंत्रता का पूरा लाभ उठाने में कठिनाई होती है। कई जगहों पर हिंदुओं की धार्मिक गतिविधियों पर पाबंदियां और परंपराओं का विरोध किया जाता है।
  • कई राज्यों में हिन्दू त्योहारों और परंपराओं पर प्रतिबंध या नियम लगाए जाते हैं, जबकि अन्य धर्मों के लिए विशेष छूट दी जाती है। इससे हिंदुओं में असंतोष का भाव बढ़ता है।

4. संस्कृति और पहचान पर संकट:

  • आधुनिकता की ओर बढ़ते भारत में, हिंदू संस्कृति और परंपराएँ धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही हैं। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने भारतीय समाज पर गहरा असर डाला है, जिससे पारंपरिक हिंदू मूल्यों और मान्यताओं का क्षरण हो रहा है।
  • शिक्षण संस्थानों और मीडिया में भी हिंदू संस्कृति और इतिहास के बारे में सकारात्मक दृष्टिकोण की कमी दिखाई देती है, जिससे नई पीढ़ी में अपनी जड़ों के प्रति उदासीनता पैदा होती है।

वर्तमान स्थिति का प्रभाव:

  • सामाजिक ध्रुवीकरण: इस असमानता की भावना ने समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा दिया है। हिंदू और अन्य समुदायों के बीच आपसी विश्वास की कमी बढ़ रही है।
  • आर्थिक प्रभाव: कुछ योजनाओं और संसाधनों के असमान वितरण के कारण, हिंदू समुदाय के कई लोग आर्थिक रूप से पिछड़ रहे हैं। यह स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जहाँ विकास योजनाओं का संतुलन प्रभावित होता है।
  • धार्मिक पुनर्जागरण की भावना: हिंदुओं के बीच अपनी संस्कृति और परंपराओं की सुरक्षा के लिए जागरूकता और धार्मिक पुनर्जागरण की भावना बढ़ रही है। कई संगठन और समूह इस दिशा में सक्रिय हैं, जो समाज को अपनी परंपराओं की ओर लौटने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

समाधान की दिशा:

  • समान नागरिक अधिकार और नीति-निर्माण: सरकार को सभी धर्मों के लिए समान अधिकारों की नीति अपनानी चाहिए। तुष्टीकरण की राजनीति से दूर रहकर, सभी समुदायों के हितों की समान रूप से रक्षा की जानी चाहिए।
  • धार्मिक स्थलों की सुरक्षा: हिंदू धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए सख्त कानूनों का निर्माण किया जाना चाहिए। मंदिरों के प्रबंधन और संपत्ति को सरकार के हस्तक्षेप से मुक्त किया जाना चाहिए।
  • शिक्षा में सुधार: शिक्षा प्रणाली में भारतीय संस्कृति और इतिहास के बारे में सही जानकारी देने की आवश्यकता है। इससे युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व और सम्मान की भावना जागृत होगी।
  • धार्मिक एकता का प्रचार: धार्मिक सद्भाव और एकता को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और समझदारी को बढ़ावा देना आवश्यक है।

                               हिंदुओं की हिंदुस्तान में दुर्दशा एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा है। इसमें तुष्टीकरण की राजनीति, धार्मिक असहिष्णुता, और सांस्कृतिक संकट का योगदान है। इसके समाधान के लिए संतुलित नीतियों, समाज में आपसी समझदारी, और भारतीय मूल्यों के प्रति सम्मान की भावना की आवश्यकता है। भारत की विविधता और एकता को बनाए रखना ही इसका भविष्य है, और इसके लिए सभी समुदायों को साथ मिलकर काम करना होगा। इससे न केवल हिंदुओं का कल्याण होगा, बल्कि पूरे देश का विकास और स्थिरता सुनिश्चित होगी।

कृष्णा बारस्कर (अधिवक्ता) बैतूल

krishnabaraskar@gmail.com


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''आरएसएस" एक ''गाली" या ''राष्ट्भक्ति" का प्रतीक?

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राजीव खण्डेलवाल:
पिछले कुछ समय से कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं आगामी महत्वपूर्ण होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी दिग्विजय सिंह देश में घटित विभिन्न घटनाओ/दुर्घटनाओ के पीछे वे आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) जिम्मेदार मानने के आदी हो चुके है। विगत पिछले कुछ समय से उन्होने आरएसएस के खिलाफ एक (छिपे हुए एजेंडे के तहत?) मुहिम चला रखी है। एक कहावत है कि किसी भी झूठ को लगातार, दोहराया जाय तो वह सच प्रतीत होने लगती है और लोग भी कुछ समय के उसे सच मानने लगते है। एक बकरे का उदाहरण हमेशा मेरे जेहन में आता है- एक व्यक्ति बकरा लेकर बाजार जा रहा था उसे रास्ते में तीन विभिन्न जगह मिले विभिन्न राहगीरो ने उसे बेवकूफ बनाने के लिए उस बकरे को बार-बार गधा बताया जिस पर बकरा ले जाने वाला व्यक्ति भी उसे गधा मानने लगता है। इसी प्रकार दिग्विजय सिंह के कथन सत्य से परे होने के बावजूद वे लगातार झूठ इसलिए बोल रहे है कि वे भी शायद उपरोक्त सिद्धांत के आधार पर अपने ''छुपे हुए एजेंडे" को 'सफल' करने का 'असफल प्रयास' कर रहे जिस पर देश के जागरूक नागरिको का ध्यान आकर्षित किया जाना आवश्यक है।
वास्तव में आरएसएस एक सांस्कृतिक, वैचारिक संगठन है जिसका एकमात्र सिद्धांत राष्ट्र के प्रति प्रत्येक नागरिक के पूर्ण समर्पण के विचार भाव को मजबूती प्रदान कर राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाना है। इसी उद्वेश्य के लिए वह सम्पूर्ण राष्ट्र में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके व्यक्तिगत और सामाजिक उत्थान के लिए लगातार वर्ष भर कार्ययोजना बनाकर हजारो स्वयं सेवको की कड़ी मेहनत से नागरिकों के सक्रिय सहयोग से उसे क्रियान्वित करने का संजीदगी से प्रयास करता है। आरएसएस के सिद्धांतो से आम नागरिको को शायद ही कोई आपत्ती कभी रही हो। लेकिन उनकी कार्यप्रणाली को लेकर व उक्त उद्वेश्यों को प्राप्ति के लिए कार्यक्रमों को लेकर अवश्य कुछ लोगो को भ्रांति है जिन्हे दूर किया जाना आवश्यक है। जब से आरएसएस संघटन बना है तब से तीन बार इस पर कांग्रेस के केंद्रीय शासन ने राजनैतिक कारणों से प्रतिबंध लगाया और कुछ समय बाद उन्हे अंतत: उक्त प्रतिबंध को उठाना पड़ा। आज तक संगठन की हैसियत से आरएसएस पर कोई आरोप किसी भी न्यायालय में न तो लगाये गये और न ही सिद्ध किये गये। व्यक्तिगत हैसियत से यदि कोई अपराध किसी सदस्य या व्यक्ति ने किया है तो इसके लिए वह व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से स्वयं जिम्मेदार है न कि संगठन जैसा कि यह स्थिति अन्य समस्त संगठनों, समाजो के साथ है। आरोप लगाने वाले व्यक्ति के संगठन के साथ भी यही स्थिति है। यह स्पष्ट है कि आरएसएस पर लगाये गये आरोपो के विरूद्ध दिग्विजय सिंह या उनके संगठन या सरकार द्वारा कोई वैधानिक कार्यवाही नहीं की गई है और न ही कोई जांच आयोग बैठाया गया है। (क्योंकि अपने देश में जॉच आयोग का गठन तो आरोप मात्र पर तुरंत ही हो जाता है) वे मात्र अपनी 'राजनीति' को चमकाने के लिए 'अंक' बढ़ाने के लिए आरएसएस पर आरोपो की बौछार दिग्विजय सिंह लगा रहे है। लेकिन यह उनकी गलतफहमी है कि इससे उनकी राजनीति चमकेगी। लंबे समय तक न झूठ स्वीकार किया जा सकता है और न ही सत्य को अस्वीकार किया जा सकता है। सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक जीने के लिए आवश्यक हर सांस ले रहे है दिग्विजय सिंह कोउसमें आरएसएस के 'कीटाणु' दिख रहे है। लेकिन इससे हटकर जो सबसे दुखद पहलू यह है दिग्विजय सिंह विभिन्न जन आंदोलन को सहयोग देने का आरएसएस पर आरोप लगा रहे है क्या वे वास्तव में आरोप है व वे संगठन खुलकर उक्त आरोपों के प्रतिवाद में क्यों नहीं आ रहे है यह चिंता का विषय है। वास्तव में कोई भी राजनैतिक या गैर राजनैतिक संगठनो पार्टी द्वारा आरएसएस को सहयोग देना या लेना क्या कोई आरोप है क्योंकि आरएसएस कोई अनलॉफुल संगठन नहीं है, न ही उसे कोई न्यायिक प्रक्रिया द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते खासकर देश के सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा राज्य उप्र को देखते हुए मुस्लिम वोट के धु्रवीकरण को देखते हुए कांग्रेस का आरएसएस पर आरोप लगाना एक फैशन हो गया है। इसके विपरीत अनेक राष्ट्र विरोधी संगठन आज भी कश्मीर से लेकर देश के विभिन्न भागो में कार्यरत है। उनके खिलाफ क्या कोई प्रभावशाली आवाज कांग्रेस ने कभी उठाई? कांग्रेस के असम के एक सांसद तो विदेशी नागरिक है व उनकी भारतीय नागरिकता की प्रमाणिकता की जॉच भी चल रही है लेकिन कांग्रेस ने उनके विरूद्ध अभी तक कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं की। यदि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जिनके आंदोलन राष्ट्रीय जन-आंदोलन है जो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, कालाधन एवं बुराईयों को दूर करने के लिए है ऐसे आंदोलन को यदि संघ का सहयोग प्राप्त है तो कौनसा देशद्रोह का अपराध इसमें अपघटित होता है या भारतीय दंडसंहिता के अंतर्गत क्या अपराध है या कौन सा राजनैतिक अपराध है? यदि नही तो बाबा रामदेव, अन्ना हजारे या श्री श्री रविशंकर जी को आगे आकर स्वयं ही साहसपूर्वक यह तथ्य स्वीकार करना चाहिए क्योंकि यदि वे किसी अच्छे कार्य में लगे है और चाहते है कि देश का प्रत्येक नागरिक, संगठन, संस्था पार्टी इस कार्य में लगे, सहयोग करे और आरएसएस उक्त आंदोलन में सहायता दे रहा है तो उन्हे सार्वजनिक रूप से उनके सहयोग को स्वीकार करने में आपत्ति या हिचक क्यों होनी चाहिए या फिर वे यह कहे कि आरएसएस एक राष्ट्र विरोधी संगठन है और हमें उनके सहायता की आवश्यकता नहीं है। अन्ना का आज मोहन भागवतजी के बयान के संबंध में दिया गया जवाबी बयान न केवल खेदजनक है बल्कि बेहद स्वार्थपूर्ण है। देश के सैकड़ो संगठनों ने अन्ना के आंदोलन का समर्थन किया लेकिन अन्ना का संघ के बारे में यह बयान कि ''मुझे उनके साथ की जरूरत क्या है" क्या अन्ना भी दिग्विजयसिंह समान संघ के 'अछूते' मानते है स्पष्ट करे। वास्तव में यदि दिग्विजय सिंह के कथन का वास्तविक अर्थ निकाला जाये तो यह बात आईने के समान साफ है कि दिग्विजय सिंह जो कह रहे है जिसे इलेक्ट्रानिक मीडिया आरोपों के रूप में पेश कर रहे है वह वास्तव में आरएसएस की प्रशंसा ही है। अन्ना, बाबा और रविशंकर जी के जनआंदोलन सामाजिक व आध्यात्मिक कार्यो को पूरे देश की जनता ने स्वीकार किया है, राष्ट्रहित में माना है। राष्ट्रउत्थान के लिए माना है इस तरह से दिग्विजय सिंह के आरोपो ने आरएसएस को राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रहित का कार्य करने का प्रमाण पत्र ही दिया है।
आपको कुछ समय पीछे ले जाना चाहता हूं। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने काश्मीर विलय के समय व चीन युद्ध में आरएसएस की भागीदारी एवं भूमिंका की प्रशंसा की थी व उन्हे २६ जनवरी की राष्ट्रीय परेड में आमंत्रित किया था। काश्मीर से लेकर देश के किसी भी भाग में आये हुए राष्ट्रीय आपदा, संकट, बाढ़, सूखा में आरएसएस के स्वयं सेवकों की जो निर्माणात्मक व रचनात्मक भूमिका रही है उसे भी कांग्रेस के कई नेताओं सहित देश ने स्वीकारा है। यदि कुछ घटनाओं जैसा कि दिग्विजय सिंह कहते है मालेगांव बमकांड जैसे मे यदि कोई व्यक्ति जो आरएसएस का तथाकथित स्वयं सेवक कभी रहा हो, आरोपित है तो उससे पूरे संगठन को बदनाम करने का अधिकार किसी व्यक्ति को नहीं मिल जाता है। प्रथमत: जो आरोप लगाये गये है वे ही अपने आप में संदिग्ध है। राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के तहत कई बार देशप्रेमी सगठन और व्यक्तियों को बदनाम करने की साजिश रची जाती है। यह कहीं भी न तो आरोपित है और न ही सिद्ध किया है कि तथाकथित आरएसएस के व्यक्ति के कृत्य के पीछे आरएसएस की संगठित सोच है, प्लान है जिसके तहत उस व्यक्ति ने संगठन के आदेश को मानते हुए उक्त तथाकथित अपराध घटित किया है। कांग्रेस में कई घोटाले हुए है कामनवेल्थ कांड से लेकर २जी स्पेक्ट्रम कांड के आगे तक सैकड़ों घोटाले आम नागरिकों के दिलो-दिमाग में है। क्या यह मान लिया जाए कि इन घोटालों के पीछे कांग्रेस पार्टी का सामुहिक निर्णय है जिसके पालन में मंत्रियों ने उक्त घोटाले किये? राजनीति में यह नहीं चल सकता कि कडुवा-कड़ुवा थूका जाए और मीठा-मीठा खाया जाए। यदि किसी राजनीति के तहत या राजनैतिक आरोप लगा रहे है तो उससे आप स्वयं भी नहीं बच सकते है और वह सिद्धांत आप पर भी लागू होता है। इसलिए मीडिया का खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया का उत्तरदायित्व बनता है कि वह इस प्रकार के बेतुके तथ्यों को जनता तक परोसने से पहले उसके वैधानिक, संवेधानिक और नैतिक जो दायित्व है उसकी सीमा में ही अपने कार्यक्रम प्रसारित करेंगे तो वो देश के उत्थान में वे एक महत्वपूर्ण योगदान देंगे। मीडिया के दुष्प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है तो उसके प्रभाव को नकारने का प्रश्र ही कहा उठता है। मैं उन समस्त नागरिकों और संस्थाओं और पार्टियों से अपील करता हूं कि यदि अच्छा कार्य कोई भी व्यक्ति, संस्था या पार्टी करती है तो खुले दिल से उसकी प्रशंसा होनी चाहिए उसका सम्मान किया जाना चाहिए न कि उसकी आलोचना होते हुए मूक रूप से देखते रहना चाहिए।
अंत में एक बात और जो आरएसएस पर साम्प्रदायिकता का आरोप अक्सर दिग्विजय सिंह द्वारा जड़ा जाता है। वह वास्तव में गलत व एक तरफा है। किसी एक सम्प्रदाय (दिग्गी राजा के शब्दों में हिन्दु) को संगठित कर एक संगठन खड़ा करना साम्प्रदायिकता है तो यही सिद्धांत दूसरा सम्प्रदायों पर वे क्यों लागू नहीं करते है। क्या दूसरेसम्प्रदाय के लोगो ने अपना संगठन नहीं बनाया है। यदि हिंदु समाज की ही बात करे तो उसमें भी विभिन्न समाजो के सामाजिक स्तर पर अखिल भारतीय स्तर से लेकर जिले तक कई संगठन है। जब २५ करोड़ वैश्य समुदाय का अ.भा.वै. महासम्मेलन संगठन यदि साम्प्रदायिक नहीं है तो तब १०० करोड़ हिन्दुओ को संगठित करने वाला संगठन साम्प्रदायिक कैसे? साम्प्रदायिकता संगठन बनाने से नहीं विचारों से पैदा होती है। यदि एक सम्प्रदाय वाले लोग दूसरे सम्प्रदाय के लोगो को घृणा की दृष्टि को देखते है तो वह साम्प्रदायिकता है जिसे अवश्य कुचला जाना चाहिए?
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संघ पारिभाषिक शब्दावली

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सरसंघचालक - संघ के मार्गदर्शक
सरकार्यवाह - संघ के निर्वाचित सर्वोच्च पदाधिकारी
संघ चालक - स्थानीय कार्य व कार्यकर्ताओं के पालक
मुख्य शिक्षक - नित्य चलने वाली शाखा के कार्यक्रमों को संचालित करने वाला।
कार्यवाह - शाखा क्षेत्र का प्रमुख।
गटनायक - शाखा क्षेत्र के एक छोटे भौगोलिक भाग का प्रमुख।
प्रचारक - संघ कार्य हेतु पूर्णतः समर्पित जीवनदानी कार्यकर्ता।
शाखा - संस्कार निर्माण हेतु नित्य प्रति का एकत्रीकरण।
उपशाखा - एक स्थान पर चलने वाली विभिन्न शाखाएँ।
बैठक - विचार मंथन व सामूहिक निर्णय प्रक्रिया हेतु एकत्र बैठने की प्रक्रिया।
बौद्धिक - वैचारिक प्रबोधन का कार्यक्रम/भाषण।
समता - अनुशासन के प्रशिक्षण हेतु शारीरिक कार्यक्रम।
सम्पत - कार्यक्रम प्रारम्भ करने हेतु स्वयंसेवकों को निश्चित् रचना में खड़ा करने की आज्ञा।
विकिर - शाखा कार्यक्रम के समाप्ति की अंतिम आज्ञा।
दण्ड - लाठी
चंदन - एकसाथ मिल बैठकर जलपान करना।
सहभोज - अपने.अपने घर से लाये भोजन को एकसाथ मिल बैठकर खाना।
शिविर - केम्प
संघशिक्षा वर्ग - संघ की कार्यपद्धति सिखानें हेतु क्रमबद्ध त्रिवर्षीय प्रशिक्षण योजना।
सार्वजनिक समारोप - शिविर तथा वर्ग का अंतिम सार्वजनिक कार्यक्रम।
रवानगी समारोप - समारोप वर्ग का केवल शिक्षार्थियों के लिए दीक्षांत कार्यक्रम।
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अनेकता में एकता

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‘‘अनेकता में एकता का हमारा वैशिष्टम हमारे सामाजिक जीवन का भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में व्यक्त हुआ है। वह उस एक दिव्य दीपक में समान है जो चारों ओर विविध रंगों के शीशों से ढका हुआ हों। उसके भीतर का प्रकाश दर्शक के दृष्टिकोण के अनुसार भांति भांति के वर्णों एवं छायाओं में प्रकट होता है।’’

’’श्रीगुरूजी’’
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संतो द्वारा समरसता के प्रयास

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आद्य संकराचार्य

देश की एकता, अखण्डता एवं समरसता निर्माण में अपने यहाँ संतो का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

संतो की लम्बी श्रंृखला में से कुछ प्रमुख संत-

1. आद्य शंकराचार्य- एकात्म भाव निर्माण के लिए पंचायतन पूजा अर्थात पंचदेवताओं की पूजा एवं चार मठों की स्थापना। (हजारों वर्षो तक एकता बनाये रखने के लिए है।)


गुरुनानक देव जी

2. श्री गुरुनानक देव ने सामुहिक भजन, भोजन एवं पूजन की बात कही। (संगत, पंगत एवं गुरु द्वारा)


3. संत तुलसीदास ने लोक भाषा में रामायण लिखकर लोक जागरण का कार्य किया। समाज में आत्मविश्वास का भाव एवं मुगलों से प्रतिकार करने का भाव जगाया। सम्पूर्ण देश में हनुमान मंदिरों और व्यायाम शालाओं का निर्माण करके शक्ति जागरण का कार्य किया।

संत तुलसीदास जी

4. आचार्य शंकरदेव ने आसाम क्षेत्र में कर्मकाण्ड का विरोध किया एवं प्रभुनाम का स्मरण करने के लिए प्रेरणा दी। नाटकों का मंचन प्रारम्भ कर समाज जागरण का कार्य किया। गीता, भागवत, उपनिषदों का असमियाँ में अनुवाद कराया।

समर्थ रामदास

5. नायनमार-अलवार ने दक्षिण क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण बनाया तथा पूजा पद्धति में आये दोषों को दूर किया।

6. समर्थ रामदास जी ने

सामाजिक समरसता के भाव का निर्माण किया। अछूत वर्गो को भोजन कराने का उदाहरण सर्वविदित है। हनुमान मंदिर एवं 1100 व्यायाम शालाओं की स्थापना एवं उनके महंत तय किये। एक हजार सूर्य नमस्कार उनके शिष्यों द्वारा करने का

दृष्टांत ध्यान देने योग्य है। शिवाजी को ‘‘छत्रपति शिवाजी‘‘ बनाने में समर्थ रामदास एवं उनके शिष्यों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

7. संत एकनाथ जी ने मुगल शासनकाल में अपने व्यक्तिगत और व्यक्तित्व से अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये। पिता के श्राद्ध में झूंडो को भोजन कराना हो अथवा, गधें को गंगाजल पिलाने की बात हो।

8. संत तुकाराम ने अभंगो की रचना कर समाज को दिशा प्रदान की हिन्दु जीवन दर्शन की बाते बताई।

9. विद्यारण्य स्वामी- ने दक्षिण भारत में हिन्दू साम्राज्य का बहुत बड़ा केन्द्र विजय नगर साम्राज्य की स्थापना की। घर वापसी का काम उन्होने प्रारम्भ किया हरिहर एवं बुक्का को हिन्दू बनाया।

10. भक्त पीपाजी गांगरोन के महाराजा थें वे अवतारी पुरूष थे। गुरुगं्रथ साहिब में उनकी वाणी का उल्लेख है।

धन्ना भगत

11. संत धन्ना भगत ढोंढ के पास धुँआ गॉव के थे। सद्गुण उपासक थे, ऐसा कहा जाता है कि स्वयं श्रीकृष्ण उनकी खेती करते थे।

12. बाबा रामदेव एक जागीरदार थे, फिर वे संत हो गये। समाज में ऊंच-नीच का भाव समाप्त करने के लिए कार्य किया। आज भी समाज उनमें श्रद्धा रखता है।

बाबा रामदेव
मीरा बाई

13. संत जम्बनाथ जी ने बीस और नौ अर्थात 29 नियम बनाकर समाज को अहिंसा की प्रेरणा दी। जीव सुरक्षा एवं जीव दया का भाव निर्माण किया। जोधपुर के पास खेजडली गाँव में 363 विस्नोई समाज के महिला पुरूषों ने वृक्ष बचाने केलिए अपना बलिदान दे दिया।

14. भक्त मीरा के सत्संग में जातिपाति का भेद नहीं था। मेड़ता के कृष्ण मंदिर में प्रथम प्रसाद चर्मकार परिवार से चढ़ाने का विधान है।

15. राम स्नेही सम्प्रदाय ने जातिपाति के बन्धनों को मिटाया।

16. नाथ सम्प्रदाय, मारवाड़ एवं शेखावटी के हिन्दुओं को हिन्दू बनाये रखने में नाथ सम्प्रदाय, का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

संत तुकाराम

17. गोविन्द गुरु ने वनवासी क्षेत्रो में माँसाहार, एवं चोरी नहीं करने की शिक्षा दी।

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